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संयुक्त राष्ट्र में सुधारों की भारतीय मांग

संयुक्त राष्ट्र अपनी 81वीं वर्षगांठ मना रहा है। यह अवसर केवल उत्सव का नहीं, आत्ममंथन का भी है। विश्व अब बहुधु्रवीय हो चुका है। ऐसे में यूएन को भी बहु-आवाजीय बनना होगा। यदि यह संस्था समय के अनुरूप खुद को ढालने में असफल रहती है, तो नई क्षेत्रीय व्यवस्थाएं, जैसे जी-20, ब्रिक्स और अफ्रीकी संघ, धीरे-धीरे इसकी भूमिका को प्रतिस्थापित कर देंगी…

कल शुक्रवार को वैश्विक संस्था संयुक्त राष्ट्र संघ अपनी स्थापना के बाद 81वें वर्ष में प्रवेश करने जा रही है। 24 अक्तूबर, 1945 में जब द्वितीय विश्व युद्ध की राख से संयुक्त राष्ट्र संघ (यूएनओ) का जन्म हुआ, तो इसके चार्टर में एक ही सपना बुना गया था, विश्व शांति, सहयोग और समानता का ऐसा ताना-बाना, जो आने वाली पीढिय़ों को युद्ध की भयावहता से बचाए। परंतु आज, जब यह संस्था अपने 81वें वर्ष में प्रवेश करने जा रही है, तो उसके मूल उद्देश्य और मौजूदा स्वरूप के बीच गहरी खाई दिखाई देती है। भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 26 सितंबर 2020 को संयुक्त राष्ट्र के 75वें अधिवेशन में जिस दृढ़ता से इस संस्था में व्यापक सुधार की मांग उठाई थी, वह केवल भारत की नहीं बल्कि पूरी दुनिया की आवाज थी। उनका सवाल था, आखिर भारत जैसे देश को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता के लिए और कब तक इंतजार करना होगा?

भारत, जो दुनिया की पहली सबसे बड़ी आबादी और चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था वाला देश है, जिसने शांति, विकास और मानवता के क्षेत्र में अनगिनत योगदान दिए हैं, आज भी सुरक्षा परिषद के निर्णायक वर्ग से बाहर है। दरअसल, संयुक्त राष्ट्र के पांच स्थायी सदस्य अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस, रूस और चीन, वीटो शक्ति के बल पर आज भी पूरी संस्था के निर्णयों को अपनी इच्छा अनुसार नियंत्रित करते हैं। परिणामस्वरूप, चाहे रूस-यूक्रेन का युद्ध हो, गाजा का संकट हो या म्यांमार की स्थिति, संयुक्त राष्ट्र अक्सर असहाय और निष्क्रिय दिखाई देता है। इस वीटो व्यवस्था ने लोकतांत्रिक बहुमत की अवधारणा को कमजोर किया है, क्योंकि एक देश का ‘ना’ विश्व की सामूहिक इच्छा पर भारी पड़ जाता है। इसलिए विश्व के कई प्रमुख देशों की मांग है कि संयुक्त राष्ट्र संघ में विकासशील और कम विकसित देशों को अधिक प्रतिनिधित्व दिया जाना चाहिए। स्थायी सदस्यों को भी एक निश्चित अवधि पूरी होने के बाद बदल दिया जाना चाहिए। भारत, ब्राजील, जर्मनी और जापान ने मिलकर जी-4 समूह बनाकर इस व्यवस्था में बदलाव की मांग की है। भारत का तर्क स्पष्ट है, जब संयुक्त राष्ट्र के निर्णय सभी देशों को प्रभावित करते हैं, तो प्रतिनिधित्व भी सभी को मिलना चाहिए। भारत न केवल एशिया का बल्कि विश्व का प्रामाणिक प्रतिनिधि है, जिसने विकास, जलवायु, न्याय, गरीबी उन्मूलन और शांति स्थापना के लिए ठोस प्रयास किए हैं। शांति अभियानों की बात करें तो भारत का योगदान अनुपम है। 1950 के दशक से अब तक भारत ने 50 से अधिक यूएन मिशनों में 2.9 लाख से अधिक सैनिक भेजे हैं। आज भी भारत के लगभग सात हजार से अधिक सैनिक और पुलिसकर्मी विभिन्न विश्व शांति अभियानों में कार्यरत हैं। भारत ने 82 देशों के आठ सौ से अधिक अधिकारियों को प्रशिक्षण भी दिया है। यह योगदान केवल सैन्य नहीं, बल्कि मानवीय दृष्टि से भी असाधारण है, जो यह साबित करता है कि भारत विश्व शांति में आस्था रखता है, न कि प्रभुत्व में। परंतु दुखद यह है कि ऐसी प्रतिबद्धता के बावजूद भारत को निर्णयकारी मंच से दूर रखा गया है। संयुक्त राष्ट्र की वर्तमान स्थिति यह दर्शाती है कि सुधार की दिशा में ठोस कदम न उठाने पर यह संस्था धीरे-धीरे अपनी प्रासंगिकता खो देगी। दुनिया बदल चुकी है, अब संघर्ष केवल सीमाओं तक सीमित नहीं रहे, बल्कि व्यापार, जलवायु परिवर्तन, महामारी, साइबर अपराध, आतंकवाद और प्रवासन जैसी नई चुनौतियों ने वैश्विक व्यवस्था को जटिल बना दिया है।

इन चुनौतियों के समाधान के लिए 1945 की सोच नहीं, बल्कि 21वीं सदी की समावेशी दृष्टि की आवश्यकता है। इसी तरह आतंकवाद के प्रश्न पर भी संयुक्त राष्ट्र असफल रहा है। 1996 में भारत ने ‘अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद पर व्यापक संधि’ का प्रस्ताव रखा था, परंतु 29 वर्षों बाद भी यह प्रस्ताव अधर में है, क्योंकि सदस्य देश आज तक आतंकवाद की परिभाषा पर सहमत नहीं हो पाए। भारत चाहता है कि जो देश शांति स्थापना, मानवीय सहायता और विकास में वास्तविक योगदान दे रहे हैं, उन्हें निर्णय प्रक्रिया में अधिक प्रतिनिधित्व मिले। भारत जैसे देश, जो जी-20, ब्रिक्स और आईबीएसए जैसे मंचों पर सक्रिय भूमिका निभा रहे हैं, वे इस समावेशी वैश्विक नेतृत्व को आकार देने में सक्षम हैं। नरसंहार, युद्ध अपराध या मानवता के विरुद्ध अपराधों के मामलों में वीटो के उपयोग पर भी सीमा लगाई जानी चाहिए, ताकि न्याय की राह किसी एक देश की राजनीतिक इच्छा पर निर्भर न रहे। साथ ही, संयुक्त राष्ट्र की जवाबदेही और पारदर्शिता के लिए उसके कार्यक्रमों की नियमित समीक्षा और स्वतंत्र लेखा परीक्षण आवश्यक है। भारत की भूमिका केवल सुधार की मांग तक सीमित नहीं, बल्कि यह नेतृत्वकारी भूमिका निभाने को भी तैयार है।

योग दिवस, जलवायु न्याय, वसुधैव कुटुंबकम् की भावना और मानव कल्याण पर आधारित भारत की विदेश नीति यह दिखाती है कि भारत शक्ति संतुलन नहीं, बल्कि संतुलित शक्ति का प्रतीक बनना चाहता है। संयुक्त राष्ट्र अपनी 81वीं वर्षगांठ मना रहा है। यह अवसर केवल उत्सव का नहीं, आत्ममंथन का भी है। विश्व अब बहुधु्रवीय हो चुका है। ऐसे में यूएन को भी बहु-आवाजीय बनना होगा। यदि यह संस्था समय के अनुरूप खुद को ढालने में असफल रहती है, तो नई क्षेत्रीय व्यवस्थाएं, जैसे जी-20, ब्रिक्स और अफ्रीकी संघ, धीरे-धीरे इसकी भूमिका को प्रतिस्थापित कर देंगी। अत: अब समय आ गया है कि संयुक्त राष्ट्र अपने चार्टर के मूल उद्देश्य, ‘हम लोग युद्ध से आने वाली भावी पीढिय़ों को बचाना चाहते हैं’, को फिर से व्यवहार में उतारे और यह तभी संभव है जब भारत जैसे देशों को निर्णायक भूमिका देकर इस संस्था को समावेशी, पारदर्शी और विश्वसनीय बनाया जाए। यही वह दिशा है, जो 21वीं सदी में संयुक्त राष्ट्र को फिर से मानवता की आशा का प्रतीक बना सकती है।

अनुज आचार्य

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