भारत में अब अमेरिका से आ रहा अंधाधुंध पैसा, एफडीआई में मॉरीशस छूटा पीछे, नंबर-1 कौन

नई दिल्ली: भारत में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (FDI) के मामले में अमेरिका दूसरा सबसे बड़ा सोर्स बनकर उभरा है। पिछले वित्त वर्ष (2025-26) के दौरान अमेरिका ने मॉरीशस को पीछे छोड़ दिया। कंपनियों द्वारा टैक्स-फ्रेंडली देशों (टैक्स हेवन) के रास्ते फंड रूट करने के बजाय सीधे भारत में निवेश करने के फैसले के चलते 2025-26 में अमेरिका से इक्विटी निवेश दोगुने से अधिक बढ़कर 11 अरब डॉलर के पार पहुंच गया।
भारत में एफडीआई के मामले में सिंगापुर अभी भी पहले स्थान पर है। टाइम्स ऑफ इंडिया के मुताबिक वित्तीय सेवा क्षेत्र में बड़े निवेश के चलते जापान से आने वाले निवेश में भी भारी उछाल देखा गया। हाल ही में वाणिज्य और उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने कहा था कि अमेरिकी कंपनियों ने हाल के महीनों में करीब 60 अरब डॉलर के निवेश की प्रतिबद्धता जताई है।
निवेश के पैटर्न में आया बदलाव
- मॉरीशस के साथ टैक्स संधि में संशोधन के बाद से भारत में निवेश के लिए सिंगापुर सबसे पसंदीदा रूट बनकर उभरा है। पिछले वित्त वर्ष के दौरान कुल इक्विटी प्रवाह में सिंगापुर की हिस्सेदारी करीब एक-तिहाई रही।
- निवेशक टैक्स हेवन देशों को पूरी तरह नजरअंदाज नहीं कर रहे हैं। केमैन आइलैंड्स से भारत में होने वाला निवेश 2024-25 के 371 मिलियन डॉलर से बढ़कर पिछले साल 2.1 अरब डॉलर पर पहुंच गया। हालांकि, अधिकारियों का मानना है कि ऐसा कुछ चुनिंदा बड़े निवेशों के कारण हुआ है।
किन सेक्टर में आया ज्यादा निवेश?
पिछले वर्ष एफडीआई के सेक्टोरल आवंटन (Sectoral Allocation) में भी बड़ा बदलाव देखने को मिला है। इस दौरान इन सेक्टर में ज्यादा निवेश देखने को मिला:
| सेक्टर | निवेश की स्थिति | मुख्य कारण |
| कंप्यूटर हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर | सर्विसेज सेक्टर को पछाड़कर शीर्ष पर पहुंचा | डेटा सेंटर्स में निवेश की भारी बाढ़ |
| फूड प्रोसेसिंग | इक्विटी निवेश में 5 गुना से अधिक का उछाल | घरेलू मांग और सरकारी नीतियां |
| सी ट्रांसपोर्ट और शिपिंग | करीब 2 अरब डॉलर के साथ 30 गुना की रिकॉर्ड वृद्धि | लॉजिस्टिक्स और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में सुधार |
आत्मनिर्भरता पर सरकार का जोर
वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने कहा कि सरकार निवेश को बढ़ावा देने के लिए कई प्रस्तावों पर काम कर रही है। उन्होंने स्पष्ट किया, हम आत्मनिर्भरता बढ़ाने से जुड़ी चुनौतियों पर लगातार काम कर रहे हैं, विशेष रूप से उन क्षेत्रों में जहां हमारी सप्लाई चेन (आपूर्ति श्रृंखला) गंभीर रूप से कुछ खास भौगोलिक क्षेत्रों (देशों) पर निर्भर हैं।



