ईरान-इजरायल जंग की आंच में उत्तर प्रदेश के उद्योग भी तपे, 1000 करोड़ से ज्यादा का माल अटका

लखनऊ: ईरान और अमेरिका-इस्राइल के बीच जारी युद्ध का असर अब उत्तर प्रदेश के उद्योगों और निर्यात पर साफ दिखने लगा है। अगर यह संघर्ष लंबा खिंचता है, तो रसोई से लेकर रोजमर्रा के सामान तक महंगे हो सकते हैं। इसकी बड़ी वजह यह है कि उद्योगों में इस्तेमाल होने वाला कच्चा माल 50 से 100 प्रतिशत तक महंगा हो गया है। प्लास्टिक, बिजली उपकरण, पैकेजिंग मटीरियल, प्लाईवुड और लेदर जैसे सेक्टर सबसे ज्यादा प्रभावित हैं।
इंडियन इंडस्ट्रीज असोसिएशन (आईआईए) के वरिष्ठ उपाध्यक्ष आलोक अग्रवाल के मुताबिक, कच्चा माल महंगा होने और गैस की कमी के कारण कई गैस आधारित उद्योगों ने उत्पादन घटा दिया है या यूनिट बंद करनी पड़ी है। फिरोजाबाद की ग्लास इंडस्ट्री, जो इंडस्ट्रियल गैस पर निर्भर है, सबसे ज्यादा प्रभावित हुई है। कई इकाइयों बंद हो गई हैं, जबकि कुछ ने उत्पादन कम कर दिया है। इससे रोजगार पर भी असर पड़ने लगा है। खुर्जा का क्रॉकरी उद्योग भी गैस किल्लत से जूझ रहा है।
| यूपी से किस देश को कितना निर्यात | (करोड़ रुपये) |
| US | 37,000 |
| UK | 13,000 |
| UAE | 11,000 |
| GER | 9,763 |
प्लास्टिक दाने की कीमतें दोगुनी हुईं
उद्यमी मनमोहन अग्रवाल के अनुसार, प्लास्टिक, प्लाईवुड और केमिकल इंडस्ट्री पर सबसे ज्यादा दबाव है, क्योंकि इनका कच्चा माल पेट्रोलियम उत्पादों से बनता है। सप्लाई बाधित होने से पेंलिमर, फिनॉल, मेलामाइन और प्लास्टिक दाने की कीमते दोगुनी तक पहुंच गई है। इसका असर तैयार उत्पादों पर भी दिख रहा है, जिससे माग में गिरावट आने लगी है।
बासमती चावल निर्यात पर ज्यादा असर
- निर्यात भी बुरी तरह प्रभावित हुआ है। फेडरेशन ऑफ इंडियन एक्सपोर्ट्स ऑर्गनाइजेशन (FIEO) के अनुसार, पश्चिम एशिया जाने वाले शिपमेंट फस गए है, जिससे एक महीने में 1,000 करोड़ रुपये से अधिक का निर्यात प्रभावित हुआ है।
- इसमें खाद्य पदार्थ, रेडीमेड गारमेंट, सेफ्टी शूज, लेदर और चिकनकारी उत्पाद शामिल है। यूपी से हर साल करीब 1.36 लाख करोड़ रुपये का निर्यात होता है. जिसमें 22,000 से 25,000 करोड़ रुपये खाड़ी देशों को जाता है।
- युद्ध की वजह से निर्यात प्रभावित है। इसमें मुख्य रूप से ईरान में बासमती चावल का सबसे अधिक निर्यात किया जाता है।
MSME इकाइयों पर खतरा
- इस युद्ध से सबसे अधिक मार MSME यूनिट्स पर पड़ेगी। दरअसल, बड़े उद्योगों के पास आमतौर पर 60 से 70 दिन का कच्चे माल का स्टॉक होता है। मगर छोटी MSME यूनिट्स के पास 5-6 दिन का रॉ मटीरियल का स्टॉक होता है।
- युद्ध की वजह से रॉ मटीरियल की उपलब्धता कम होने के कारण माल सप्लाई करने वाली कंपनियों ने दाम बढ़ा दिए है। कई MSME यूनिट्स के सामने दिक्कत आ रही है कि वो बढ़ी कीमतों को पासऑन नहीं कर पा रही है।
- इंडस्ट्री का मानना है कि अगर कच्चे माल की कीमतें नियंत्रित नहीं रहती है और गैस सप्लाई में दिक्कत आती है, तौ बड़ी संख्या में MSME यूनिट्स बंद हो सकती है, जिसकी वजह से नौकरियों का भी संकट आ सकता है।



