एग्जिट पोल पर केवल राजनीतिक प्रतिक्रियाओं के अनुसार मत न बनाएं

भारत में ओपिनियन पोल यानी चुनाव पूर्व सर्वेक्षण हो या एग्जिट पोल अर्थात मतदान के बाद का सर्वेक्षण, ऐसा कोई वर्ष नहीं, जब इस पर जबरदस्त विवाद तथा तू-तू, मैं-मैं न होती हो। जिसके पराजित होने की संभावना व्यक्त होती है वह इसका विरोध करता है। हालांकि विरोध सामान्य हो या तथ्यों के आधार पर प्रश्न उठाया जाए या कोई ताॢकक आपत्ति हो तो समस्या नहीं। किंतु पिछले कुछ वर्षों से ऐसी सभी एजैंसियों और संस्थाओं को भाजपा द्वारा या सरकार द्वारा प्रायोजित बता कर उसकी साख को भी समाप्त करने का अभियान चलता है।
पश्चिम बंगाल के एग्जिट पोल पर तृणमूल कांग्रेस की प्रतिक्रियाएं देख लीजिए। हालांकि इनमें भी ज्यादातर एजैंसियों ने तृणमूल और भाजपा के मतों एवं सीटों में बहुत ज्यादा अंतर नहीं दिखाया। हां, ज्यादातर में भाजपा की विजय की प्रवृत्ति अवश्य दर्शाई गई है। इनमें अंतर इतने महीन हैं कि इन एग्जिट पोलों के आधार पर भी आप निश्चयात्मक नहीं मान सकते कि हां यही परिणाम आएगा। केवल एक एजैंसी टुडेज चाणक्य ने भाजपा को तृणमूल से मतों एवं सीटों दोनों में काफी आगे बताया है। तृणमूल कांग्रेस की शीर्ष नेत्री ममता बनर्जी से लेकर अभिषेक बनर्जी, उनके मंत्री, सांसद और यहां तक कि टी.वी. पर बैठने वाले प्रवक्ता व पैनलिस्ट एजैंसियों और चैनलों पर हमले कर रहे हैं।
ओपिनियन पोल और एग्जिट पोल पर राजनीतिक दलों तथा कुछ टिप्पणीकारों द्वारा उठाए जा रहे प्रश्नों से उनकी विश्वसनीयता को गहरा आघात लगा है। ऐसा माहौल बना, मानो सारे एग्जिट पोल आज तक गलत ही साबित हुए हैं। ऐसा सच नहीं। एग्जिट पोल का यह अर्थ नहीं कि वे जितनी सीटें बताते हैं वास्तव में उतनी ही आ सकती हैं या आनी चाहिएं। एग्जिट पोल से हमें चुनाव परिणाम का भावी ट्रैंड यानी प्रवृत्ति या दिशा का आभास मिलता है। अनेक बार एग्जिट पोल लगभग परिणाम के आसपास भी रहे हैं। 2024 लोकसभा चुनाव परिणाम में एग्जिट पोलों के द्वारा दिए गए आंकड़ों से परिणाम भिन्न आए। आवाज यहां तक उठी कि एग्जिट पोल को प्रतिबंधित कर देना चाहिए। लोकसभा चुनाव के साथ ही आंध्र प्रदेश और ओडिशा के ज्यादातर एग्जिट पोल लगभग सही साबित हुए। आंध्र में तेलुगू देशम के नेतृत्व में राजग तथा ओडिशा में भाजपा के लिए बहुमत का आंकड़ा दिया गया था और परिणाम वही आया। अधिकतर एग्जिट पोल 2024 लोकसभा चुनाव में मुख्यत: 3 राज्यों उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र और पश्चिम बंगाल में विफल साबित हुए। अन्य राज्यों के आंकड़े देखें तो उन्हें आप विफल नहीं कर सकते। 2014, 2019 लोकसभा चुनावों में एग्जिट पोल और परिणाम की दिशा एक रही।
ओपिनियन पोल और एग्जिट पोल वर्तमान चुनाव प्रणाली में मतदाताओं की मन:स्थिति समझने का एक माध्यम है। ओपिनियन पोल में आप अलग-अलग क्षेत्र में जाते हैं, लोगों से बातें करते हैं और गणना करते हुए निष्कर्ष निकालते हैं। मुद्दों, उम्मीदवारों, नेताओं, उनके कार्यों, विकास आदि इतने प्रश्न होते हैं कि उनसे काफी कुछ धरातली वास्तविकता समझी जा सकती है। तब भी ओपिनियन पोल परिणाम चुनाव परिणाम की प्रवृत्ति से अलग हो सकते हैं। कारण, ये मतदान पूर्व होते हैं और चुनाव अभियानों से लेकर मतदान तक लोगों का मन बदल सकता है। किंतु एग्जिट पोल मतदान कर निकल रहे मतदाताओं के मत होते हैं। साफ है, इससे भावी परिणाम का ट्रैंड यानी दिशा का साफ पता चलना चाहिए। अगर नहीं, तो यह गंभीर पुनर्मंथन का विषय होना चाहिए।
सर्वेक्षण में पारदर्शिता भी होनी चाहिए। पारदर्शिता का अर्थ है कि आपके सैंपल साइज यानी कितने लोगों से अपने मत पूछा और उनमें किन-किन क्षेत्रों से और किस श्रेणी के लोग थे। आपके सर्वेक्षण करने का तरीका क्या था आदि। पहले मतदान केंद्र के बाहर ही एजैंसियां अपना छाया मतदान पेटी लगाती थीं, जिसमें निकलने वाले लोग मत डालते थे। बाद में लैपटॉप और टैब से यह काम किया जाने लगा। जहां लैपटॉप टैब नहीं लगा सकते, वहां मतदान कर निकलने वालों से पूछ कर नोट किया जाता है या ऑडियो-विजुअल टेप रहता है। अगर ईमानदारी और पेशेवर तरीके से एग्जिट पोल हो तथा उनमें आए तथ्यों का आंकड़ों में ठीक से आकलन जाए तो परिणाम की दिशा अवश्य सामने आ जाएगी।
मतदान प्रतिशत के बाद उन्हें सीटों में प्रेषित करना सबसे कठिन काम है। इसलिए पूर्व में कई एजैंसियां मतदान प्रतिशत तो बता देती थीं लेकिन सीटों का गणित नहीं देती थीं। अगर मतदान प्रतिशत में 2-3-4 प्रतिशत का अंतर हो तो परिणाम किसी दिशा में पलट सकता है। इसलिए मत प्रतिशत को सीटों में बदलना जोखिम भरा है। सामान्यत: लोग मत प्रतिशत नहीं, सीटें देखते हैं और परिणाम आने के बाद उसी को लेकर हमला करने लगते हैं। यह भी सच है कि पिछले अनेक वर्षों में ऐसी एजैंसियां आ गईं, जिनकी विश्वसनीयता संदिग्ध है। अनेक एजैंसियां कुछ पाॢटयों व नेताओं के लिए सर्वेक्षण के साथ उनके अभियान का ठेका लेकर काम करती हैं और मीडिया के लिए भी सर्वेक्षण करती हैं। कुछ एजैंसियां अपने को शत-प्रतिशत पेशेवर और ईमानदार दिखाने के लिए अतिवाद की सीमा तक जाती हैं। एग्जिट पोल नहीं जारी करना इसी का उदाहरण है। लेकिन पश्चिम बंगाल के बारे में यह तो सोचिए कि क्या तृणमूल कांग्रेस मानकर चलती है कि कभी उसकी सत्ता समाप्त नहीं होगी? कोई पार्टी स्थायी रूप से सत्ता में नहीं रही। इन्हीं एजैंसियों ने केरल, असम, तमिलनाडु और पुड्डुचेरी का एग्जिट पोल जारी किया।
इन राज्यों में ऐसी प्रतिक्रिया नहीं है जैसी पश्चिम बंगाल को लेकर है। इसलिए पार्टियों की आलोचना के आधार पर हम ओपिनियन पोल या एग्जिट पोल के बारे में मत न बनाएं। वैसे भी सोशल मीडिया के माध्यम से नैरेटिव के हल्ला बोल वाले दौर में सच को झूठ और झूठ को सच बनाना आसान हो गया है। इसलिए स्वयं संबंधित प्रदेश या क्षेत्र के शासन के प्रभावों का मूल्यांकन कर निष्कर्ष निकालें कि वहां क्या हो सकता है। फिर एग्जिट पोल या ओपिनियन पोल के साथ उसकी तुलना करें निष्कर्ष स्वयं निकल जाएगा। आज आने वाले चुनावी नतीजों से सब स्पष्ट हो जाएगा।-अवधेश कुमार



