संपादकीय

‘भारतीय’ साबित करो

क्या हम, आप और देश के करोड़ों लोग ‘भारतीय’ हैं? क्यों…यह सवाल क्यों उठना चाहिए? यकीनन हम ‘भारतीय’ हैं, लेकिन जीवन के किसी मोड़ पर आप को कहा जाए कि ‘भारतीयता’ साबित करो, तो आप क्या करेंगे? असमर्थ और असहाय महसूस करेंगे, क्योंकि यह बेहद पेचीदा मामला बन गया है। भारत सरकार के विदेश मंत्रालय ने स्पष्ट किया है कि पासपोर्ट महज एक यात्रा दस्तावेज है, नागरिकता का प्रमाणपत्र नहीं है। यह व्यवस्था 1967 से जारी है, जब पासपोर्ट कानून बनाया गया था। सर्वोच्च अदालत भी 2006 और 2013 में दो महत्वपूर्ण फैसले सुना चुकी है कि पासपोर्ट नागरिकता का प्रमाणपत्र नहीं है। 2013 में ही बंबई उच्च न्यायालय भी ऐसा ही फैसला सुना चुका है। तत्कालीन मनमोहन सरकार ने भी उच्च न्यायालय में हलफनामा देकर स्पष्ट किया था कि पासपोर्ट नागरिकता का दस्तावेज नहीं है। मंत्रालय ने यह भी स्पष्ट किया चूंकि विशेष परिस्थितियों में पासपोर्ट गैर-भारतीय को भी जारी किया जाता रहा है, लिहाजा इसे नागरिकता का प्रमाण नहीं माना जा सकता। सवाल है कि पासपोर्ट के कवर पर ‘भारतीय गणराज्य’ अंकित होता है और शेष विश्व में उस दस्तावेज का धारक ‘भारतीय’ माना जाता है। उसकी पहचान ‘भारतीय’ के तौर पर होती है। फिर पासपोर्ट नागरिकता का आधार क्यों नहीं है? ‘गैर-भारतीय’ के पासपोर्ट पर उसकी नागरिकता का उल्लेख किया जाता है। बहरहाल पासपोर्ट की बहस यहीं रोक देते हैं, लेकिन करीब 134 करोड़ देशवासियों के पास ‘आधार कार्ड’ हैं। 97 करोड़ से अधिक देशवासियों को ‘मतदाता पहचानपत्र’ जारी किए गए हैं। देश का नागरिक ही मतदाता बन सकता है, लिहाजा मतदाता पहचानपत्र परोक्ष रूप से नागरिकता की पुष्टि करता है। करोड़ों भारतीयों के पास राशन कार्ड, पैनकार्ड, भूमि स्वामित्व के दस्तावेज और जन्म प्रमाणपत्र हैं। ये तमाम दस्तावेज सरकारी हैं और सरकारी विभागों ने ही जारी किए हैं। इन्हीं के आधार पर सरकारें 81.35 करोड़ लोगों को 5 किलो मुफ्त राशन हर माह बांटती हैं। क्या विदेशियों को यह राशन बांटा जा रहा है?

बहरहाल ‘आधार कार्ड’ की मांग सर्वाधिक है, क्योंकि यह धारक की पहचान का प्रमाणपत्र है, लेकिन सरकार इसे भी नागरिकता का आधार नहीं मानती। ‘आधार कार्ड’ धारक की पहचान के मायने क्या हैं? धारक का नाम, पिता/पति का नाम, जन्मतिथि, संपर्क-सूत्र और बेहद संवेदनशील बॉयोमीट्रिक डाटा इस कार्ड में निहित है। ऐसी पहचान का व्यक्ति ‘भारतीय’ क्यों नहीं है? आश्चर्य है…मोदी सरकार की इन व्यवस्थाओं पर..! आखिर इतने सरकारी कार्ड, दस्तावेजों का औचित्य क्या है? खत्म करो इन्हें। गंभीर और संवेदनशील सवाल है कि औसत भारतीय अपनी नागरिकता किस आधार पर साबित करे? यदि मोदी सरकार देश में ‘नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटिजन’ (एनआरसी) की व्यवस्था लागू करना चाहती है और उसे मानक नागरिकता दस्तावेज की मान्यता देना चाहती है, तो स्पष्ट करे। बहानों और बेजा दलीलों की आड़ में छिप कर 147 करोड़ से अधिक ‘भारतीयों’ की नागरिकता पर सवाल उठाना न तो राष्ट्रवाद है और न ही देशहित में है। एनआरसी की व्यवस्था 1952 से शुरू की गई थी, संविधान में भी प्रावधान है, लेकिन आज तक यह व्यवस्था देश भर में लागू नहीं हो सकी। राजनीतिक तौर पर एक विशेष समुदाय को डराया जरूर जाता रहा है। असम में यह प्रयोग फ्लॉप रहा। वहां मुसलमान कम और ज्यादा बंगाली हिंदू निकले। असमंजस रहा कि किसे एनआरसी की आड़ में देश के बाहर खदेड़ा जाए, लिहाजा प्रयोग वहीं बंद कर दिया गया। नागरिकता कानून भी 1955 का है, लेकिन उसमें भी 2003, 2015, 2019 और 2025 में संशोधन किए गए। तमाम संशोधन भाजपा-एनडीए की सरकार के दौरान किए गए। इसके बावजूद सरकार नागरिकता के मानक आधार तय नहीं कर पाई। दलीलें दी जाती रही हैं कि दस्तावेज फर्जी, नकली भी बनते रहे हैं। यह सरकार के लिए लानत, अक्षमता, शर्मिन्दगी का मामला है कि सरकार आजादी के 79 साल के बाद भी नागरिक और घुसपैठिए में अंतर नहीं कर पाई है। जो भारतीय बीते 45 साल से मतदान करता रहा है, जन्म के बाद उम्र के 70 साल भी भारत की मिट्टी और फिजाओं में जिए हैं, उससे भी चुनाव आयोग प्रमाण मांग रहा है। दशकों पहले दिवंगत हुए माता-पिता के ‘भारतीय’ दस्तावेज मांगे जा रहे हैं। क्या यह संभव है? हम किस देश में बसे हैं, यह भी अनिश्चित, अप्रमाणित है। सरकार को इस संबंध में अपनी नीति पर फिर से विचार करना चाहिए।

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