अंतर्राष्ट्रीय

प्रवासियों पर ब्रिटेन में दो-फाड़, नफरत में जल रहा इंग्लैंड, स्कॉटलैंड ने भारतीय स्टूडेंट को सांसद बना दिया

लंदन: ब्रिटेन से दो ऐसी खबरें आईं जिनपर उतना ध्यान नहीं दिया गया जितना दिया जाना चाहिए था क्योंकि दुनिया किस दिशा में जा रही है ये समझना सबके लिए ज़रूरी है. पहली खबर इंग्लैंड से है, सब देख ही रहे हैं कि यूरोप में और अमेरिका में गोरे लोगों में बहुत रोष बढ़ता जा रहा है कि दूसरे देशों से उनके यहां आए हुए लोग उनकी संस्कृति को बदल रहे हैं. इंग्लैंड में तो लोकल काउंसिलों के चुनाव हुए तो प्रधानमंत्री की लेबर पार्टी बुरी तरह हार गई और ज्यादा फायदा वहां विपक्षी कन्जर्वेटिव पार्टी को नहीं हुआ, उसको भी नुकसान हुआ. दोनों मुख्य पार्टियों को नुकसान इसलिए हुआ क्योंकि रिफॉर्म UK नाम की पार्टी को बहुत जगह जीत मिल गई. इस पार्टी का मुख्य मुद्दा ही यही है कि बाहर से आए लोग इंग्लैंड की संस्कृति ही बदल रहे हैं.

नफरत की आग में जला इंग्लैंड

इंग्लैंड के लोगों का कहना है कि इंग्लैंड गोरे लोगों का ही था और गोरे लोगों का ही रहना चाहिए. ये रोष जो है वो खासकर नावों के जरिये गैर कानूनी तरीके से इंग्लैंड पहुंच रहे लोगों के खिलाफ ज्यादा है. जिन लोगों के खिलाफ नफरत की आग में इंग्लैंड जल रहा है उनमें जिनमें सीरिया, इराक वगैरह जैसे देशों के लोग होते हैं.

यही विरोध फिर पाकिस्तानियों और बांग्लादेशियों की तरफ भी मुड़ रहा है और क्योंकि देखने में तो भारतीय भी अलग नहीं होते तो उनके लिए भी वही भावना कई जगह दिख जाती है कि ये सब बाहर से आए लोग, गोरे लोगों के संसाधनों पर कब्जा करते जा रहे हैं.

जैसे हमारे यहां घुसपैठिए कहते हैं वहां अवैध प्रवासी कहते हैं और इस मुद्दे पर कई गोरे लोगों के नेता वहां की पॉलिटिक्स में आ चुके हैं. और धीरे-धीरे उनको काफी समर्थन भी मिलता जा रहा है.

एक तरह से ये वहां की राजनीति का घुसपैठिया फैक्टर बन गया है तो इंग्लैंड में तो ये साफ दिख गया लोकल काउंसिलों के चुनावों में कि अब इस मुद्दे को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. रिफॉर्म यूके पार्टी अब बड़ी पार्टी बन चुकी है और प्रधानमंत्री स्टार्मर का इस्तीफा तो उन्हीं की पार्टी के लोग मांग रहे हैं.

प्रवासियों पर ब्रिटेन में दो-फाड़

अगली खबर भी ब्रिटेन के ही एक अन्य देश से आई है. ब्रिटेन में जैसा आप जानते ही होंगे तीन देश गिने जाते हैं. इंग्लैंड, स्कॉटलैंड और वेल्स. ये तीन मिलकर ब्रिटेन कहे जाते हैं और इनमें उत्तरी आयरलैंड जोड़ दो तो उसको कहते हैं UK यानी यूनाइटेड किंगडम.

प्रवासियों पर उल्टी है स्कॉटलैंड की पॉलिसी

दूसरी खबर स्कॉटलैंड से है. इंग्लैंड में लोकल काउंसिल के चुनाव हुए और स्कॉटलैंड में वहां की संसद के चुनाव हुए. स्कॉटलैंड में माहौल इस मामले में बिल्कुल ही अलग है. स्कॉटलैंड ने तो 2020 में ये भी नियम बना दिया था कि कोई विदशी अगर स्कॉटलैंड में आया हुआ है वैलिड वीजा पर. यानी वहां वैध कागजों के साथ रह रहा है तो वो वहां वोट भी डाल सकता है. उनका कहना था कि विदेशियों से अगर टैक्स ले रहे हैं तो उनको वोट देने का भी अधिकार होना चाहिए.

यहां के गोरे लोगों की सोच कितनी अलग?

टलैंड में वैसे भी वहां के गोरे लोगों की जनसंख्या घटती जा रही है और वो तो चाहते हैं कि वहां डॉक्टर आएं, इंजीनियर आएं, IT वाले आएं और वहां की अर्थव्यवस्था को बढ़ाएं. इसी वजह से उन्होंने 2020 में उनको वोट का ही अधिकार दे दिया था. भले ही वो स्कॉटलैंड के नागरिक ना हों. इतना ही नहीं, वोट का अधिकार दिया तो वहां ये भी मांग उठी कि अगर ये लोग वोट दे सकते हैं तो फिर चुनाव क्यों नहीं लड़ सकते? इसलिए पिछले साल उन्होंने अपने कानून में बदलाव ऐसा किया कि दुनिया ही दंग रह गई.

अब वैध तरीके से अगर वहां कोई वीज़ा लेकर रह रहा है तो वो स्कॉटलैंड के संसद का चुनाव भी लड़ सकता है. क्योंकि अगर देश को आगे बढ़ाने में उनकी भागीदारी है तो सरकार में होने का उनको हक देना चाहिए. टूरिस्ट वीजा वालों को नहीं, जो कुछ दिन वहां घूमने जाते हैं. बल्कि बाकी लोग जो वहां काम करने जाते हैं या वहां जो स्टूडेंट कॉलेजों में पढ़ने के लिए जाते हैं वो भी वहां के चुनाव लड़ सकते हैं. तो ये उन्होंने कर दिया पिछले साल.

स्कॉटलैंड में भारतीय स्टूडेंट बन गया सांसद

अब इस साल हुए वहां संसद के चुनाव और वो हुआ जो शायद बाकी दुनिया में कोई सोच भी नहीं सकता. एक भारतीय छात्र ने वहां चुनाव जीत लिया और स्कॉटलैंड का सांसद बन गया. तमिलनाडु के क्यू मणिवन्नन ने वहां चुनाव लड़ा और जीत भी गए. वहां की ग्रीन्स पार्टी ने उनको चुनाव का टिकट दिया. ये दांव उस भारतीय पर लगाया गया जो वहां के नागरिक नहीं हैं, पढ़ने गए हैं वहां के कॉलेज में, उनको टिकट दिया और वो जीत भी गए. सबसे बड़ी बात तो ये है कि वो ट्रांसजेंडर हैं. पुरुष नहीं हैं, महिला नहीं हैं, ट्रांसजेंडर हैं.

सोनीपत से स्कॉटलैंड की संसद पहुंचे मणिवन्नन 

भारत में तो ट्रांसजेंडर को भी किन्नर ही कह देते हैं. वो स्कॉटलैंड के सांसद बन गए हैं. स्कॉटलैंड ही नहीं, ब्रिटेन ही नहीं, ये दुनिया की राजनीति को हिला देने वाली खबर है. मणिवन्नन तमिलनाडु में पैदा हुए. दिल्ली के पास सोनीपत की ओपी जिंदल यूनिवर्सिटी से उन्होंने ग्रैजुएशन की और अभी 2021 में ही स्कॉटलैंड गए. वहां यूनिवर्सिटी ऑफ सेंट ऐंड्रूज में इंटरनैशनल रिलेशंस PhD करने गए थे.

ट्रांसजेंडर सांसद ने इंग्लैंड को दिया डबल सरप्राइज

वो ग्रीन्स पार्टी की तरफ से एडिनबरा की एक सीट से चुनाव में खड़े हुए और चुन लिए गए संसद के लिए. ये जो स्कॉटिश ग्रीन्स पार्टी हैं ये स्कॉटलैंड को ब्रिटेन से अलग करने की पक्षधर है. पहली बार कोई भारतीय स्टूडेंट वीजा पर स्कॉटिश संसद में पहुंचा है. सब लोग हैरानी से इस खबर को देख रहे हैं वहां और वो ट्रांसजेंडर हैं तो हैरानी डबल हो रही है. उनके पास पर्मनेंट वीजा भी नहीं है, उनका स्टूडेंट वीजा इसी साल दिसंबर तक का है. PhD उनकी पूरी हो चुकी है तो उसके बाद उनको ग्रैजुएट वीजा भी मिलता तो तीन साल और रहने का मिलता वहां पर.

क्या है स्कॉटलैंड सांसद बनने के फायदे?

अब तो वो वहां के सांसद बन गए अगले 5 साल के लिए. 2031 तक उनका सांसद कार्यकाल रहेगा और मजे की बात ये कि स्टूडेंट वीजा पर तो वो फुल टाइम कोई काम भी नहीं ले सकते. लेकिन 2022 में एक और नियम भी बदल दिया गया था वहां पर. उस नए नियम के मुताबिक जन प्रतिनिधी के काम को रोजगार वाली श्रेणी में अब नहीं माना जाता. मतलब वो कोई नौकरी नहीं कर सकते थे छात्र रहते हुए. अब सांसद हो गए हैं तो उनको 77,000 पाउंड की सालाना तनख्वाह मिलेगा. 77,000 पाउंड मतलब भारतीय रुपयों में एक करोड़ रुपये. यानी वो अब एक करोड़ रुपये की सैलरी भी लेंगे.

इंग्लैंड पचा नहीं पा रहा ये बात

इंग्लैंड में लोग हक्का बक्का रह गए हैं ये सुनकर जबकि स्कॉटिश ग्रीन्स पार्टी इसको स्कॉटलैंड के लिए गर्व की बात रही है कि देखो स्कॉटलैंड ऐसा देश है जो सबको साथ ही लेकर नहीं चलता बल्कि दुनिया के सामने मिसाल भी पेश करता है. पूरे ब्रिटेन में इस खबर को लेकर लोग बिल्कुल दोफाड़ हो चुके हैं. कई हैं जिनका मानना है कि ये तो लोकतंत्र का मजाक है और दूसरे हैं जिनका कहना है कि यही असली लोकतंत्र है. जो भी हो, सबको इस खबर को जानना तो चाहिए ही. आगे दुनिया की राजनीति जिस भी दिशा में जाए, मणिवन्नन का ये चुनाव इतिहास में तो दर्ज हो ही गया है.

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