जंगल में गोलीबारी पर सीधे दर्ज नहीं होगी FIR, हाईकोर्ट की सख्ती के बाद सरकार का बड़ा फैसला

भोपाल: मध्य प्रदेश सरकार ने वनकर्मियों को ड्यूटी के दौरान हथियार इस्तेमाल करने की स्थिति में बड़ी कानूनी सुरक्षा दी है। अब जंगल में तस्करों, शिकारियों या अन्य असामाजिक तत्वों से निपटने के दौरान गोली चलाने वाले वनकर्मी के खिलाफ सीधे FIR या गिरफ्तारी नहीं होगी। पहले पूरे मामले की मजिस्ट्रियल जांच कराई जाएगी। इसके बाद ही आगे की कार्रवाई का रास्ता तय होगा।
पहले जांच, फिर कार्रवाई
राज्य सरकार की ओर से शुक्रवार को जारी अधिसूचना के मुताबिक, ड्यूटी के दौरान वनकर्मी द्वारा हथियार चलाने की प्रत्येक घटना की जांच संबंधित क्षेत्र के कार्यपालिक दंडाधिकारी करेंगे। जांच में यह देखा जाएगा कि वनकर्मी ने किन परिस्थितियों में हथियार का इस्तेमाल किया और क्या उस समय कार्रवाई ड्यूटी की जरूरत के अनुरूप, आवश्यक और उचित थी।
यदि जांच में यह सामने आता है कि हथियार का इस्तेमाल अनावश्यक, अनुचित या दुर्भावनापूर्ण नहीं था, तो संबंधित वनकर्मी के खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज नहीं किया जाएगा।
गलती मिलने पर भी तुरंत FIR नहीं
नई व्यवस्था में यदि मजिस्ट्रियल जांच के दौरान वनकर्मी की गलती सामने आती है, तब भी पुलिस सीधे FIR या गिरफ्तारीनहीं कर सकेगी। जांच रिपोर्ट राज्य सरकार को भेजी जाएगी। सरकार द्वारा रिपोर्ट स्वीकार किए जाने के बाद ही संबंधित वनकर्मी के खिलाफ FIR, गिरफ्तारी अथवा अन्य आपराधिक कार्रवाई की जा सकेगी।
लकड़ी तस्करों और शिकारियों से मुकाबले में मिलेगी सुरक्षा
वन विभाग के कर्मचारियों को जंगलों में अक्सर लकड़ी तस्करों, शिकारियों और अन्य असामाजिक तत्वों का सामना करना पड़ता है। कई परिस्थितियों में वन संपदा और वन्यजीवों की रक्षा के साथ अपनी सुरक्षा के लिए भी उन्हें हथियार का इस्तेमाल करना पड़ सकता है।
सरकार की नई व्यवस्था का उद्देश्य ऐसे वनकर्मियों को अनावश्यक कानूनी कार्रवाई से सुरक्षा देना है, जिन्होंने ड्यूटी के दौरान सद्भावना और परिस्थितियों की आवश्यकता के तहत कार्रवाई की हो।
आपराधिक कार्रवाई का रास्ता खुला रहेगा
हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि वनकर्मियों को कार्रवाई की पूरी छूट मिल गई है। यदि जांच में हथियार के दुरुपयोग या गलत कार्रवाई की पुष्टि होती है, तो निर्धारित प्रक्रिया के तहत आपराधिक कार्रवाई का रास्ता खुला रहेगा।
सुप्रीम कोर्ट के निर्देश और BNSS के प्रावधानों का हवाला
सरकार ने नई व्यवस्था को सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS), 2023 के प्रावधानों के अनुरूप बताया है। इस व्यवस्था के जरिए एक तरफ ड्यूटी के दौरान कानूनसम्मत निर्णय लेने वाले वनकर्मियों को सुरक्षा देने की कोशिश की गई है, वहीं दूसरी तरफ गलत या अनुचित बल प्रयोग की स्थिति में जांच और जवाबदेही का रास्ता भी बनाए रखा गया है।
लटेरी गोलीकांड के बाद उठे थे सवाल
वनकर्मियों की कार्रवाई और उनके खिलाफ आपराधिक केस दर्ज करने का मुद्दा 2022 के विदिशा लटेरी गोलीकांड के बाद काफी चर्चा में आया था। 9 अगस्त 2022 को खटयापुरा जंगल में लकड़ी तस्करी रोकने पहुंची वन विभाग की टीम और ग्रामीणों के बीच विवाद हो गया था। वनकर्मियों ने टीम पर पथराव किए जाने का आरोप लगाया था, जबकि ग्रामीणों की ओर से वन विभाग पर गोली चलाने का आरोप लगाया गया था। घटना में आदिवासी युवक चैन सिंह की मौत हुई थी और तीन लोग घायल हुए थे। इसके बाद तत्कालीन डिप्टी रेंजर के खिलाफ हत्या का मामला दर्ज कर उन्हें गिरफ्तार किया गया था।
जांच के लिए गठित हुआ था न्यायिक आयोग
मामले की गंभीरता को देखते हुए तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने न्यायिक जांच आयोग का गठन किया था। आयोग को बल प्रयोग की परिस्थितियों, उसकी वैधता और जिम्मेदारी तय करने की जिम्मेदारी दी गई थी। हालांकि, आयोग निर्धारित समय में अपनी रिपोर्ट पेश नहीं कर सका और उसकी अवधि कई बार बढ़ाई गई।
अब सरकार की नई व्यवस्था को वनकर्मियों के लिए एक महत्वपूर्ण कानूनी सुरक्षा के तौर पर देखा जा रहा है। इसका सबसे बड़ा असर उन मामलों में पड़ेगा, जहां ड्यूटी के दौरान हथियार इस्तेमाल करने के बाद वनकर्मियों के खिलाफ आपराधिक कार्रवाई की मांग उठती है।



