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फुटबॉल छूटने पर बहाए आंसू, कोच की सलाह पर खेलने लगी हॉकी, कौन हैं धोनी को आइडल मानने वाली बिचू देवी

नई दिल्ली. खेल के मैदान पर कभी-कभी एक सेकंड का फैसला पूरी तकदीर बदल देता है. महिला हॉकी विश्व कप में जब भारत और इंग्लैंड के बीच मुकाबला अपनी अंतिम सांसें गिन रहा था, तब घड़ी की सुई में सिर्फ 30 सेकंड बचे थे. इंग्लैंड की टीम लगातार हमले बोल रही थी और भारतीय खेमे की सांसें थमी हुई थीं. ठीक उसी क्षण भारत की गोलकीपर बिचू देवी ने अपनी बायीं ओर एक हैरतअंगेज डाइव लगाई और गेंद को गोल पोस्ट में समाने से रोक दिया. यह सिर्फ एक शानदार बचाव नहीं था, बल्कि भारतीय टीम के लिए टूर्नामेंट के अगले दौर का टिकट था. 0-0 से ड्रॉ रहे इस मैच की असली नायक मणिपुर की वही बेटी थी, जो कभी हॉकी स्टिक छूना भी नहीं चाहती थी.

बिचू देवी (Bichu Devi) का हॉकी के शीर्ष स्तर तक पहुंचने का सफर किसी फिल्मी पटकथा से कम नहीं है. खेल के प्रति उनका शुरुआती जुनून हॉकी नहीं, बल्कि फुटबॉल था. वह मणिपुर के इम्फाल स्थित भारतीय खेल प्राधिकरण (SAI) सेंटर में फुटबॉल के ट्रायल के लिए पहुंची थीं, लेकिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था. ट्रायल के तय दिन से एक दिन देर से पहुंचने के कारण फुटबॉल का कोटा पूरी तरह भर चुका था. मैदान में जगह न होने की वजह से निराशा हाथ लगी, लेकिन साई के तत्कालीन निदेशक ने उनके पिता को एक सुझाव दिया कि बच्ची को फिलहाल हॉकी खेलने दिया जाए और कुछ महीनों बाद फुटबॉल टीम में जगह खाली होने पर शिफ्ट कर दिया जाएगा.

फुटबॉल छूटने का दर्द और आंसुओं से शुरुआत
पिता की सहमति के बाद बिचू ने हॉकी ट्रायल दिया और पहले ही प्रयास में उसे पास कर लिया. दो महीने तक वह इस उम्मीद में पसीना बहाती रहीं कि जल्द ही उन्हें फुटबॉल के मैदान पर जाने का मौका मिलेगा. हालांकि, जब उन्होंने फुटबॉल टीम में जाने की बात उठाई, तो अधिकारियों ने साफ कर दिया कि उनका आधिकारिक पंजीकरण हॉकी खिलाड़ी के रूप में हो चुका है और अब खेल बदलना संभव नहीं है. उस दिन बिचू मैदान पर फूट-फूट कर रोई थीं. उन्होंने अपने पिता से वापस घर ले जाने की जिद की, लेकिन पिता के धैर्य और प्रेरणा ने उन्हें मैदान पर टिके रहने का हौसला दिया.

स्ट्राइकर से गोलकीपर बनने का निर्णायक मोड़
शुरुआत में बिचू एक स्ट्राइकर के रूप में खेलती थीं. विपक्षी टीम के पाले में जाकर गोल दागना और उसके बाद जोशीला जश्न मनाना उन्हें बेहद पसंद था. मगर खेल के सफर में एक और मोड़ तब आया जब कोच नीलकमल सिंह की नजर उनकी फुर्ती और रिफ्लेक्स पर पड़ी. कोच ने उन्हें अटैकिंग छोड़कर गोलकीपिंग के भारी-भरकम पैड पहनने की सलाह दी. जिस खिलाड़ी को गोल करना पसंद था, अब उसकी जिम्मेदारी गोल बचाने की थी. बिचू ने इस नई चुनौती को भी पूरे समर्पण के साथ स्वीकार किया.

दबाव में ‘धोनी कूल’ बनने का मंत्र
गोल पोस्ट के सामने खड़े रहकर आने वाले तूफानों को रोकने के लिए जिस मानसिक मजबूती की जरूरत होती है, उसके लिए बिचू भारतीय क्रिकेट के पूर्व कप्तान महेंद्र सिंह धोनी को अपना आदर्श मानती हैं. मैदान पर दबाव के पलों में वह ‘कैप्टन कूल’ की तरह शांत रहने की कला अपनाती हैं. धोनी के जीवन संघर्ष और उनकी सफलता ने बिचू के दिलो-दिमाग पर गहरी छाप छोड़ी है. जब धोनी के जीवन पर फिल्म आई, तो उन्होंने उस शांत चित्त और एकाग्रता को समझने के लिए उसे बार-बार देखा.

भारतीय गोलपोस्ट की अभेद्य दीवार
आज जब इंटरनेशनल स्टेज पर भारत के खिलाफ विरोधी टीमें हमला बोलती हैं, तो गोल पोस्ट के आगे बिचू देवी दीवार बनकर खड़ी रहती हैं. एक दिन की देरी ने जिस फुटबॉलर का रास्ता बदला था, आज उसी खिलाड़ी की सटीक टाइमिंग और डाइव पर पूरा देश गर्व कर रहा है.-कमलेश कुमार राय

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