…बदलते जलवायु संकट से पहाड़ से मैदान तक मंडरा रही बाढ़ की आशंका

जलवायु आपदा के कारण हिमालयी नदियां खतरनाक रूप से अपने प्रवाह के रास्ते बदल रही हैं। यह खतरे की घंटी है। उधर, आर्कटिक क्षेत्र, पृथ्वी के अन्य हिस्सों की तुलना में ज्यादा तेजी से गर्म हो रहा है। इस क्षेत्र में जमे हुए पानी की मात्रा में गिरावट जारी रहना और बैरेंट्स सागर, बेरिंग सागर तथा ओखोत्स्क सागर में जमे हुए जल की क्षति गंभीर बदलाव का संकेत है। इससे सूर्य की रोशनी को परिवर्तित करने की आर्कटिक क्षेत्र की क्षमता में कमी आती है। इससे पारिस्थितिकी तंत्र, मौसमी रुझान और ध्रुवीय क्षेत्रों में आजीविका भी प्रभावित हो सकती है।
‘चाइना यूनिवर्सिटी ऑफ जियोसाइंसेज और सिचुआन यूनिवर्सिटी’ के वैज्ञानिकों के मुताबिक वैश्विक ताप के कारण होने वाले मौसमी बदलावों से ऊपरी हिमालयी क्षेत्र में नदियों और उनके किनारे बसे इलाकों के लिए गंभीर खतरा पैदा हो गया है। सिंधु, गंगा, यमुना, ब्रह्मपुत्र और तीस्ता इत्यादि नदियों से लगभग 19 नदियां सीधे जुड़ी हैं, जिनके तेज प्रवाह से जन-धन का व्यापक नुकसान हो सकता है। पहले के मुकाबले दोगुनी तेज गति से ये नदियां, खासकर पहाड़ी क्षेत्रों में आधारभूत ढांचे तबाह कर सकती हैं।
हिमालयी नदियों के 1582 किलोमीटर लंबे क्षेत्र में तापमान की संवेदनशीलता वैश्विक औसत से लगभग आठ गुना ज्यादा है। नदियों की ही तरह इन क्षेत्रों का तापमान भी दोगुनी गति से बढ़ रहा है। नदियों की गति में बदलाव का सीधा संबंध जलवायु आपदा, तापमान और हिमनदों की हलचल से है। हिमालय के आर-पार इस आपदा से बहुत बड़ी आबादी गंभीर रूप से प्रभावित होने का अंदेशा है। ताजा अध्ययन के मुताबिक खास तौर से अरुणाचल प्रदेश की नदियों के पारिस्थितिकी तंत्र के लिए यह भयावह हो सकता है। असम पहले से ही ऐसी आपदाएं झेल रहा है।
जलवायु आपदा से अर्थव्यवस्थाएं तहस-नहस हो रही हैं। इसी कारण पारिस्थितिकी तंत्र में ऐसे बदलाव आ सकते हैं, जिन्हें पलटना असंभव होगा। शांति और सुरक्षा को गंभीर खतरा पहुंच सकता है। वैज्ञानिक लगातार आगाह कर रहे हैं कि वर्ष 2030 से 1.5 डिग्री सेल्सियस तापमान और बढ़ जाएगा। मौसम विज्ञानियों का विश्लेषण बताता है कि वैश्विक तापमान बढ़ने की गति तेज हो रही है और अत्यधिक गर्मी की आवृत्ति भी बढ़ रही है। पेरिस जलवायु परिवर्तन समझौते के अंतर्गत तापमान वृद्धि की सीमा अहम है। ऐसी स्थिति में चरम मौसमी घटनाओं, खाद्य असुरक्षा, विस्थापन और पारिस्थितिकी तंत्र ढहने का जोखिम बढ़ेगा। गर्म हो रही जलवायु से वैश्विक वर्षा रुझानों में भी बदलाव नजर आ रहा है।
विश्व मौसम विज्ञान संगठन (डब्ल्यूएमओ) की रिपोर्ट में आगाह किया गया है कि दुनिया भीषण गर्मी की ओर बढ़ रही है। यह लगभग तय है कि अगले पांच वर्षों के दौरान वैश्विक तापमान रिकॉर्ड स्तर पर या फिर उसके आसपास बना रहेगा। ब्रिटेन के मौसम विज्ञान विभाग ने इस रिपोर्ट में पिछले पांच वर्षों की जलवायु का आकलन और अगले पांच वर्षों में तापमान, बारिश और बर्फबारी के रुझानों का अनुमान रेखांकित किया है। वर्ष 2026 से 2030 के दौरान, इस बात की लगभग 86 फीसद आशंका है कि कम से कम एक वर्ष, रिकॉर्ड स्तर पर सर्वाधिक गर्म वर्ष होने का मामला सामने आए। अगले पांच वर्ष की अवधि में, कम से कम एक वर्ष के दौरान औसत वैश्विक तापमान में 1.5 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि हो सकती है।
बीती जुलाई में, हिमालयी क्षेत्रों से लेकर अमेरिका के टेक्सास प्रांत के ग्रामीण इलाकों तक आई भीषण बाढ़ की घटनाओं में कई लोग जान गंवा चुके हैं। इस बीच, समय-पूर्व चेतावनी प्रणालियों की गंभीर खामियां भी उजागर हुई हैं। वैज्ञानिकों ने आगाह किया है कि इस विनाश के पीछे तेजी से हो रहा शहरीकरण, भूमि उपयोग में बदलाव और जलवायु परिवर्तन जैसी वजहें हैं, जिनसे वातावरण में नमी बढ़ रही है और बाढ़ का खतरा भी लगातार गहराता जा रहा है।
मौसम वैज्ञानिकों के मुताबिक, अतिरिक्त एक डिग्री सेल्सियस तापमान बढ़ने पर, वायुमंडल लगभग सात फीसद अधिक जलवाष्प अपने भीतर संचित कर सकता है। इस स्थिति से अत्यधिक वर्षा का जोखिम बढ़ रहा है। साथ ही गर्म होती जलवायु के कारण तेजी से पिघलती बर्फ से हिमनद से जुड़ी बाढ़ का खतरा भी लगातार बढ़ रहा है। अकेले बीती जुलाई में ही दक्षिण एशिया, पूर्वी एशिया और संयुक्त राज्य अमेरिका में एक के बाद एक, बाढ़ की घटनाएं देखी गईं। कहीं भारी बारिश, कहीं हिमनद झीलों का विस्फोट और कहीं अचानक आई बाढ़ का कहर टूटा है।
वर्ष 2020 में, दक्षिण एशिया के विभिन्न हिस्सों में भीषण बाढ़ की घटनाओं में साढ़े छह हजार से अधिक लोगों की मौत हुई थी और लगभग 105 अरब डॉलर की आर्थिक क्षति दर्ज की गई थी। दो साल बाद 2022 में पाकिस्तान में आई विनाशकारी बाढ़ से 3.3 करोड़ से ज्यादा लोग प्रभावित हुए। इस साल भी यह सिलसिला थमा नहीं है। दक्षिण कोरिया में 16 से 20 जुलाई के बीच रिकॉर्डतोड़ बारिश दर्ज की गई, जहां कुछ इलाकों में वर्षा 115 मिलीमीटर प्रति घंटे से भी अधिक पहुंच गई। इस आपदा में कम से कम 18 लोगों की मौत हो गई और 13 हजार से अधिक लोगों को सुरक्षित स्थानों पर ले जाना पड़ा।
बीती जुलाई में अचानक हुई मूसलाधार बारिश ने टेक्सास के पहाड़ी क्षेत्र में तबाही मचा दी, जिसमें सौ से अधिक लोगों की जान चली गई और अनेक लोग लापता हो गए। इसी तरह नेपाल के रसुवा जिले में हिमनद की सतह पर बनी झील के फटने से अचानक आई बाढ़ में कुछ जलविद्युत संयंत्र और एक पुल सहित कई सड़कें बह गईं। इस भीषण घटना में कम से कम 11 लोगों की जान गई। अनेक लोग अब भी लापता हैं।
वैज्ञानिकों का कहना है कि हिंदूकुश-हिमालय क्षेत्र में बाढ़ अब पहले की तुलना में अधिक बार आ रही है, जबकि दो दशक पहले ऐसी बाढ़ आम तौर पर हर पांच से दस साल में एक बार आती थी। वैज्ञानिकों का मानना है कि भविष्य में बाढ़ की ऐसी घटनाओं का खतरा तीन गुना तक बढ़ सकता है। एक अध्ययन में अनुमान लगाया गया है कि 1.81 अरब लोग यानी दुनिया की लगभग एक-चौथाई आबादी विनाशकारी बाढ़ की जद में है। इस आबादी में से 89 फीसद लोग निम्न और मध्यम आय वाले देशों के हैं।
भारत के पहाड़ी राज्यों जम्मू-कश्मीर, उत्तराखंड और हिमाचल में भारी बारिश और बादल फटने की घटनाएं चिंता का विषय बन गई हैं। जम्मू-कश्मीर में भारी बारिश, भूस्खलन और बाढ़ ने तबाही मचाई है। पुंछ और राजौरी के बाढ़ प्रभावित इलाकों में कई लोग अब भी लापता हैं। उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश में भी भारी बारिश से जन-जीवन गंभीर रूप से प्रभावित हो रहा है। नगालैंड में बारिश के बाद भूस्खलन से स्कूल की इमारत का एक बड़ा हिस्सा ढह गया। उत्तराखंड में लगातार बारिश और भूस्खलन से लगभग कई सड़कें बंद हैं। हिमाचल में भी इन दिनों 36 सड़कें बंद हैं। असम के बारह जिले बाढ़ से जूझ रहे हैं।



