पराया धन नहीं, परिवार का आधार: बेटियों को लेकर कैसे बदल रही है भारत की सोच?

कुछ समय पहले राजस्थान के नागौर जिले के सुरियास गांव में पहली बार एक बेटी का ‘पाग दस्तूर’ किया गया। राजस्थान की पारंपरिक सामाजिक व्यवस्था में पिता के निधन के बाद परिवार के बड़े बेटे को परिवार का उत्तराधिकारी घोषित किया जाता है। इसी को ‘पाग दस्तूर’ कहते हैं। अगर परिवार में पुत्र नहीं होता, तो कई परिवार दत्तक पुत्र लेकर यह रस्म निभाते हैं।
पंद्रह जुलाई को सुरियास गांव के कान सिंह राठौड़ का बीमारी से निधन हो गया। उनके परिवार में एकमात्र संतान उनकी दस वर्षीय बेटी है। बारहवें की रस्म के बाद किसी निकट संबंधी को दत्तक लेकर ‘पाग दस्तूर’ कराने की चर्चा चल रही थी। मगर कान सिंह की माता और पत्नी ने साफ शब्दों में कहा कि क्योंकि उनकी एकमात्र संतान पुत्री है, इसलिए उसका ही ‘पाग दस्तूर’ किया जाएगा।
इस बदलाव से परिवार ने पुरानी परंपरा को नया स्वरूप देते हुए मजबूत संदेश दिया है कि परिवार की पहचान और सम्मान केवल बेटे से नहीं, बल्कि बेटी से भी आगे बढ़ सकता है। गांव के लोगों का भी कहना है कि इस निर्णय ने वर्षों की सामाजिक सोच में बदलाव ला दिया है जो बेटियों को बराबरी का अधिकार और सम्मान देने का संदेश देता है।
पिछले कुछ वर्षों में लड़कियों को गोद लेने का चलन बढ़ा है।
इस बात की पुष्टि करती हाल ही में जारी ‘सेंट्रल अडाप्शन रिसोर्स अथारिटी’ की एक रिपोर्ट के मुताबिक पिछले वर्ष के मुकाबले वर्ष 2025-26 में लड़कियों को गोद लेने वालों की संख्या में आठ फीसद की बढ़ोतरी दर्ज की गई है। वह समय बीत गया, जब बेटियों को बोझ माना जाता था और बेटों को परिवार का सम्मान।
तब बेटियां पराया धन मानी जाती थी और बेटे को वंश को आगे बढ़ाने वाला और बुढ़ापे का सहारा बनने वाला कहा जाता था। यहां तक कि अंतिम संस्कार बेटों के हाथों से होने पर मुक्ति मिलने की सोच हमारी मानसिकता पर हावी थी। इसी मानसिकता के प्रभाव में हमने सदियों तक लड़कियों को दोयम दर्जे का नागरिक बना कर रखा।
सदियों से भारतीय समाज में पुत्र मोह एक कड़वी सच्चाई बन कर हमारे साथ रहा है। मगर आज हवा का रुख बदल रहा है। आधुनिक भारत में यह एक नया और सुखद बदलाव दिखाई दे रहा है। न केवल भारत में, बल्कि दुनिया भर में समाज की सोच में तेजी से बदलाव आ रहा है। पहले जहां बेटों को प्राथमिकता दी जाती थी वहीं अब बेटियों के प्रति झुकाव बढ़ रहा है।
एक विश्लेषण के मुताबिक 1980 से अब तक करीब पांच करोड़ बेटियां जन्म से पहले ही खत्म कर दी गर्इं। यह आंकड़ा अब तेजी से घट रहा है। विश्लेषण के मुताबिक 2001 से अब तक 70 लाख बेटियां बचाई गई हैं। चीन, भारत और दक्षिण कोरिया जैसे देशों में लिंगानुपात तेजी से सामान्य होता जा रहा है। माता पिता अब बेटियों को ज्यादा समझदार, संवेदनशील और कम चुनौतीपूर्ण मानने लगे हैं।
कई देशों में अब यह धारणा भी जोर पकड़ती जा रही है कि बेटियां बुजुर्ग माता-पिता की बेहतर देखभाल करती हैं। यह सोच भारत में भी तेजी से बढ़ रही है और शायद यही कारण है कि अब एक संतान बेटी हो जाने के बाद भी दंपति लड़के के लिए दूसरी संतान के बारे में नहीं सोचते। यह समाज की सोच में आया एक सकारात्मक बदलाव नहीं, बल्कि सोच की उस संकीर्णता पर भी करारी चोट है जिसने लंबे समय तक बेटियों को ‘पराया धन’ मान कर हाशिये पर रखा। इस सकारात्मक बदलाव के पीछे कई अहम कारण हैं, जिसने लोगों की मानसिकता को बदलने में बड़ी भूमिका निभाई है।
आज बेटियां किसी भी क्षेत्र में पुरुषों से पीछे नहीं हैं। खेल के मैदान से लेकर अंतरिक्ष तक, कारपोरेट के बोर्डरूम से लेकर सीमा की सुरक्षा तक हर जगह बेटियों ने अपनी काबिलियत का लोहा मनवाया है। ओलंपिक पदकों से लेकर सिविल सेवाओं तक, जब माता-पिता हर जगह बेटियों का परचम लहराते देखते हैं, तो उनका गर्व से सिर ऊंचा हो जाता है। यह सफलता इस बात का प्रमाण है कि अवसर मिले, तो बेटियां आसमान छू सकती हैं। उन्होंने यह सिद्ध कर दिया है कि अवसर मिलने पर वे किसी भी क्षेत्र में लड़कों से कम नहीं हैं। उनकी सफलता ने समाज की पुरानी धारणाओं को तोड़ते हुए बेटियों के प्रति सम्मान और भरोसे को मजबूत किया है।
अक्सर देखा जाता है कि बेटियां शादी के बाद भी अपने माता-पिता के प्रति उतनी ही संवेदनशील और जिम्मेदार रहती हैं, जितना कि शादी से पहले थीं। बुढ़ापे में माता-पिता की देखभाल करने और उनका भावनात्मक सहारा बनने में बेटियां किसी से कम साबित नहीं हो रही हैं। समाज में अब यह बात गहराई से महसूस की जाने लगी है कि बेटा केवल एक कुल का नाम आगे बढ़ाता है, लेकिन बेटी दो-दो परिवारों को रोशन करती है।
साक्षरता दर में वृद्धि और कानून के प्रति बढ़ती जागरूकता ने भी इस बदलाव की नींव रखी है। ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ जैसे सरकारी अभियानों, कन्या भ्रूण हत्या के खिलाफ सख्त कानून और संपत्ति में बेटियों के समान अधिकार जैसे विधायी कदमों ने लोगों को यह सोचने पर मजबूर किया है कि बेटा और बेटी दोनों बराबर हैं।
केंद्र और राज्य सरकारों की विभिन्न योजनाओं ने भी इस बदलाव में अहम भूमिका निभाई है। ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ जैसे अभियान ने कन्या भ्रूण हत्या रोकने, बालिका शिक्षा को बढ़ावा देने और समाज में सकारात्मक सोच विकसित करने का कार्य किया है। कई राज्यों में कन्या जन्म पर आर्थिक सहायता, छात्रवृत्ति, निशुल्क शिक्षा तथा उच्च शिक्षा के लिए विशेष प्रोत्साहन जैसी योजनाओं ने परिवारों को बेटियों के भविष्य के प्रति आश्वस्त किया है।
आजकल के छोटे या एकल परिवारों में माता-पिता लिंग भेद से परे जाकर केवल एक या दो बच्चों की परवरिश पर ध्यान दे रहे हैं। अब लोग इस बात से पूरी तरह बेफिक्र हैं कि उनका इकलौता बच्चा बेटा है या बेटी। वे बेटी की परवरिश भी उसी लाड़-प्यार, शिक्षा और संसाधनों के साथ कर रहे हैं जो कभी सिर्फ बेटों का हक समझा जाता था।
इस यात्रा को पूरा होने में अभी कुछ वक्त लगेगा। न केवल शहरी बल्कि ग्रामीण क्षेत्रों में भी बेटियों को लेकर जो स्वीकार्यता और ललक बढ़ी है, वह उम्मीद जगाने वाली है। हालांकि देश के दूरदराज इलाकों में आज भी कुछ कुरीतियां और भेदभाव के अंश बाकी हैं।
कुछ क्षेत्रों में अब भी लैंगिक भेदभाव, बाल विवाह और शिक्षा से वंचित कर दिए जाने जैसी समस्याएं मौजूद हैं। बदलाव के लिए जो हमारी गति है, उससे मंजिल बहुत दूर नहीं लगती। जब समाज बेटियों को बोझ नहीं, बल्कि एक वरदान के रूप में देखने लगता है, तब केवल एक परिवार और समाज का नहीं, बल्कि पूरे राष्ट्र का उत्थान होता है। इसलिए बेटियों को सुरक्षित वातावरण, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और आत्मनिर्भर बनने के अवसर प्रदान करना हम सभी की जिम्मेदारी है। बेटियों की बढ़ती चाह एक समृद्ध, समतावादी और संवेदनशील भारत के निर्माण का सबसे सशक्त प्रतीक है।
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प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल में सांसदों को दो घंटे पुस्तकालय में व्यतीत करने की सलाह दी है। संभवत: संसदीय भाषणों की उल्लेखनीयता और गंभीरता का समाप्त हो जाना उनकी चिंता का कारण रहा होगा। मोदी ने भले ही सांसदों को सुझाव दिया है, लेकिन यह सभी जनतांत्रिक देशों के लिए संसदीय मूल्यों के क्षरण के दौर में संजीवनी की तरह है।



