राष्ट्रीय

आस्था-विश्वास में समय के साथ बदलाव, सबरीमाला प्रकरण पर बहस, सिर्फ कानून बन जाने से नहीं आता बदलाव

नई दिल्ली

सबरीमाला मंदिर विवाद के बीच, क्या देश की अदालतों को ये तय करना चाहिए कि किसी धर्म के लिए क्या जरूरी है और क्या नहीं? इस बड़े संवैधानिक सवाल पर सुप्रीम कोर्ट की नौ जजों की बेंच के सामने शुक्रवार को अहम सुनवाई हुई। इस दौरान वरिष्ठ वकीलों ने धर्म, परंपरा और न्यायपालिका के अधिकार क्षेत्र को लेकर कई अहम दलीलें पेश कीं। सीनियर एडवोकेट राजीव धवन ने दलील दी कि भारत में अलग-अलग धर्मों के लोग एक ही जगह पर आस्था रखते हैं। उन्होंने पंजाब के ‘मां का टोला’ का उदाहरण दिया, जहां हिंदू, सिख और ईसाई सभी जाते हैं। धवन ने कहा कि भले ही व्यापक रूप से लोग हिंदू हों, लेकिन उनके रीति-रिवाज उनके ‘संप्रदाय’ पर निर्भर करते हैं। उन्होंने बताया कि संविधान के हिंदी अनुवाद में ‘संप्रदाय’ के लिए ‘समुदाय’ शब्द का इस्तेमाल हुआ है। धवन ने कहा कि आस्था या विश्वास समय के साथ हमेशा बदलते रहते हैं।

यह बदलाव सिर्फ किसी कानून के बन जाने से नहीं आता; बल्कि यह बदलाव तो लोगों के बीच से ही उभरकर आता है। धवन ने कहा कि जब कोई समूह ‘संप्रदाय’ बन जाता है, तो उसे आर्टिकल 26 के तहत विशेष अधिकार मिलते हैं। अदालत को तथ्यों के आधार पर ये तय करना होगा कि किसे ये सुरक्षा मिले। इस दौरान धवन ने उस टेस्ट का विरोध किया, जिसके तहत अदालतें तय करती हैं कि कौन सी प्रथा धर्म का अभिन्न हिस्सा है। उन्होंने अमरीकी जज स्कैलिया का हवाला देते हुए इसे ‘कब्रिस्तान का पिशाच’ कहा, जो बार-बार जिंदा होकर समस्याएं पैदा करता है। उन्होंने कहा कि अगर हर धार्मिक प्रथा को विज्ञान की कसौटी पर परखा गया, तो कोई धर्म नहीं बचेगा। आप अंधविश्वास को पूरी तरह खारिज नहीं कर सकते।

सदियों पुरानी धार्मिक परंपराएं हो रहीं प्रभावित

अय्यप्पा भक्त संघ की ओर से पेश वरिष्ठ वकील वी. गिरी ने तर्क दिया कि अदालती फैसलों से सदियों पुरानी धार्मिक परंपराएं प्रभावित हो रही हैं। उन्होंने याद दिलाया कि भगवान अय्यप्पा के परम भक्त वावर शास्ता मुस्लिम थे, जो हिंदू-मुस्लिम एकता का प्रतीक है। गिरी ने कहा कि केरल के मंदिरों में देवप्रशनम के जरिए मंदिर की शक्ति जांची जाती है। इसी आधार पर ये माना गया है कि 10 से 50 साल की महिलाओं का प्रवेश वर्जित होना चाहिए, क्योंकि भगवान अय्यप्पा नैष्ठिक ब्रह्मचारी (अखंड ब्रह्मचारी) के रूप में वहां विराजमान हैं। उन्होंने कहा कि आर्टिकल 25 के तहत धर्म की आजादी पर सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता और स्वास्थ्य के आधार पर रोक लगाई जा सकती है (जैसे नरबलि या पशुबलि पर रोक), लेकिन किसी की व्यक्तिगत आस्था में दखल नहीं दिया जाना चाहिए।

Show More

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button