संपादकीय

संसद में चर्चा का ड्रामा

संसद के बजट सत्र का दूसरा चरण 9 मार्च, सोमवार, को शुरू हुआ, लेकिन हंगामे, नारेबाजी, पोस्टरबाजी की बलि चढ़ गया। अजीब सियासी ड्रामा देखने को मिला। विपक्ष ने लोकसभा स्पीकर ओम बिरला के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव दिया था, जिसे कार्यसूची में रखा गया। अर्थात् प्रस्ताव पर चर्चा होगी और फिर मत-विभाजन होगा। कायदे से विपक्ष को अविश्वास प्रस्ताव पर चर्चा का आगाज करना चाहिए था, लेकिन उसने ईरान युद्ध और उससे प्रभावित हालात पर वैकल्पिक चर्चा की नई मांग की। विदेश मंत्री एस. जयशंकर को अपना वक्तव्य शोर के बीच ही पढऩा पड़ा। उधर राज्यसभा में भी ईरान युद्ध पर चर्चा के लिए नियम 267 के तहत नोटिस दिए गए। अविश्वास प्रस्ताव स्पीकर के खिलाफ था, लिहाजा विपक्ष की नई मांग को खारिज कर दिया गया और स्पीकर के मुद्दे पर चर्चा के लिए आग्रह पीठासीन अधिकारी ने किया और संसदीय कार्य मंत्री रिजिजू ने भी कहा। नतीजतन हंगामा होता रहा। अंतत: लोकसभा की कार्यवाही अगले दिन तक स्थगित करनी पड़ी। सवाल है कि लोकसभा में विरोधाभास की स्थिति थी, लेकिन राज्यसभा में ईरान युद्ध पर चर्चा क्यों नहीं कराई गई? वीपी सिंह और अटलबिहारी वाजपेयी के प्रधानमंत्री कालों के दौरान हमारी संसद ने ऐसे युद्धों, हमलों पर चर्चा की थी और हमलावर आक्रांता देश की निंदा की थी। लिहाजा ऐसी चर्चाओं की संसदीय परंपरा रही है। कमोबेश राज्यसभा में तो अविश्वास प्रस्ताव जैसा कोई महत्वपूर्ण विषय कार्यसूची में नहीं था। ईरान और खाड़ी के अन्य अरब देशों में तबाही का जो दौर चल रहा है, भारत उससे अछूता नहीं है। बल्कि भारत भी प्रभावित हो रहा है, बेशक सरकारी सूत्र कुछ भी दावे करते रहें। कच्चे तेल की कीमत 118 डॉलर प्रति बैरल तक उछली। शुक्र है कि अंतत: यह कीमत 96.88 डॉलर तक लुढक़ गई। मीडिया में यह कीमत 102 डॉलर भी छपी है। यदि कच्चे तेल के दाम 120 डॉलर हो जाते हैं, तो विश्व में 0.4 फीसदी महंगाई बढ़ेगी। दस मार्च मंगलवार की दोपहर में कच्चे तेल की कीमत गिर कर 90 डॉलर पर आ गई।

संभावनाओं के मद्देनजर तेल की कीमतें 200 डॉलर प्रति बैरल के ‘चरम’ तक पहुंचती हैं, तो दुनिया में औसतन जीडीपी 2 फीसदी कम हो सकती है। यदि ईरान युद्ध 15 और दिन जारी रहा, तो तेल 150 डॉलर तक महंगा होना लगभग तय है। चूंकि ईरान के लगातार हमलों के मद्देनजर सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, बहरीन, कतर, कुवैत आदि खाड़ी देशों ने तेल और गैस के उत्पादन कम कर दिए हैं अथवा बंद करने पड़े हैं, क्योंकि रिफाइनरियां, तेल डिपो और ठिकाने धू-धू करके जल रहे हैं। नतीजतन विश्व में तेल और गैस का व्यापक संकट सामने दिख रहा है। कोई भी देश मुगालते में न रहे। अमरीका को लेकर 1929 वाली ‘महामंदी’ के आकलन सामने आ रहे हैं। युद्ध के 10 दिनों में अमरीका को करीब 6 अरब डॉलर खर्च करने पड़े हैं। यह उसके बजट से परे की यथार्थ स्थिति है। भारत की बात करें, तो हमारे 4 लाख टन बासमती चावल का निर्यात अवरुद्ध हो गया है। करीब 41,000 करोड़ रुपए के इलेक्ट्रॉनिक्स सामान का निर्यात फंसा है। करीब 5000 करोड़ रुपए की दवाओं का निर्यात रुक गया है। चीनी, चाय, मांस, फल और डेयरी उत्पादों की कीमत करोड़ों में है, जो युद्ध के कारण फंसे हुए हैं। अनुमान है कि करीब 1 लाख करोड़ रुपए का भारतीय निर्यात प्रभावित हुआ है, जाहिर है कि इसका असर हमारी अर्थव्यवस्था पर भी पड़ेगा। क्या ऐसे विषय पर संसद में चर्चा नहीं होनी चाहिए? सांसद शशि थरूर का कहना उचित है कि संसद हमारे लोकतंत्र का सर्वोच्च मंच है, वहां बहस होनी चाहिए। संसद ‘नोटिस बोर्ड’ नहीं है कि मंत्री ने वक्तव्य दे दिया और मुद्दे का इति सिद्धम। खाड़ी देशों के साथ भारत का 200 अरब डॉलर का कारोबार है। यदि भारत पर युद्ध का कोई भी असर नहीं है, तो बेंगलुरु में होटलों ने बंद होने की घोषणा क्यों की है? राजधानी दिल्ली में भी रेस्तरां एसोसिएशन ने कमर्शियल गैस की उचित आपूर्ति न किए जाने पर होटल, रेस्तरां बंद करने की चेतावनी क्यों दी है? तेल कंपनियों ने वितरकों को गैस सप्लाई रोकने के आदेश क्यों दिए हैं? जरूर ऐसा कुछ है, जो सरकार देश से छिपा रही है। अलबत्ता संसद में चर्चा तो करनी ही चाहिए। दलीय राजनीति के कारण असल मुद्दों पर संसद में चर्चा नहीं हो पा रही है। यह देशहित में नहीं है। दलीय राजनीति को किनारे रखकर चर्चा होनी चाहिए।

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