
उत्तराखंड में चारधाम यात्रा शुरू होते ही श्रद्धालुओं के सैलाब से जिस तरह प्रशासनिक व्यवस्थाएं चरमराई हैं, उसने कई सवालों को जन्म दिया है। तीखी गर्मी के बीच लगे कई किलोमीटर लंबे जाम कष्टकारी और जानलेवा साबित हुए हैं। दरअसल, अक्षय तृतीया के दिन दस मई को केदारनाथ, यमनोत्री और गंगोत्री के कपाट खुले थे। उसके ठीक बाद बारह मई को बद्रीनाथ के कपाट खुलने के बाद तो श्रद्धालुओं का तांता लग गया। स्थिति इतनी विकट हो गई कि पहले पांच दिनों में ढाई लाख से अधिक श्रद्धालु तीर्थों के दर्शन कर चुके थे। इसके अलावा सत्ताईस लाख से अधिक श्रद्धालु अपना पंजीकरण करा चुके थे। बताया जाता है कि पिछले साल के मुकाबले इन दिनों में करीब पांच गुना अधिक श्रद्धालु तीर्थस्थलों तक पहुंचे। स्थिति का अनुमान न लगा पाने के कारण व्यवस्था व सुविधाएं अस्त-व्यस्त होकर रह गई। गर्मी के दौरान कई किलोमीटर लंबे जाम में फंसे होने के कारण कुछ लोगों के रास्ते में मरने की खबरें आ रही हैं। जो साफ बताता है कि उत्तराखंड का शासन-प्रशासन तीर्थ यात्रियों की संभावित संख्या का सही अनुमान नहीं लगा सका। दरअसल, पारिस्थितिकीय रूप से बेहद संवेदनशील इस हिमालयी क्षेत्र की संरचनाएं बड़ी संख्या में तीर्थयात्रियों के दबाव झेलने में सक्षम नहीं हैं। हमारे नीति-नियंताओं ने इस क्षेत्र में भारी-भरकम विकास के नाम पर जो कुछ भी किया वह हिमालयी क्षेत्र की संवेदनशीलता को नजरअंदाज करते हुए ही किया। चारधाम ऑल वेदर रोड बनाने के प्रयास तो हुए लेकिन यात्रा को सहज-सुगम बनाने के लक्ष्य हासिल नहीं किये जा सके। दरअसल, देश के मध्यम वर्ग में आई संपन्नता व बैंकिंग सुविधाओं के चलते वाहनों की खरीद में अप्रत्याशित वृद्धि हुई है। लोग बसों आदि के बजाय अपने वाहन लेकर इन तीर्थ स्थलों पर पहुंच रहे हैं। सरकारें भी सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था को सुगम नहीं बना सकी। जिसके चलते दर्जनों किलोमीटर लंबी वाहनों की कतारें जानलेवा साबित हो रही हैं।
हकीकत यह भी है कि उत्तराखंड का शासन-प्रशासन आने वाले तीर्थयात्रियों की संख्या का ठीक-ठीक अनुमान नहीं लगा सका है। जिसके चलते तीर्थयात्रियों के लिये सुविधाएं भी कम पड़ गई। अफरा-तफरी और कुछ श्रद्धालुओं की मौत के बात शासन-प्रशासन जागा है। फिर आनन-फानन में दर्शन के इच्छुक तीर्थयात्रियों की संख्या को सीमित किया गया। दरअसल, तीर्थयात्रियों का दबाव कम करने हेतु यात्रा के लिये होने वाले नामांकन को भी फिलहाल टाला गया है। लेकिन इस नियमन का असर ये हुआ कि मैदानी इलाकों से चारधाम यात्रा के लिये निकले यात्री बीच के पहाड़ी इलाकों में फंस गये, जहां उनके ठहरने के लिये पर्याप्त व गुणवत्ता की सुविधाए नहीं हैं। जिससे यात्रियों के कष्टों में इजाफा ही हुआ है। दरअसल, वर्ष 2013 की केदारनाथ त्रासदी से सबक लेकर तीर्थयात्रियों के नियमन के लिये जो कदम उठाये जाने चाहिए थे, उनको लेकर गंभीरता नजर नहीं आयी है। वहीं दूसरी ओर गर्मी शुरू होते ही लोगों में पहाड़ों की तरफ निकलने का चलन आम हो गया है। बच्चों की स्कूलों में छुट्टियां होने के चलते तमाम लोग पहाड़ी इलाकों के सैर सपाटों के लिये भी निकलते हैं। लेकिन पहाड़ी इलाकों की अपनी सीमाएं हैं। जो सड़कें कभी सीमित वाहनों के लिये बनी थी, वे कारों का सैलाब नहीं झेल पा रही हैं। एक समय इन इलाकों में ऐसी व्यवस्था होती थी कि जब ऊपर से वाहन निकल जाते थे तब नीचे के वाहनों को ऊपर जाने की अनुमति मिलती थी। मौजूदा समय में भी यात्रियों व वाहनों की संख्या का नियमन व संतुलन करना होगा। तीर्थयात्रियों को भी ध्यान रखना चाहिए कि इन तीर्थस्थलों के कपाट नवंबर माह तक खुले रहेंगे। यात्रियों के दबाव को देखते हुए आने वाले महीनों में भी यात्रा का कार्यक्रम बनाया जा सकता है। साथ ही स्थानीय प्रशासन को भी युद्धस्तर पर यात्रा कार्यक्रम को संचालित करना होगा ताकि तीर्थयात्रियों को परेशानी का सामना न करना पड़े। उत्तराखंड सरकार को भी सोचना होगा कि राज्य की अर्थव्यवस्था में योगदान देने वाले तीर्थाटन को सुनियोजित ढंग से संचालित करने में संवेदनशील दृष्टि दिखाए। अन्यथा ये श्रद्धालु राज्य से अच्छा संदेश लेकर नहीं जाएंगे।


