संपादकीय

व्यापार घाटे का ब्रिक्स

ब्रिक्स शिखर सम्मेलन का आगाज हो चुका है। चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के आगमन की भी पुष्टि हो चुकी है। शुक्रवार को प्रधानमंत्री मोदी और रूसी राष्ट्रपति पुतिन के बीच द्विपक्षीय मुलाकात हुई। कई समझौते परवान चढ़े। उनका विश्लेषण अलग से किया जाएगा। दरअसल हमने ईरान युद्ध के संदर्भ में इस शिखर सम्मेलन का विश्लेषण किया था। आज भारत की अर्थव्यवस्था, ब्रिक्स देशों के साथ व्यापार और भारत के निरंतर घाटे की चर्चा कर रहे हैं। ईरान, संयुक्त अरब अमीरात, सऊदी अरब भी ब्रिक्स के सदस्य देश हैं। फिलहाल उनके बीच एक विनाशक, विध्वंसक युद्ध जारी है। ईरान ने उनके तेल ठिकानों, रिफाइनरियों, संयंत्रों पर ऐसे हमले किए हैं कि उनके उत्पादन खत्म हो गए हैं या वे भस्म हो गए हैं, नतीजतन दुनिया संकट में है। हालांकि अमरीका-इजरायल इस युद्ध के ‘नरसंहारी चेहरे’ हैं। ईरान युद्ध के कारण अभी तक भारत को 2 लाख करोड़ रुपए से अधिक का ‘राजकोषीय धक्का’ लग चुका है। यह अनुमान है, जबकि हकीकत इससे ज्यादा हो सकती है! इसी के कारण हमारा चालू खाता घाटा भी जीडीपी का 1.9 फीसदी से 2 फीसदी तक बढ़ चुका है। विशेषज्ञों के आकलन हैं कि 2026-27 की आखिरी विकास दर 6.5 फीसदी के करीब हो सकती है, लिहाजा एक तिमाही की 7.8 फीसदी विकास दर पर अधिक फुलफुलाना नहीं चाहिए। भारत ब्रिक्स देशों-चीन, रूस, अमीरात, सऊदी, ब्राजील-के साथ लगातार कारोबार करता रहा है, लेकिन चिंता की बात यह है कि हम लगातार व्यापार-असंतुलन के शिकार हो रहे हैं और भारत आज तक ‘निराश्रित’, असहाय, लाचार है। ‘आत्मनिर्भरता’ तो बहुत दूर की कौड़ी है। चीन के साथ भारत का व्यापार-घाटा 9.92 लाख करोड़ रुपए का है, तो रूस की तुलना में भारत 4.48 लाख करोड़ रुपए के घाटे में है। संयुक्त अरब अमीरात के साथ करीब 2.34 लाख करोड़ रुपए और सऊदी अरब के साथ भी करीब 1.81 लाख करोड़ रुपए का व्यापार-घाटा हम झेल रहे हैं। ब्राजील सरीखे अपेक्षाकृत छोटे देश के साथ भी भारत का व्यापार-घाटा करीब 9579 करोड़ रुपए का है।

भारत ब्रिक्स देशों के साथ करीब 40 लाख करोड़ रुपए का कुल व्यापार करता है, जिसमें हमारा व्यापार-घाटा 21.14 लाख करोड़ रुपए का है। भारत का 2026 में अभी तक निर्यात 21.7 फीसदी है, जबकि आयात 41.5 फीसदी है। वैश्विक स्तर पर यह सूची बहुत लंबी है। बेशक ब्रिक्स अंतरराष्ट्रीय कूटनीति, विदेश नीति, बहुपक्षीय व्यापार और अन्य सहयोगों का मंच है, लेकिन भारत सरीखे मुख्य किरदार वाले देश के आर्थिक-व्यापारिक अंतर्संबंध ‘असंतुलित’ हों, तो कब तक झेला जा सकता है? हमें पता है कि इस असंतुलन और घाटे की चर्चा ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के दौरान नहीं होगी, क्योंकि भारत सरकार स्वीकार ही नहीं करेगी कि वाकई व्यापारिक असंतुलन की स्थिति है। बहरहाल भारत पर आज करीब 225 लाख करोड़ रुपए का कर्ज है। जाहिर है कि आय और व्यय, आयात और निर्यात में गंभीर असंतुलन होंगे, तो इतना कर्ज उठाना पड़ा है। ब्रिक्स के न्यू डवलपमेंट बैंक ने भी हमारी कई परियोजनाओं को पैसा दिया है। वह भी कर्ज ही होगा! दरअसल यह व्यापार-घाटा किसी एक सरकार के कार्यकाल का नहीं है। हमने दुर्लभ खनिज, फार्मा के कच्चे माल, यूरिया, मैन्यूफैक्चरिंग के विभिन्न उपकरण आदि के उत्पादन पर गंभीर ध्यान ही नहीं दिया अथवा गंभीर प्रयास नहीं किए, लिहाजा दूसरे देशों, खासकर चीन, पर हमारा आश्रय बढ़ता रहा है। अलबत्ता मोबाइल निर्माण में हम विश्व के दूसरे स्थान के देश बन सकते हैं या करीब 2 लाख करोड़ रुपए के रक्षा-उत्पादन का लक्ष्य हासिल कर सकते हैं, तो अन्य वस्तुओं, सेवाओं, उपकरण, कच्चे माल के लिए भारत 21वीं सदी में भी मोहताज क्यों है? कच्चे तेल, एलपीजी, एलएनजी के आयात समझ में आते हैं, क्योंकि ऐसे स्रोत भारत में ‘नगण्य’ हैं अथवा तलाशे जा रहे हैं, लेकिन ‘टेक्निकल ग्रेड’ का 60 फीसदी यूरिया दुबई (संयुक्त अरब अमीरात) और मिस्र से आज भी आयात क्यों करना पड़ रहा है? ईरान युद्ध के कारण फिलहाल यह बाधित है। हम पहले ईरान से भी कच्चा तेल आयात करते थे। ‘रुपए’ में लेन-देन होता था। ईरान के करीब 60,000 करोड़ रुपए भारतीय बैंक में जमा होते थे। अब ब्रिक्स के मौके पर सवाल है कि क्या भारत ईरान से तेल खरीदने का अनुबंध एक बार फिर करेगा? इन आर्थिक सवालों पर प्रधानमंत्री द्विपक्षीय संवाद के दौरान चर्चा जरूर करें। ज्यादा आयात के कारण जो घाटा हो रहा है, उससे निपटना होगा।

Show More

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button