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परीक्षा लीक से नहीं, पुरानी ‘एकाधिकार व्यवस्था’ से लड़ें

भारत ने परीक्षा धोखाधड़ी के खिलाफ जंग छेड़ दी है। पेपर लीक के मामले में अब जेल की अधिक सख्त सजा होगी। संगठित नकल सिंडिकेटों को भारी जुर्माने का सामना करना पड़ेगा। जांच प्रक्रिया तेज होगी। विशेष अदालतें त्वरित न्याय प्रदान करेंगी। संसद ने यह निष्कर्ष निकाला है कि यदि परीक्षाएं किसी क्राइम थ्रिलर जैसी लगने लगें, तो शायद आपराधिक कानून को इसमें बड़ी भूमिका निभानी चाहिए। लेकिन क्या हो, अगर पेपर लीक बीमारी ही न हो? क्या होगा अगर परीक्षा प्रणाली खुद ही एक बीमारी हो? हर साल, लाखों छात्र अपनी किशोरावस्था एक ऐसी परीक्षा की तैयारी में लगा देते हैं, जो सिर्फ कुछ घंटों तक चलती है लेकिन अगले 40 वर्षों के उनके करियर का मार्ग तय करती है। फिर जब प्रश्नपत्र लीक होता है, तो हम हैरान होने का नाटक करते हैं। अत्यधिक जोखिम वाली प्रणालियां अक्सर बड़े अपराधों को जन्म देती हैं।

भारत का कोचिंग उद्योग करियर की चिंता और आशंकाओं पर फलता-फूलता है और यह हमारी प्रवेश प्रणाली के कारण अस्तित्व में है। इसका वाॢषक राजस्व 60,000 करोड़ रुपए अनुमानित है और इसके लगातार बढऩे की उम्मीद है। परिवार अनिवार्य रूप से एक ‘लॉटरी’ के लिए प्रति माह 50,000 रुपए से अधिक खर्च करते हैं और कुछ तो इसके लिए ऋण भी लेते हैं। आर्टिफिशियल इंटैलीजैंस (ए.आई.) अब भारत को 1947 के बाद से अपने सबसे मौलिक शैक्षिक सुधारों को लागू करने और देश के परीक्षा दर्शन में संशोधन करने का अवसर देती है।

पहला विचार सरल है। इन्फोसिस के चेयरमैन नंदन नीलेकणि की अध्यक्षता वाले पैनल को यह सिफारिश करके शुरुआत करनी चाहिए कि उम्मीदवारों को प्रत्येक प्रतियोगी परीक्षा में कई अवसर दिए जाएं। विशिष्ट संस्थानों में प्रवेश चाहने वाले छात्रों को हर महीने सुरक्षित कम्प्यूटर-आधारित परीक्षाएं देने में सक्षम होना चाहिए और रैंकिंग के लिए उनका सर्वोत्तम स्कोर स्वत: ही चुन लिया जाना चाहिए। ए.आई. संचालित निगरानी, एन्क्रिप्टेड प्रश्न बैंक और एडाप्टिव टैस्ट प्रोटोकॉल इसे संभव बनाते हैं। बहु-अवसर प्रणाली पेपर लीक के प्रोत्साहन को कम करती है क्योंकि कोई भी एक परीक्षा जीवन का अंतिम और एकमात्र फैसला नहीं होती। दूसरा, एक समान प्रश्नपत्रों को समाप्त करें। प्रत्येक उम्मीदवार को एक सत्यापित और हैक-प्रूफ  प्रश्न बैंक से ए.आई. द्वारा यादृच्छिक (रैंडमाइज्ड) रूप से तैयार किए गए अद्वितीय प्रश्न मिलने चाहिएं, जो समान कठिनाई स्तरों के लिए कैलिब्रेट किए गए हों। यदि हर प्रश्नपत्र अलग है, तो लीक हुआ पेपर खरीदना जीतने वाले नंबर के घोषित होने के बाद लॉटरी टिकट चुराने जैसा निरर्थक हो जाएगा।

तीसरा, यह नाटक करना बंद करें कि स्मरण शक्ति ही बुद्धिमता है। लार्ज लैंग्वेज मॉडल अनगिनत ज्ञान परीक्षणों में पहले से ही मनुष्यों से बेहतर प्रदर्शन कर सकते हैं। हमारी परीक्षाओं को तदनुसार विकसित होना चाहिए। छात्रों को स्मार्टफोन पर आसानी से उपलब्ध फॉर्मूले याद करने के लिए कहने की बजाय, इस बात का परीक्षण करें कि वे अपरिचित समस्याओं को कैसे हल करते हैं, ए.आई. जैनरेटेड उत्तरों का मूल्यांकन कैसे करते हैं, मतिभ्रम का पता कैसे लगाते हैं, डाटा की व्याख्या कैसे करते हैं और बुद्धिमान प्रणालियों के साथ जिम्मेदारी से सहयोग कैसे करते हैं। कल का इंजीनियर ए.आई. की दुनिया में काम करेगा और उसे यह पहचानने में सक्षम होना चाहिए कि कहां और कैसे गड़बड़ी हो रही है।

चौथा, एक ‘अकादमिक क्रैडिट पासपोर्ट’ बनाएं। छात्र एक निश्चित समय अवधि में कई परीक्षाओं, परियोजनाओं, इंटर्नशिप, हैकाथॉन, शोध कार्य, सामुदायिक सेवा और व्यावहारिक मूल्यांकनों में अंक जमा करेंगे। इसके बाद विश्वविद्यालय एक दर्दनाक रविवार की सुबह के प्रदर्शन की बजाय छात्र के पूरे पोर्टफोलियो का मूल्यांकन करेंगे। पांचवां, ए.आई. से प्रतिभा की पहचान करने को कहें, न कि केवल नकल पकडऩे को। परीक्षा प्रणालियां व्यावहारिक डाटा उत्पन्न कर सकती हैं। छात्र कठिन प्रश्नों को कैसे हल करते हैं, वे गलतियों से कितनी जल्दी उबरते हैं और क्या वे लगातार सुधार करते हैं-उदाहरण के लिए, वे कैसे तर्क देते हैं। यदि नैतिक और पारदर्शी तरीके से उपयोग किया जाए, तो ए.आई. लचीलेपन, रचनात्मकता और सीखने की क्षमता की पहचान कर सकता है, जो वास्तव में मायने रखती है।

छठा, और यह कोचिंग उद्योग को डरा देगा, विश्वविद्यालयों को अधिक स्वायत्तता दें। हर इंजीनियरिंग कॉलेज के लिए एक जैसे प्रवेश मानदंड क्यों होने चाहिएं? कुछ संस्थान नवाचार पर जोर दे सकते हैं, अन्य उद्यमिता, अनुसंधान क्षमता या व्यावहारिक योग्यता पर। जब हर संस्थान एक ही प्रवेश परीक्षा का उपयोग करता है, तो उसके लिए तैयारी करने का मतलब खुद को एक आम सांचे में ढालना होता है। हालांकि यह एकरूपता पेच बनाने वाले कारखानों के अनुकूल हो सकती है लेकिन यह मानवीय प्रतिभा के विविधीकरण को बढ़ावा नहीं देती, जो आगे चलकर अधिक महत्वपूर्ण होने वाली है।  यदि परीक्षाएं साल भर दी जा सकें, हर प्रश्न पत्र अद्वितीय हो, प्रवेश व्यापक मानदंडों द्वारा तय हो, रटने की बजाय तर्क का मूल्यांकन हो और विश्वविद्यालय विविध ताकतों की तलाश करें, तो कोचिंग सैंटरों को एक असाधारण बदलाव से गुजरना होगा। परीक्षा के गुर सिखाने की बजाय, उन्हें वास्तव में पढ़ाना पड़ेगा।

धोखाधड़ी विरोधी कानूनों को सख्त करने वाले भारत के संशोधन आवश्यक हैं क्योंकि संगठित पेपर लीक जनता के विश्वास को खतरे में डालते हैं और वे कठोर सजा के हकदार हैं। लेकिन कल की परीक्षा प्रणाली पुलिसिंग के जरिए भविष्य की शिक्षा चुनौती को हल नहीं कर पाएगी। नकलचियों को पकडऩा और लीक-पेपर बाजार पर नकेल कसना उतना महत्वपूर्ण नहीं है, जितना कि एक ऐसी परीक्षा प्रणाली तैयार करना, जो नकल को व्यावसायिक रूप से निरर्थक बना दे, कोचिंग के एकाधिकार को समाप्त कर दे और याद रखने की क्षमता से अधिक जिज्ञासा को मूल्यवान बनाए।-एम. मुनीर 

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