कांग्रेस के लिए सिद्धारमैया को नजरअंदाज करना मुश्किल

अमरीका में एक अश्वेत युवक की पुलिसकर्मियों ने हत्या कर दी थी। इससे पूरे अमरीका में बवाल मच गया था। 25 मई 2020 को मिनियापोलिस शहर में डेरेक शॉविन नामक एक श्वेत पुलिस अधिकारी ने जॉर्ज फ्लॉयड नाम के निहत्थे अश्वेत व्यक्ति की गर्दन पर लगभग 9 मिनट तक अपना घुटना दबाए रखा था, जिससे दम घुटने से उनकी मौत हो गई थी। इस घटना का वीडियो वायरल होने के बाद ‘ब्लैक लाइव्स मैटर’ आंदोलन के तहत अमरीका के सभी 50 राज्यों में ऐतिहासिक प्रदर्शन हुए। आरोपी पुलिस अधिकारी को हत्या का दोषी ठहराया गया और 2021 में उसे 22.5 साल की जेल की सजा सुनाई गई। इसके विपरीत भारत में पुलिस हिरासत में मौतें साधारण घटनाओं में शुमार हैं। सरकारी तंत्र को ऐसी मौतों से खास फर्क नहीं पड़ता। सरकार ऐसी मौतों को कभी गंभीरता से नहीं लेती। कारण साफ है ऐसी मौतों में कहीं न कहीं प्रत्यक्ष या परोक्ष तौर पर सत्तातंत्र जिम्मेदार होता है। यही वजह है कि हिरासत में मौतें जैसे बेहद अमानवीय और संवदेनशील मुद्दे पर भी सरकारें खामोश रहती हैं। विपक्ष जरूर कुछ शोर मचाता है, किन्तु विपक्ष जब सत्ता में रहा होता है, तब भी ऐसी मौतें होती रही हैं, इसलिए सत्ता पक्ष द्वारा गढ़े मुर्दे उखाड़े जाने के भय से विपक्ष प्राय: चुप्पी ही साधे रहता है। अदालतों ने भारत में पुलिस हिरासत में मौतें रोकने के प्रयास किए हैं, किन्तु सफल नहीं हो पाई। सुप्रीम कोर्ट ने हिरासत में होने वाली हिंसा को व्यवस्था पर धब्बा बताया था। ऐसी मौतों के मामले में सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने सख्त सवाल पूछा था कि क्या केंद्र सरकार हमें हल्के में ले रही है? सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने कहा, ‘अब यह देश इसे बर्दाश्त नहीं करेगा। यह सिस्टम पर धब्बा है। हिरासत में मौतें नहीं हो सकतीं।’ शीर्ष अदालत ने पूरे भारत के पुलिस स्टेशनों में काम न कर रहे सीसीटीवी कैमरों के मुद्दे पर स्वत: संज्ञान लेकर सुनवाई करने के दौरान केंद्र सरकार के खिलाफ यह सख्त टिप्पणी की थी। हिरासत में मौतों पर अपवादस्वरूप ही दोषी पुलिसकर्मियों को अदालतों से सजा मिल पाती है।
अप्रैल 2026 में, एक ऐतिहासिक और दुर्लभतम फैसले में मदुरै की एक अदालत ने वर्ष 2020 में पुलिस हिरासत में एक पिता (पी. जयराज) और पुत्र (जे. बेनिक्स) की बेरहमी से हत्या करने के मामले में 9 पुलिसकर्मियों को फांसी (मृत्युदंड) की सजा सुनाई। जबकि अधिकतर मामलों में सबूतों के अभाव या गवाहों के मुकरने के कारण पुलिसकर्मियों को दोषी ठहराना मुश्किल होता है, जिसके चलते कई मामलों में पुलिसकर्मियों को केवल विभागीय कार्रवाई का सामना करना पड़ता है या वे बरी हो जाते हैं। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के अनुसार वर्ष 2024 में 2739 लोगों की पुलिस हिरासत में मौत हो गई थी। हिरासत में यातना सत्ता तंत्र की शक्ति और संवैधानिक मूल्यों का घोर दुरुपयोग है। ऐसा इसलिए, क्योंकि हिरासत में रखे गए लोग कमजोर और असुरक्षित स्थिति में होते हैं और वहां शक्ति का संतुलन भी उनके खिलाफ होता है। जवाबदेही तय करने की स्वतंत्र जांच नहीं हो पाती है, क्योंकि हिरासत में हुई मौतों की जांच अक्सर उसी पुलिस विभाग द्वारा की जाती है, जिनके संरक्षण में ऐसी घटना घटित होती है।
यातना के उपयोग को पुलिस बल के भीतर हिंसा की संस्कृति को बढ़ावा देने से जोड़ा गया है। भारत में यातना (टॉर्चर) को रोकने या उससे निपटने के लिए अब तक कोई विशेष, स्वतंत्र कानून नहीं बन पाया है। यद्यपि भारत ने 1997 में ‘संयुक्त राष्ट्र यातना विरोधी सम्मेलन’ पर हस्ताक्षर किए थे, लेकिन वर्तमान में यातना से निपटने के लिए भारतीय दंड संहिता और भारतीय संविधान के प्रावधानों का ही उपयोग किया जाता है। यातना निवारण विधेयक 2010 में लोकसभा द्वारा पारित किया गया था, जिसका उद्देश्य संयुक्त राष्ट्र के सम्मेलन की पुष्टि करना और यातना को स्पष्ट रूप से दंडनीय अपराध बनाना था। हालांकि प्रवर समिति को भेजे जाने और संशोधनों की सिफारिशों के बाद, यह विधेयक लैप्स हो गया और कानून का रूप नहीं ले सका। मानवाधिकार समूहों का कहना है कि भारत में हर साल सैकड़ों लोग हिरासत में मारे जाते हैं। उनका कहना है कि संदिग्धों से जबरन कबूलनामा निकलवाने के लिए यातना और दुव्र्यवहार करना पुलिसिंग का हिस्सा बन गया है। संयुक्त राष्ट्र के कई विशेषज्ञों ने भारत से अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार मानकों के अनुरूप पुलिस व्यवस्था को आधुनिक बनाने के लिए बड़े सुधार करने का आह्वान किया था। लेकिन केंद्र सरकार ने इस पर ध्यान नहीं दिया। जब हिरासत में मौतों को लेकर देश की सरकारों को खास फर्क नहीं पड़ता, तब अमरीकी विदेश मंत्री को अमरीका में मौजूद मामूली से नस्लवाद को लेकर शर्मिंदा होना देश के नेताओं को आईना दिखाने जैसा है।
योगेंद्र योगी



