संपादकीय

संवैधानिक है ‘सर’

सर्वोच्च अदालत ने चुनाव आयोग के ‘विशेष गहन पुनरीक्षण’ (एसआईआर) को पूरी तरह वैध और संवैधानिक करार दिया है। इसे स्वतंत्र, निष्पक्ष, पारदर्शी चुनाव और शुद्ध, साफ मतदाता सूची के संदर्भ में चुनाव आयोग का संवैधानिक अधिकार भी माना है। संविधान के अनुच्छेद 324 और जनप्रतिनिधित्व कानून की धारा 21 (3) का किसी भी तरह उल्लंघन स्वीकार नहीं किया है। ‘वोट चोरी’ और ‘नागरिकता छीन लेने’ सरीखे विपक्ष के आरोपों और याचिकाओं को भी खारिज कर दिया है। न्यायिक पीठ का मानना है कि मतदाता सूची से नाम कटने का अर्थ यह नहीं है कि आप भारत के नागरिक नहीं हैं। नागरिकता का अंतिम फैसला सक्षम अथॉरिटी (केंद्रीय गृह मंत्रालय) लेगी। अलबत्ता आयोग नागरिकता की सीमित जांच कर सकता है, ताकि पात्र मतदाता तय किया जा सके। नागरिकता का विचाराधीन निर्णय आगामी 2029 के लोकसभा चुनाव और उसके बाद के विधानसभा चुनावों तक ले लिया जाना चाहिए। सारांश यह है कि एसआईआर (सर) संवैधानिक है और आगे भी जारी रहेगा। सर्वोच्च अदालत ने किसी भी प्रकार की ‘रोक’ से साफ इंकार कर दिया। अधिकांश याचिकाएं बिहार के संदर्भ में थीं, लिहाजा ‘सर’ के तहत जिन 7.2 करोड़ नाम मतदाता सूचियों से काट दिए गए हैं, उन पर सर्वोच्च अदालत ने कुछ नहीं कहा। सवाल मौजू है कि क्या वे लोग विदेशी नागरिक या घुसपैठिए हैं? क्या उनके नाम न्यायिक समीक्षा के चक्रव्यूह में फंस कर रह जाएंगे? आयोग ऐसे लोगों का अधिकृत आंकड़ा ही दे दे, बेशक व्यक्ति की पहचान न बताए। यदि इन नामों में से अधिकांश भारत के नागरिक हैं, तो वे मतदाता क्यों नहीं हैं? बुनियादी संवैधानिक व्यवस्था यही है कि जो पात्र नागरिक है, वह मतदाता भी है, लेकिन ‘सर’ की प्रक्रिया और नीयत ने इस व्यवस्था को ही सवालिया और संदेहास्पद बना दिया है। कुछ उदाहरण गौरतलब हैं। एक महिला भारत सरकार के कृषि मंत्रालय के तहत एक विभाग में वरिष्ठ वैज्ञानिक थी और लंबी नौकरी के बाद वहीं से सेवानिवृत्त हुई।

उन्हें नियमित पेंशन भी मिलती है। चुनाव आयोग के छुटभैयों ने उनके वोटर होने पर ही सवाल खड़े कर दिए। उनसे मतदाता सूची में उनके पिता के नाम का ब्यौरा मांगा है, जबकि उनकी मृत्यु को कई साल बीत चुके हैं। एक वयस्क, भारत सरकार में प्रथम श्रेणी अधिकारी, सेवामुक्त और पेंशनभोगी-क्या ये आधार एक मतदाता होने के लिए पर्याप्त नहीं हैं? पश्चिम बंगाल चुनाव के दौरान कुछ अधिकारियों के चेहरे सामने आए। वे राज्य सरकार के कर्मचारी थे, नियमित वेतन पाते रहे थे, चुनाव में ड्यूटी कर रहे थे, लेकिन ‘सर’ में उनके नाम मतदाता सूची से काट दिए गए। चुनाव आयोग की संवैधानिकता, ‘सर’ की वैधता और लोकतंत्र के साथ इससे भद्दा और अवैध मजाक नहीं किया जा सकता। सवाल ‘तार्किक विसंगति’ का है। आयोग 14 राज्यों और संघशासित क्षेत्रों में ‘सर’ का अभियान समाप्त कर चुका है। 19 राज्यों और केंद्रशासित क्षेत्रों में अभी बाकी है। वहां जून से अभियान शुरू होने वाले हैं। अभी पांच राज्यों में चुनाव सम्पन्न हुए हैं, लेकिन ‘तार्किक विसंगति’ की व्यवस्था बंगाल में ही क्यों लागू की गई? वहां जिन 27 लाख से अधिक मतदाताओं के नाम काट दिए गए थे, उनमें से सिर्फ 6000 को ट्रिब्यूनल से न्याय मिला है। यदि यही गति रही, इतना ही वक्त लगता रहा, तो न्यायिक समीक्षा में 25 साल से अधिक का समय लग सकता है! हम न जाने किस योनि में होंगे? संविधान के मौलिक अधिकार ‘मताधिकार’ का क्या होगा? लोगों से पिता का ही नहीं, दादा का भी ब्यौरा पूछा और मांगा जा रहा है। क्या इससे पहले जो ‘सर’ अभियान चलाए गए थे, उनमें ऐसे ब्यौरे और दस्तावेज मांगे जा रहे थे? जिसने पहले कई बार वोट दिया है और वह साक्षात रूप में आयोग के सामने मौजूद है, उसका पासपोर्ट बना हुआ है। उस भारतीय को मतदाता होने से कौन और कैसे रोक सकता है? ऐसा महसूस होने लगा है कि मतदाता सरकार को नहीं, बल्कि सरकार मतदाताओं को चुनेगी और फिर इसी तर्ज पर चुनाव होंगे! क्या आपको भारत में ऐसा लोकतंत्र स्वीकार है? सभी पक्षों को सुनकर ही कोई फैसला होना चाहिए।

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