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तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की दहलीज पर भारत, लेकिन

वैश्विक परिदृश्य में भारत तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था के रूप में उभर रहा है। बढ़ता उपभोक्ता बाजार, आर्थिक वृद्धि में इजाफा और तकनीकी प्रगति से देश विश्व की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में सम्मिलित हो चुका है। भारत ने जापान को पीछे छोड़कर दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था का स्थान हासिल कर लिया है और अब तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की ओर अग्रसर है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष की एक रपट के अनुसार, वर्ष 2024 में भारत की अर्थव्यवस्था का आकार लगभग 3.7 ट्रिलियन डालर था। वर्तमान में अमेरिका और चीन क्रमश: पहली और दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था हैं। आर्थिक विशेषज्ञों और संस्थाओं के आकलन के अनुसार, भारत वर्ष 2030 में जर्मनी को पीछे छोड़कर तीसरे स्थान पर पहुंच सकता है। मगर इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए भारत के सामने अनेक अवसरों के साथ-साथ कई चुनौतियां भी मौजूद हैं।

भारत की आधुनिक आर्थिक प्रगति की शुरुआत वर्ष 1991 के आर्थिक सुधारों से मानी जाती है। उस समय देश गंभीर भुगतान संतुलन संकट से जूझ रहा था और विदेशी मुद्रा भंडार केवल कुछ सप्ताह के आयात के बराबर ही रह गया था। इस स्थिति से उबरने के लिए सरकार ने उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण की नीतियां अपनाईं। इन सुधारों के परिणामस्वरूप विदेशी निवेश बढ़ा, उद्योगों को नई ऊर्जा मिली और भारत का वैश्विक अर्थव्यवस्था से जुड़ाव मजबूत हुआ। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व बैंक के आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 1991 में भारत का सकल घरेलू उत्पाद लगभग 270 अरब डालर था, जो वर्ष 2000 में करीब 470 अरब डालर तक पहुंच गया। वर्ष 2010 में यह लगभग 1.7 ट्रिलियन डालर हो गया। जबकि 2020 में भारत की अर्थव्यवस्था करीब 2.9 ट्रिलियन डालर थी। इस तरह वर्ष 2024 में यह लगभग 3.7 ट्रिलियन डालर के आसपास पहुंच चुकी है। इन आंकड़ों से स्पष्ट है कि पिछले तीन दशकों में भारत की अर्थव्यवस्था काफी तेजी से बढ़ी है।

भारत की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की संभावना के पीछे मजबूत आधार है। देश में विशाल जनसंख्या के अनुरूप बड़ा उपभोक्ता बाजार है। भारत विश्व का सबसे अधिक जनसंख्या वाला देश बन गया है। अर्थव्यवस्था में मध्यम वर्ग की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। ‘मैकेंजी ग्लोबल इंस्टीट्यूट’ की एक रपट के अनुसार, भारत का मध्य वर्ग तेजी से बढ़ रहा है और अनुमान है कि वर्ष 2030 तक इस वर्ग की संख्या पचास करोड़ से अधिक हो सकती है। इसके अलावा भारत के सकल घरेलू उत्पाद में निजी उपभोग का योगदान लगभग साठ फीसद है, जो आर्थिक वृद्धि का महत्त्वपूर्ण आधार है। देश की आबादी का एक बड़ा हिस्सा युवा है। विश्व बैंक की रपट के अनुसार, भारत की करीब पैंसठ फीसद आबादी 35 वर्ष से कम आयु की है। इसलिए यदि भारत अपने युवा कार्यबल को उचित शिक्षा और कौशल प्रदान करे, तो यह आर्थिक विकास के लिए बड़ा अवसर बन सकता है।

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देश में डिजिटल क्रांति ने आर्थिक गतिविधियों को नई दिशा प्रदान की है। ट्राई और इंटरनेट एंड मोबाइल एसोसिएशन आफ इंडिया के अनुसार, भारत में 85 करोड़ से अधिक इंटरनेट उपयोगकर्ता हैं और यह संख्या निरंतर बढ़ रही है। इसके अलावा यूपीआइ की डिजिटल भुगतान प्रणाली ने वित्तीय लेन-देन को बहुत आसान बना दिया है। भारतीय राष्ट्रीय भुगतान निगम के आंकड़ों से पता चलता है कि वर्ष 2023 मे डिजिटल भुगतान प्रणाली के माध्यम से करीब 180 लाख करोड़ रुपए से अधिक का लेन-देन हुआ।

भारत आज दुनिया के सबसे बड़े डिजिटल भुगतान बाजारों में से एक है। यहां नवउद्यम भी तेजी से विकसित हुआ है। देश में दिसंबर, 2025 तक डीपीआइआइटी-मान्यता प्राप्त नवउद्यमों की संख्या दो लाख से अधिक हो गई है और इस मामले में भारत दुनिया में तीसरे स्थान पर आता है। इन नवउद्यमों ने लगभग 21 लाख प्रत्यक्ष रोजगार पैदा किए हैं और इनमें ‘यूनिकार्न्स’ की संख्या 120 से ऊपर पहुंच गई है। फिनटेक, ई-वाणिज्य, स्वास्थ्य, तकनीक और शिक्षा जैसे क्षेत्रों में नवउद्यम तेजी से नवाचार कर रहे हैं। देश में बुनियादी ढांचे के विकास में बड़े पैमाने पर निवेश किया जा रहा है। वर्ष 2024-25 के आम बजट में लगभग 11.1 लाख करोड़ रुपए आधारभूत ढांचे के विकास के लिए आबंटित किए गए। आधारभूत ढांचे की उपलब्धता और इससे जुडी भावी परियोजनाओं की दृष्टि से भी भारत का तीसरी बड़ी आर्थिक शक्ति बनने की संभावनाओं को बल मिलता है।

सड़क परिवहन मंत्रालय और भारतीय रेलवे के आंकड़ों के अनुसार, देश में 1.46 लाख किलोमीटर से अधिक राष्ट्रीय राजमार्ग हैं। रेलवे नेटवर्क लगभग 68,000 किलोमीटर लंबा है। यह दुनिया का चौथा सबसे बड़ा रेल नेटवर्क है। देश को वैश्विक विनिर्माण केंद्र बनाने के लिए भी कई उपाय किए गए हैं। ‘मेक इन इंडिया’ और उत्पादन से जुड़े प्रोत्साहन की योजनाओं के माध्यम से सरकार उद्योगों को प्रोत्साहित कर रही है। इतना सब कुछ होते हुए दुनिया की तीसरी बड़ी अर्थव्यवस्था बनने के लिए भारत की राह में बाधाएं भी कम नहीं हैं।

इनमें बेरोजगारी और रोजगार सृजन एक बड़ी चुनौती है। देश में हर वर्ष लगभग एक से डेढ़ करोड़ युवा रोजगार बाजार में प्रवेश करते हैं। सेंटर फार मानिटरिंग इंडियन इकोनामी के अनुसार, भारत की बेरोजगारी दर सात से आठ फीसद के आसपास रहती है। अगर पर्याप्त रोजगार सृजन नहीं होता है, तो यह एक बड़ी आर्थिक और सामाजिक चुनौती बन जाएगी।

देश की लगभग 42 फीसद आबादी कृषि पर निर्भर है, लेकिन सकल घरेलू उत्पाद में कृषि का योगदान केवल 15-16 फीसद ही है। आज भी सिंचाई और आधुनिक तकनीक की कमी कृषि क्षेत्र में उत्पादन को प्रभावित करती है। देश में आर्थिक विकास के बावजूद आय असमानता बढ़ रही है। आक्सफैम की समानता रपट के अनुसार, भारत के शीर्ष दस फीसद लोग देश की लगभग 70 फीसद संपत्ति को नियंत्रित करते हैं, जबकि निचले तीस फीसद लोगों के पास बहुत कम संपत्ति है। यह असमानता भी सामाजिक और आर्थिक संतुलन के लिए बड़ी चुनौती बनती जा रही है। भारत में साक्षरता दर लगभग 77 फीसद है, जबकि उच्च शिक्षा में नामांकन दर करीब 28 फीसद है। कई उद्योगों का कहना है कि बड़ी संख्या में स्नातक युवाओं के पास आवश्यक कौशल की कमी है। इसलिए कौशल विकास कार्यक्रमों को मजबूत करना आवश्यक है। इसके अलावा तेजी से बढ़ते औद्योगीकरण और शहरीकरण के कारण पर्यावरणीय समस्याएं भी लगातार बढ़ रही हैं।

विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, दुनिया के सबसे प्रदूषित शहरों में कई भारतीय शहर भी शामिल हैं। नीति आयोग की जल रपट (2018) के आंकड़ों से पता चलता है कि देश के लगभग साठ करोड़ लोग जल संकट का सामना कर सकते हैं। यह समस्या भी तीसरी बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की राह में बाधा पैदा कर सकती है। यही नहीं, अमेरिका-इजराइल और ईरान युद्ध की स्थिति विश्व की सभी अर्थव्यवस्थाओं को प्रभावित कर रही है और भारत भी इससे अछूता नहीं है। इस पहलू पर भी गंभीरता से विचार करने की जरूरत है। कुल मिलाकर देश को दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनाने के लिए शिक्षा और कौशल विकास में निवेश को बढ़ावा देना, विनिर्माण और निर्यात को प्रोत्साहित करना, कृषि सुधार और ग्रामीण विकास, तकनीकी नवाचार, डिजिटल अर्थव्यवस्था का विस्तार तथा पर्यावरणीय संतुलन एवं टिकाऊ विकास की दिशा में प्रभावी कदम उठाने होंगे।

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