सडक़ों पर संग्राम

हमने डॉक्टरों के कारखाने खुलते और कारोबार करते देखे हैं। हमने नेताओं के मेडिकल कॉलेज भी देखे हैं। नकली डॉक्टर भी देखे हैं। फर्जी लोगों ने परीक्षाएं भी दी हैं। पेपर लीक भी होते रहे हैं, आत्महत्याएं मन:स्थिति से जुड़ी हैं। किसी सामाजिक, राजनीतिक, पेशेवर समस्या का हिस्सा नहीं हैं, लेकिन हमने इन संवेदनशील मुद्दों पर युवा, छात्र आंदोलन भडक़ते नहीं देखे। इस साल भी 11 लाख से अधिक युवाओं ने ‘नीट’ परीक्षा पास की है, लेकिन उनमें से 9 लाख से अधिक युवाओं को मेडिकल से जुड़े किसी भी कोर्स में दाखिला नहीं मिलेगा। कारण, भारत में सरकारी और निजी मेडिकल कॉलेजों में एमबीबीएस की 1.36 लाख से कुछ अधिक ही सीटें हैं। उसके बाद बीडीएस, आयुर्वेदिक, होम्योपैथी, यूनानी आदि में भी करीब 80,000 सीटें हैं। क्या व्यवस्था है कि युवा ने ‘नीट’ भी पास कर ली और वह किसी भी तरह डॉक्टर नहीं बन पाया! शेष 9 लाख से अधिक सफल युवा क्या एकदम असफल साबित हो जाएंगे? तो हमारे युवाओ! हिंसक आंदोलन क्यों करते हो? ये तो बंजर हैं! आत्महत्याएं इस व्यवस्था का समाधान नहीं हैं। देश की आजादी के कुछ साल बाद ही पेपर लीक की घटनाएं सामने आने लगी थीं, शिक्षा-प्रणाली में आज भी विसंगतियां हैं, शिक्षा मंत्री सवालिया होते रहे हैं, लेकिन अनशन कितने हुए? दरअसल राजधानी दिल्ली में आंदोलनजीवी, प्रदर्शनकारियों और उत्पातियों की एक पेशेवर जमात है। उसके चेहरे शाहीन बाग, अन्ना हजारे-केजरीवाल, महिला पहलवानों के प्रदर्शन और किसान आदि आंदोलनों में भी दिखाई दिए। वामपंथी तर्ज पर नारे लगाना और डफली बजाना इनकी खास पहचान है। सोनम वांगचुक के अनशन के दौरान भी यह जमात सक्रिय रही। उन्हें कौन ‘फंडिंग’ करता है? ‘मोदी मर जा’, ‘शाह मर जा’, ‘मोदी को पीटेंगे’, ‘अनुच्छेद 370’ और ‘आजादी, आजादी’ सरीखे नारों का शिक्षा की विसंगतियों और नीट पेपर लीक से क्या सरोकार है? यह उपद्रवियों की पेशेवर जमात का खास हुनर है, उनकी पेशेवर टे्रनिंग है। बीते सोमवार, 20 जुलाई, को संसद सत्र के पहले ही दिन, संसद भवन के 1.5 किमी. के दायरे में, हजारों युवाओं की ऐसी भीड़ आक्रोशित हो गई कि संसद भवन के सभी मोटे-बड़े मेन गेट बंद करने पड़े।
हजारों पुलिसकर्मियों के अलावा, अद्र्धसैनिक बलों, रैपिड एक्शन फोर्स, पानी की तेज बौछार मारने वाले बल के जवानों को सडक़ों पर उतारना पड़ा। देश की राष्ट्रीय सुरक्षा का मसला एकदम सामने आ गया। बेशक भारत सबसे युवा राष्ट्र है। उसकी करीब 65 फीसदी आबादी की औसतन उम्र 35 साल है। 15-29 साल के आयु-वर्ग के 56 करोड़ से अधिक युवा हैं। वे भारत की ताकत और भविष्य हैं, लिहाजा किसी भी सूरत में उनका भरोसा टूटना नहीं चाहिए। लेकिन जो भीड़ संसद भवन में घुसना चाहती थी, वह वामदलों, कांग्रेस, ‘आप’ के छात्र-संगठनों के पेशेवर चेहरे थे। अचानक मनीष सिसोदिया, संजय सिंह सांसद सरीखे आप नेता और सांसद डिंपल यादव के नेतृत्व में सपा का हुजूम सडक़ों पर कैसे आ गया? यकीनन यह राजनीतिक कवायद थी। अनशन और ‘संसद चलो’ का यह कथित आंदोलन पूरी तरह ‘राजनीतिक’ है, क्योंकि उनकी पहली मांग शिक्षा मंत्री धर्मेन्द्र प्रधान का इस्तीफा है। वांगचुक की भी इच्छा है कि विभिन्न सांसद और राजनीतिक दलों के प्रतिनिधि अस्पताल में आकर उनसे मिलें और उनकी मांगों पर आश्वासन दें। बहरहाल यदि यह शैक्षिक प्रदर्शन था, तो किन युवाओं ने पथराव किए, नतीजतन 5 आईपीएस अधिकारियों समेत 118 पुलिसकर्मी घायल हुए। यह कोई सामान्य आंकड़ा नहीं है। बेशक 60 से अधिक प्रदर्शनजीवी भी घायल हुए हैं। करीब 70 लोग हिरासत में लिए गए हैं। इस पूरे उपद्रव के दौरान एक ऐसा नाम सामने आता रहा, जो कीट-भाव पैदा करता है। कीट-मकौड़ों की जनता नहीं हुआ करती, उनका लोकतंत्र नहीं होता, तिलचट्टे घर-घर पैदा होते रहे हैं, लिहाजा ‘कॉकरोच जनता पार्टी’ हमारे लोकतंत्र और राजनीतिक दलों पर एक भद्दा मजाक है। उसे ‘राजनीतिक व्यंग्य’ भी नहीं मान सकते। उसका चुनाव आयोग में कोई पंजीकरण नहीं है और न ही इस नाम से मान्यता दी जानी चाहिए। जनता इनसानों की होती है, जो लोकतंत्र की वाहिका होती है। एक आंदोलन किसी मजाक के आधार पर जवाबदेह नहीं हो सकता, लिहाजा सरकार को सोचना चाहिए कि क्या देश में तिलचट्टों की जनता पार्टी को भी स्वीकृति दी जाए?



