
भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (आई.एन.सी.) का इतिहास जितना पुराना और गौरवशाली है, उतना ही आंतरिक कलह, गुटबाजी और ऐतिहासिक विद्रोहों से भी भरा पड़ा है। 1885 में अपनी स्थापना से लेकर आज तक, कांग्रेस ने राष्ट्रीय और राज्य स्तर पर कई बड़े उतार-चढ़ाव, गुटबाजी और दलीय विभाजन देखे हैं। वर्तमान में, पंजाब प्रदेश कांग्रेस कमेटी (पी.पी.सी.सी.) एक बार फिर ऐसे ही गंभीर आंतरिक संकट से जूझ रही है। पार्टी उच्च कमान ने छत्तीसगढ़ के पूर्व मुख्यमंत्री भूपेश बघेल को पंजाब कांग्रेस का प्रभारी नियुक्त करके एक बड़ी जिम्मेदारी सौंपी है। बघेल अपने वर्तमान पंजाब दौरे के दौरान पंजाब कांग्रेस के बिखरे हुए गुटों को एकजुट कर पाएंगे या नहीं, इस पर चर्चा करने से पहले, पंजाब में गुटबाजी के इतिहास पर एक नजर डालते हैं।
पंजाब कांग्रेस का इतिहास वैचारिक मतभेदों की बजाय व्यक्तिगत अहंकार और मुख्यमंत्री पद के लिए संघर्ष से ही प्रभावित रहा है। पंजाबी सूबे के गठन से पहले और आजादी के तुरंत बाद, 1947 से 1950 तक, तत्कालीन मुख्यमंत्रियों गोपी चंद भार्गव और भीम सेन सच्चर के बीच गठबंधन इतना मजबूत हो गया था कि वे एक-दूसरे को हटाकर मुख्यमंत्री बनते रहे। पंजाबी सूबे के गठन के बाद, 1970 और 1980 के दशक में ज्ञानी जैल सिंह और दरबारा सिंह के बीच का संघर्ष स्पष्ट रूप से दिखाई दिया। इसके बाद के काल में, कैप्टन अमरिंदर सिंह और राजिंदर कौर भट्ठल के बीच एक लंबा राजनीतिक युद्ध चला।
पंजाब कांग्रेस के लिए सबसे बुरा दौर 2021-2022 का रहा। तत्कालीन मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह और नवजोत सिंह सिद्धू के बीच सार्वजनिक कलह ने पार्टी को खोखला कर दिया। कैप्टन को मुख्यमंत्री पद छोडऩा पड़ा और उन्हें पार्टी से निष्कासित कर दिया गया। हाईकमान ने चरणजीत सिंह चन्नी को मुख्यमंत्री बनाया लेकिन सिद्धू और चन्नी के बीच मतभेदों के कारण कांग्रेस को 2022 के विधानसभा चुनावों में आम आदमी पार्टी (आप) के हाथों करारी हार का सामना करना पड़ा।
आज भी पंजाब कांग्रेस की स्थिति में कोई खास सुधार नहीं हुआ।
पार्टी के भीतर 2 मुख्य गुट उभर कर सामने आए हैं-संगठनात्मक गुट : वर्तमान प्रदेश अध्यक्ष अमरिंदर सिंह राजा वडिंग और विपक्ष के नेता प्रताप सिंह बाजवा के नेतृत्व में।
चुनाव प्रचार समिति गुट : जालंधर से सांसद और पूर्व मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी के नेतृत्व में। चन्नी के समर्थक खुले तौर पर राजा वडिंग को अध्यक्ष पद से हटाने की मांग कर रहे हैं। ऐसे नाजुक समय में भूपेश बघेल उच्च कमान के दूत के रूप में पंजाब दौरे पर हैं। हालांकि उनके दौरे का मुख्य उद्देश्य 2027 के विधानसभा चुनावों से पहले पार्टी को एकजुट करना और जमीनी स्तर पर कार्यकत्र्ताओं को संगठित करना बताया जा रहा है लेकिन असल मकसद पंजाब कांग्रेस में गुटबाजी को खत्म करना है।
कहा जा सकता है कि भूपेश बघेल एक अनुभवी नेता हैं और छत्तीसगढ़ में सफलतापूर्वक सरकार चला चुके हैं। उनकी रणनीति और वर्तमान कार्यकाल के दौरान इसके परिणामों को 2 दृष्टिकोणों से देखा जा सकता है-उनकी यात्रा के सकारात्मक पहलुओं पर गौर करें तो उन्होंने कड़े फैसले लिए हैं और स्पष्ट संदेश दिए हैं। बघेल ने पंजाब पहुंचते ही साफ कर दिया कि नेतृत्व का मुद्दा अब खत्म हो चुका है। उन्होंने घोषणा की कि राजा वङ्क्षडग़ पार्टी अध्यक्ष बने रहेंगे, चुनाव राहुल गांधी के नाम पर लड़ा जाएगा और चुनाव के बाद हाईकमान मुख्यमंत्री का चेहरा तय करेगा। इसके साथ ही, ‘कुर्सी की दौड़’ फिलहाल स्थगित हो गई है।
जमीनी प्रचार की शुरुआत : बघेल ने सभी गुटों को व्यक्तिगत कलह छोड़कर ‘हर बूथ, कांग्रेस मजबूत’ अभियान में शामिल होने का निर्देश दिया है। यह कदम नेताओं का ध्यान आंतरिक कलह से हटाकर विपक्षी दलों पर केंद्रित करने में मददगार साबित हो सकता है।
बड़ी चुनौतियां और असफलता का भय : जन विद्रोह और असंतोष-बघेल के दौरे के बावजूद, पार्टी का अंदरूनी असंतोष शांत नहीं हुआ है। पटियाला, संगरूर और लुधियाना में रैलियों के दौरान चन्नी समर्थकों ने खुलेआम नारे लगाए। इसके अलावा, कई वरिष्ठ नेताओं ने महत्वपूर्ण रणनीतिक बैठकों से दूरी बनाए रखी, जिससे संकेत मिलता है कि ‘सब कुछ ठीक नहीं है’। आंतरिक गद्दारों की चुनौती-बघेल ने स्वयं नेताओं को पार्टी के राज लीक करने वाले ‘आंतरिक गद्दारों’ से सावधान रहने की चेतावनी दी है। इससे साबित होता है कि पार्टी के भीतर अविश्वास की भावना अभी भी बहुत गहरी है।
भूपेश बघेल ने अपने मौजूदा दौरे के दौरान पंजाब कांग्रेस में ‘संगठनात्मक शांति’ कायम करने में कामयाबी हासिल की है लेकिन वह नेताओं के बीच की खाई, यानी ‘भावनात्मक एकता’ को पूरी तरह से नहीं मिटा सके। पंजाब कांग्रेस के नेताओं की व्यक्तिगत राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं इतनी प्रबल हैं कि सिर्फ एक दौरे या सख्त निर्देशों से उन्हें नियंत्रित करना असंभव है। भूपेश बघेल की असली परीक्षा आने वाले समय में टिकट वितरण के दौरान होगी। अगर वह उस समय किसी बड़े विद्रोह को रोकने में सफल होते हैं, तो ही उनकी मेहनत सफल मानी जाएगी, अन्यथा पंजाब कांग्रेस का इतिहास खुद को दोहराने के लिए तैयार है।-इकबाल सिंह चन्नी



