लेख

नेपाल में सत्ता संघर्ष क्यों?

नेपाल में रोजगार के अवसरों की कमी है, जिससे बड़ी संख्या में युवा विदेश जाकर काम करने को मजबूर हैं। बढ़ती महंगाई ने भी आम जनता के जीवन को मुश्किल बना दिया है। वहां अल्पसंख्यक समूहों को लगता है कि उन्हें राजनीतिक प्रतिनिधित्व और सरकारी नीतियों में पर्याप्त जगह नहीं मिली है। नेपाल में राजशाही और हिंदू राष्ट्र की वापसी की मांग भी एक बड़ा कारण है। कुछ लोगों का मानना है कि लोकतंत्र की स्थापना के बाद से देश में अस्थिरता और भ्रष्टाचार बढ़ा है, जबकि राजशाही के दौरान स्थिरता थी। ये मांगें अक्सर प्रदर्शनों का रूप ले लेती हैं। कुछ राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि नेपाल के आंतरिक मामलों में बाहरी शक्तियों का हस्तक्षेप भी राजनीतिक अस्थिरता को बढ़ाता है…

नेपाल में सत्ता का संघर्ष एक बार फिर सुर्खियों में है। 9 सितंबर 2025 को, नेपाल के प्रधानमंत्री ओली ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया है। यह कदम उस सरकार पर बढ़ते जनाक्रोश के बीच उठाया गया, जो हाल ही में लगे सोशल मीडिया प्रतिबंध और व्यापक भ्रष्टाचार के खिलाफ शुरू हुई युवाओं की मांगों से उत्पन्न हिंसात्मक विरोध प्रदर्शनों के चलते बेहद दबाव में आ गई थी। नेपाल का वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य बेहद जटिल है। नेपाल में जेन-जी क्रांति की शुरुआत सोशल मीडिया बैन से शुरू हुई। 4 सितंबर को नेपाल के तब के पीएम ओली ने सोशल मीडिया पर बैन लगा दिया। पहले से भ्रष्टाचार की आग में झुलस रही जनता ने विद्रोह का बिगुल फूंक दिया। सरकार के खिलाफ जेन-जी सडक़ों पर उतर आए। भ्रष्टाचार, नेपो किड्स और राजनीतिक दलों की सड़ांध के खिलाफ जमकर हंगामा किया। प्रदर्शनकारियों ने संसद पर कब्जा कर लिया। सुप्रीम कोर्ट से लेकर संसद और फाइव स्टार होटल तक को प्रदर्शनकारियों ने आग के हवाले कर दिया। मगर एक बात जो अब सबको चौंका रही है कि आखिर राजा के महल को प्रदर्शनकारियों ने क्यों नहीं टच किया। इसके पीछे जो वजह बताई जा रही है, उससे नेपाल में अभी बाकी के क्लाइमेक्स के संदेश मिलते हैं। दरअसल पूर्व राजा ज्ञानेंद्र ने प्रदर्शनकारियों का समर्थन किया था। उन्होंने कहा था कि वे युवाओं के साथ हैं। नेपाल से जुड़े मसलों के जानकारों का मानना है कि जेन-जी के लिए आज भी राजा का महल एक आदरणीय स्थान है। कुछ जेन-जी को नेपाल में मौजूदा लोकतंत्र की अराजकता से राजशाही अब भी बेहतर लगती है।

यही कारण है कि प्रदर्शनकारियों ने राजा के महल को आग के हवाले नहीं किया। उनका गुस्सा नेताओं के प्रति अधिक है। उन्हें भ्रष्ट सिस्टम से दिक्कत है। नेपाल में काफी समय से राजशाही की मांग चल रही है। मार्च 2025 से ही प्रो-मोनार्की प्रदर्शन चल रहे हैं। नेपाल के लाखों लोग राजशाही की बहाली की मांग कर रहे हैं। जेन-जी क्रांति में भी इसकी आहट सुनाई दी। कुछ का मानना है कि 2008 में खत्म हुई राजशाही ही नेपाल को फिर से एकजुट कर सकती है। खासकर तब जब सभी राजनीतिक दल विफल हो चुके हैं और भ्रष्टाचार के दलदल में फंसे हैं। अब सवाल है कि क्या राजशाही की वापसी संभव है? नेपाल में भले अभी सुशीला कार्की की अंतरिम सरकार है, मगर अभी भी पावर वैक्यूम है और अगर जेन-जी सुशीला कार्की से नाराज होते हैं तो राजा की वापसी का मौका बन सकता है। अब नेपाल की अंतरिम पीएम सुशीला कार्की पर नजरें टिकी हैं। नेपाल की पहली महिला चीफ जस्टिस रह चुकीं कार्की एंटी-करप्शन कैंपेनर हैं। वह 73 साल की हैं। वह अंतरिम सरकार में मंत्रियों को शामिल कर रही हैं। अब सवाल है कि क्या सुशील कार्की 6 महीने तक सरकार चला पाएंगी? इसमें कई चुनौतियां हैं। आर्थिक संकट, पड़ोसी देशों का दबाव, और राजशाही का दबाव। अगर सुशीला कार्की जेन-जी की मांगें पूरी नहीं करती हैं तो फिर से नए प्रदर्शन हो सकते हैं। ऐसे में नेपाल में कुछ भी संभव है। 2008 में राजशाही की समाप्ति और संघीय लोकतांत्रिक गणराज्य की स्थापना के बाद नेपाल ने लोकतंत्र की राह पकड़ी। लेकिन जनता के भीतर यह असंतोष भी धीरे-धीरे बढ़ा कि लोकतांत्रिक ढांचे के बावजूद भ्रष्टाचार, बेरोजगारी और राजनीतिक अस्थिरता की समस्याएं कम नहीं हुईं। यही असंतोष धीरे-धीरे एक नए नेतृत्व की ओर देखने की इच्छा में बदल गया। इसी कड़ी में, बालेंद्र शाह, जिन्हें लोकप्रिय रूप से बालेन शाह कहा जाता है, नेपाल की राजनीति में एक नई और बागी छवि के साथ उभरे हैं। एक स्वतंत्र उम्मीदवार के तौर पर काठमांडू महानगर के मेयर चुने जाने के बाद उन्होंने यह साबित किया कि पारंपरिक दलों से अलग भी राजनीति संभव है। वे सीधे भ्रष्टाचार और सत्ता की जड़ जमाई गई सड़ांध पर चोट करते हैं। इस वजह से कई लोग उन्हें ‘विद्रोह का जनक’ मानते हैं।

जहां तक नेपाल राजशाही और हिंदू राष्ट्र की बात है, ऐसा लगता है कि बालेन शाह का सीधा जुड़ाव राजशाही पुनस्र्थापना से नहीं है। उनका आंदोलन मुख्यत: भ्रष्टाचार विरोध और सिस्टम में पारदर्शिता की मांग पर केंद्रित है। हालांकि, यह भी सच है कि जनता के भीतर एक तबका ऐसा है जो भ्रष्ट राजनीति से ऊबकर पुराने हिंदू राष्ट्र और राजशाही की ओर लौटने को विकल्प के रूप में देखता है। इस वजह से बालेन शाह के उभार को कई लोग इस भावना से भी जोडक़र देखते हैं। इस बात से इंकार करना मुश्किल है। कुल मिलाकर कहा जा सकता है कि नेपाल में विद्रोह लोकतंत्र को खत्म कर राजशाही लाने की मांग नहीं है, बल्कि लोकतांत्रिक ढांचे को भ्रष्टाचारमुक्त और जवाबदेह बनाने की एक कोशिश है। हां, उनके उभार ने यह जरूर साबित कर दिया है कि नेपाल की जनता परिवर्तन चाहती है और अगर मौजूदा दल जनता की उम्मीदों पर खरे नहीं उतरे तो राजशाही या हिंदू राष्ट्र जैसी पुरानी व्यवस्थाओं की मांग फिर से मजबूत हो सकती है। नेपाल ने पिछले कुछ सालों में कई बार सरकारें बदलते देखी हैं। किसी भी राजनीतिक दल के पास स्पष्ट बहुमत नहीं होने के कारण गठबंधन सरकारें बनती हैं, जो अक्सर अस्थिर होती हैं। राजनीतिक और व्यक्तिगत स्वार्थ भी इसमें एक बड़ी भूमिका निभाते हैं, जिससे सरकारें लंबे समय तक नहीं चल पातीं। आज भी नेपाल में भ्रष्टाचार और कुप्रशासन एक बड़ी समस्या है। कई घोटालों ने लोगों का सरकार पर से विश्वास कम कर दिया है। नेपाल में रोजगार के अवसरों की कमी है, जिससे बड़ी संख्या में युवा विदेश जाकर काम करने को मजबूर हैं। बढ़ती महंगाई ने भी आम जनता के जीवन को मुश्किल बना दिया है। वहां अल्पसंख्यक समूहों को लगता है कि उन्हें राजनीतिक प्रतिनिधित्व और सरकारी नीतियों में पर्याप्त जगह नहीं मिली है। नेपाल में राजशाही और हिंदू राष्ट्र की वापसी की मांग भी एक बड़ा कारण है। कुछ लोगों का मानना है कि लोकतंत्र की स्थापना के बाद से देश में अस्थिरता और भ्रष्टाचार बढ़ा है, जबकि राजशाही के दौरान स्थिरता थी। ये मांगें अक्सर प्रदर्शनों का रूप ले लेती हैं। कुछ राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि नेपाल के आंतरिक मामलों में बाहरी शक्तियों का हस्तक्षेप भी राजनीतिक अस्थिरता को बढ़ाता है। इसमें जहां तक भारत का प्रश्न है तो हमने हमेशा पड़ोस मे शांति की वकालत की है और करते रहेंगे। संक्षेप में, नेपाल का घटनाक्रम भ्रष्टाचार और जनक्रांति के बीच लोकतांत्रिक संतुलन साधने की कोशिश है। यह दर्शाता है कि नेपाली जनता, खासकर युवा वर्ग, वास्तविक परिवर्तन के लिए लोकतांत्रिक रूप से लडऩे को तैयार है।

डा. वरिंद्र भाटिया

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