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जब भारत के पहले ‘ब्रह्मास्त्र’ ने भरी हुंकार, थर्रा उठा चीन और पाकिस्तान, अब DRDO ने लॉन्‍च किया सबसे घातक वर्जन

Journey Of Prithvi Missile: दशकों से भारत के खिलाफ साजिश का जाल बुनते चीन और पाकिस्‍तान के लिए पृथ्‍वी मिसाइल किसी बड़े झटके से कम नहीं थी. दरअसल इंटीग्रेटेड गाइडेड मिसाइल डेवलपमेंट प्रोग्राम के तहत तैयार हुई पृथ्‍वी सिर्फ एक मिसाइल नहीं थी, बल्कि भारत के लिए उस दौर में तकनीकी आत्मनिर्भरता की एक बड़ी शुरुआत भी थी. आज भले ही पृथ्वी मिसाइल के कुछ वर्जन सर्विस से बाहर हो चुके हैं, लेकिन भारतीय मिसाइल प्रोग्राम में इसकी भूमिका को कम नहीं आंका जा सकता. पृथ्‍वी से मिली सफलता ने भारत को बैलिस्टिक मिसाइल टेक्‍नोलॉजी की दिशा में आगे बढ़ने का ऐसा रास्ता दिखाया.

इसके बाद, बैलिस्टिक मिसाइल के इस सफर में अग्नि, आकाश, त्रिशूल और नाम से होते हुए ब्रह्मोस तक पहुंच चुका है. लेकिन, आज बात सिर्फ भारत के मिसाइल प्रोग्राम का आगाज करने वाली पृथ्‍वी मिसाइल के पूरे सफर की करेंगे. डिफेंस एक्‍सपर्ट्स के अनुसार, पृथ्वी की कहानी 1983 में शुरू हुई थी. उस समय भारत ने अपनी मिसाइल टेक्‍नोलॉजी को मजबूत करने के लिए इंटीग्रेटेड गाइडेड मिसाइल डेवलपमेंट प्रोग्राम यानी IGMDP शुरू किया था. तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की सरकार ने इस प्रोग्राम को मंजूरी दी थी. इसका मकसद भारत को अलग-अलग तरह की मिसाइल टेक्‍नोलॉजी के मामले में आत्मनिर्भर बनाना था.

  1. IGMDP का पहला पड़ाव थी पृथ्‍वी मिसाइल
    भारत के आधुनिक मिसाइल प्रोग्राम की शुरूआत 1983 में इंटीग्रेटेड गाइडेड मिसाइल डेवलपमेंट प्रोग्राम के जरिए की गई थी. डिफेंस रिसर्च एंड डेवलपमेंट ऑर्गनाइजेशन (डीआरडीओ) इस प्रोग्राम के तहत पांच मिसाइलों पर काम करना शुरू हुआ. इन मिसाइलों में अग्नि, पृथ्वी, आकाश, त्रिशूल और नाग शामिल थीं. इन सभी में सबसे पहले पृथ्वी मिसाइल वजूद में आई और भारत ने बैलिस्टिक मिसाइल प्रोग्राम की तरफ अपना मजबूत कदम बढ़ा दिए. पृथ्‍वी मिसाइल तैयार के दौरान भार‍तीय वैज्ञानिकों ने प्रोपल्शन, गाइडेंस, लॉन्च सिस्टम और मिसाइल डिजाइन जैसी टेक्‍नोलॉजी को बेहद करीब से समझा. इस समझ का फायदा दूसरी मिसाइल को तैयार करने के दौरान मिला.
  2. 25 फरवरी 1988 को हुआ पहला सफल परीक्षण
    पृथ्वी मिसाइल का पहला सफल परीक्षण 25 फरवरी 1988 को श्रीहरिकोटा से किया गया था. यह भारत के लिए सिर्फ एक मिसाइल टेस्ट नहीं, बल्कि सामरिक क्षमता के लिहाज से एक बड़ा पड़ाव हासिल किया था. उस दौर में बैलिस्टिक मिसाइल टेक्‍नोलॉजी दुनिया के सीमित देशों के पास थी. ऐसे में भारत का इस टेक्‍नोलॉजी को तैयार कर चीन और पाकिस्‍तान ही नहीं, पूरी दुनिया को चौंकने पर मजबूर कर दिया था. पहले परीक्षण के बाद पृथ्वी को लगातार अलग-अलग परिस्थितियों में टेस्ट किया गया. हर परीक्षण के साथ इसकी टेक्‍नोलॉजी, गाइडेंस सिस्टम और ऑपरेशनल कैपेबिलिटी को बेहतर बनाया गया. शुरुआती परीक्षणों से मिले अनुभव ने वैज्ञानिकों को मिसाइल के निशाने को बेहद सटीक और भरोसेमंद बनाया गया.
  3. तीनों सेनाओं के लिए अलग-अलग वर्जन तैयार किए गए
    पृथ्वी मिसाइल को सिर्फ एक ही सेना के इस्तेमाल के लिए नहीं बनाया गया था. भारत की तीनों सेनाओं की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए इसके अलग-अलग वर्जन तैयार किए गए. भारतीय सेना के लिए पृथ्वी-1 तैयार की गई, जबकि भारतीय वायुसेना और बाद में स्ट्रैटेजिक फोर्सेज कमांड के लिए पृथ्वी-2 को डेवलप किया गया. वहीं भारतीय नौसेना की जरूरतों को ध्‍यान में रखते हुए पृथ्वी-3 किया गया, जिसे बाद में धनुष मिसाइल के नाम से जाना गया. पृथ्वी-1 की रेंज करीब 150 किमी और पेलोड क्षमता करीब 1,000 किलो थी. पृथ्वी-2 की रेंज करीब 250 से 350 किमी तक थी. वहीं नौसेना के लिए तैयार धनुष की रेंज करीब 350 किमी थी. डीआरडीओ ने समय के साथ बदलती जरूरतों को देखते हुए इन मिसाइलों को समय-समय में अपडेट भी किया.
  4. पृथ्वी-1 की जद में थे भारत के दुश्‍मनों के तमाम ठिकाने
    पृथ्वी-1 को भारतीय सेना की जरूरतों को ध्यान में रखकर तैयार किया गया था. इसकी रेंज करीब 150 किमी थी और यह लगभग 1000 किलो तक का पेलोड ले जाने में सक्षम थी. इसका मकसद युद्ध के दौरान दुश्मन के तमाम अहम ठिकानों को अपने निशाने की जद में लाना था. इसे 1994 के आसपास भारतीय सेना में शामिल किया गया. उस समय के हिसाब से मोबाइल लॉन्चर से लॉन्च होने वाली इस तरह की मिसाइल भारत के लिए बड़ी उपलब्धि थी. पृथ्वी-1 को सड़क के रास्ते एक जगह से दूसरी जगह ले जाकर तैनात किया जा सकता था. पृथ्वी-1 की इसी खासियत ने मिसाइल की ऑपरेशनल यूटिलिटी काफी बढ़ा दी थी. समय के साथ मिसाइल टेक्‍नोलॉजी में काफी बदलाव किए गए.
  5. अब फाइटर जेट से भी फायर की जा सकती थी पृथ्वी मिसाइल
    पृथ्वी-1 जमीन से जमीन पर हमला करने के लिए तैयार की गई थी, लेकिन युद्ध की बदलते तरीकों को देखते हुए इसके अपग्रेडेशन का काम शुरू हुआ. पृथ्‍वी मिसाइल का नया वर्जन पृथ्वी-2 था, जिसे खासतौर पर भारतीय वायुसेना की जरूरतों को ध्‍यान में रखकर तैयार किया गया था. बाद में, इस पृथ्वी-2 को स्ट्रैटेजिक फोर्सेज कमांड से भी जोड़ दिया गया. इसकी रेंज करीब 250 से 350 किमी तक थी और यह 500 से 1,000 किलो तक का पेलोड ले जा सकती है. डीआरडीओ की इस नई मिसाइल की खासियत सिर्फ इसकी रेंज या पेलोड तक सीमित नहीं थी, बल्कि इसके गाइडेंस सिस्‍टम ने निशाने को बेहद सटीक बना दिया था. 27 जनवरी 1996 को ओडिशा के चांदीपुर स्थित इंटीग्रेटेड टेस्ट रेंज से इसका सफल परीक्षण किया गया था. परीक्षण के दौरान मिसाइल ने तय किए गए सभी टेक्निकल और ऑपरेशनल मानकों को पूरा किया था.
  6. धनुष नाम से नौसेना के लिए तैयार की गई पृथ्वी-3 मिसाइल
    पृथ्वी मिसाइल फेमिली का तीसरा वर्जन पृथ्वी-3 था, जिसे ‘धनुष’ के नाम से जाना गया. इसे भारतीय नौसेना की जरूरतों को ध्यान में रखकर तैयार किया गया था. यह जमीन से लॉन्च होने वाली सामान्य मिसाइल को अब वॉर शिप से भी लॉन्च किया जा सकता था. इसकी रेंज करीब 350 किमी थी और इसमें करीब 500 किलो तक का पेलोड ले जाया जा सकता था. इसका सफल परीक्षण 2004 में किया गया था. डिफेंस एक्‍सपर्ट्स के अनुसार, धनुष नाम को लेकर अक्सर भ्रम होता है. भारतीय सेना की 155 एमएम स्वदेशी धनुष हॉवित्जर तोप और पृथ्वी-3 मिसाइल यानी धनुष दो अलग-अलग वैपन सिस्‍टम हैं. दोनों का नाम एक जैसा है, लेकिन टेक्‍नोलॉजी, इस्तेमाल और इनका रोल पूरी तरह अलग है.
  7. पृथ्वी मिसाइल की ताकत कैसे बन गई सेना के लिए नई चुनौती
    शुरूआती दौर में, पृथ्वी मिसाइल में लिक्विड फ्यूल प्रोपल्शन सिस्टम का इस्तेमाल किया जाता था. यह सिंगल-स्टेज सिस्‍टम था, जिसमें रेड फ्यूमिंग नाइट्रिक एसिड यानी ऑक्सीडाइजर और हाइड्राजिन बेस्‍ट फ्यूल का इस्तेमाल किया जाता था. उस समय यह टेक्‍नोलॉजी काफी अहम थी, क्योंकि इससे मिसाइल को जरूरी पॉवर के साथ टारगेट को बर्बाद करने में मदद मिलती थी. लेकिन लिक्विड फ्यूल सिस्टम की अपनी चुनौतियां भी थीं. इस तरह के फ्यूल को मैनेज करना आसान नहीं था. चूंकि यह फ्यूल काफी करोसिव सेंसिटिव था, लिहाजा मिसाइल को लंबे समय तक तैयार हालत में रखने में भी दिक्कत आती थी. जरूरत पड़ने पर लॉन्च से पहले फ्यूल भरने का प्रॉसेस भी काफी लंबा था और इसमें काफी समय लगता था. इन्‍हीं दिक्‍कतों को ध्‍यान में रखते हुए अग्नि मिसाइल के लिए नया फ्यूल खोजा जाने लगा.
  8. गाइडेंस सिस्टम ने पृथ्वी का अचूक हुआ निशाना
    डिफेंस एक्‍सपर्ट के अनुसार, किसी भी मिसाइल की असली ताकत सिर्फ उसकी रेंज या पेलोड नहीं होती, बल्कि उसका सटीक निशाना भी होता है. अपग्रेडेशन के दौरान, पृथ्वी को इनर्शियल नेविगेशन सिस्टम यानी आईएनएस बेस्‍ड गाइडेंस टेक्‍नोलॉजी से भी लैस किया गया. यह सिस्टम टायरेट की मौजूदगी के हिसाब से मिसाइल की दिशा को तय करता था. पृथ्वी-2 में बदलाव का दौर यहीं नहीं थमा. उसके गाइडेंस सिस्टम को मैनूवरिंग ट्रेजेक्टरी से भी लैस किया गया. मिसाइल के इस अपग्रेडेशन के बाद इस मिसाइल को किसी भी एयर डिफेंस सिस्टम के लिए रोकना भी संभव नहीं था.
  9. मोबाइल लॉन्चर ने बढ़ाई इसकी स्ट्रैटेजिक यूटिलिटी
    पृथ्वी मिसाइल की एक बड़ी खासियत इसका मोबाइल लॉन्च सिस्टम है. इसे ट्रांसपोर्टर-इरेक्टर-लॉन्चर यानी TEL से लॉन्च किया जाता था. यानी मिसाइल को एक जगह पर स्थायी तौर पर रखने के बजाय जरिए जरूरत के हिसाब से दूसरी जगह ले जाया जा सकता है. मोबाइल लॉन्चर की वजह से मिसाइल को अलग-अलग जगहों पर तैनात करना भी आसान है. साथ ही, दुश्‍मन की निगाह से इस मिसाइल को छिपाना भी आसान है. डिफेंस एक्‍सपर्ट्स के अनुसार, किसी भी तनावपूर्ण की स्थिति में जरूरत के हिसाब से मिसाइल यूनिट को एक जगह से दूसरी जगह भेजा जा सकता है.
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