लेख

राष्ट्रीय हिंदी दिवस विशेष : हिंदी भाषा का विकास एवं महत्त्व

‘हिंदी हैं हम, वतन है हिंदुस्तां हमारा’, यह पंक्ति हिंदी भाषा और मातृभूमि के प्रति हमारे गहरे लगाव और गर्व की भावना को व्यक्त करती है। हिंदी न केवल संवाद का माध्यम है, बल्कि यह भारतीय संस्कृति, परंपरा और राष्ट्रीय चेतना की आत्मा भी है। आज हिंदी विश्व की प्रमुख भाषाओं में से एक है, और भारत में प्रतिवर्ष 14 सितंबर को हिंदी दिवस मनाकर इसे विशेष सम्मान दिया जाता है। भाषा का स्वरूप समय के साथ बदलता और परिपक्व होता है। हिंदी भाषा का इतिहास भी अत्यंत समृद्ध और विस्तृत रहा है। इसकी उत्पत्ति संस्कृत भाषा से मानी जाती है और इसे आर्यों की आधुनिक भाषा के रूप में देखा जाता है। उत्तर और मध्य भारत की खड़ी बोली से हिंदी की नींव रखी गई, जिसका उल्लेख 11वीं शताब्दी से मिलता है। दिल्ली सल्तनत काल में भले ही फारसी को आधिकारिक भाषा का दर्जा प्राप्त था, किंतु आम जनजीवन की भाषा हिंदी ही थी। उस समय इसे हिंदवी या देहलीवी कहा जाता था। प्रसिद्ध शायर अमीर खुसरो ने अपनी कई रचनाओं और गीतों में हिंदी का प्रयोग कर इसे और समृद्ध किया। मुगल काल तक आते-आते हिंदवी का स्वरूप बदलकर हिंदुस्तानी कहलाने लगा, जिसे देवनागरी और नस्तालीक दोनों लिपियों में लिखा जाने लगा। अंग्रेजी शासन के समय भाषायी विभाजन ने नई दिशा पकड़ी तथा हिंदुस्तानी से उर्दू (नस्तालीक लिपि में लिखी गई) और हिंदी (देवनागरी लिपि में लिखी गई) दो भाषाएं अस्तित्व में आईं। तत्पश्चात राजभाषा के रूप में एक भाषा को अपनाने के लिए संघर्ष निरंतर चलता रहा। अंतत: भारत की स्वतंत्रता के बाद, 14 सितंबर 1949 को संविधान सभा ने हिंदी को राजभाषा का दर्जा दिया। इसके बाद से ही हिंदी हमारे राष्ट्र जीवन का अभिन्न हिस्सा बनी रही और 1953 से 14 सितंबर को प्रतिवर्ष हिंदी दिवस मनाया जाने लगा। हिंदी मात्र एक भाषा नहीं है, यह भारत की सांस्कृतिक चेतना और पहचान की वाहक है।

हिंदी साहित्य, कविता, कहानियों और लोकगीतों के माध्यम से भारतीय समाज के मूल्य, परंपराएं और भावनाएं पीढ़ी दर पीढ़ी संचारित होती रही हैं। कबीर, तुलसी, सूरदास, मीरा, प्रेमचंद, महादेवी वर्मा, दिनकर जैसे महान साहित्यकारों और कवियों ने हिंदी को जन-जन तक पहुंचाया। यह भाषा भारतीय लोकजीवन की धडक़नों से जुड़ी हुई है। हिंदी फिल्मों के गीत, लोककथाएं, नाट्यशालाएं और रंगमंच आज भी करोड़ों लोगों को जोड़ते हैं। यही कारण है कि हिंदी केवल संवाद का माध्यम न होकर, एक भावनात्मक सेतु का कार्य करती है। आज के दौर में हिंदी विश्व की तीसरी सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषा है। लगभग 60-65 करोड़ लोग इसे अपनी मातृभाषा या प्रथम भाषा के रूप में प्रयोग करते हैं, जबकि करोड़ों लोग इसे दूसरी या तीसरी भाषा के रूप में अपनाते हैं। हिंदी की यह व्यापकता इसे वैश्विक स्तर पर महत्वपूर्ण स्थान दिलाती है। भारत में हिंदी 11 राज्यों और 3 केंद्र शासित प्रदेशों की आधिकारिक भाषा है। सरकारी कार्यों, शिक्षा, प्रशासन, साहित्य, पत्रकारिता और मनोरंजन उद्योग में हिंदी का प्रभाव लगातार बढ़ रहा है। 21वीं सदी डिजिटल युग की सदी है। इंटरनेट, मोबाइल, सोशल मीडिया और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसे साधनों ने भाषा के स्वरूप को पूरी तरह बदल दिया है।

गौरव की भाषा, अस्तित्व की चुनौती

भारत अनेक भाषाओं का देश है। यहां कुल मिलाकर सैकड़ों बोलियां और दो दर्जन से अधिक प्रमुख भाषाएं विकसित हैं। हर भाषा अपने क्षेत्र की संस्कृति और समाज का परिचायक है, किंतु हिंदी ने सदियों से एक ऐसी डोर का काम किया है जो विविधता में एकता की सबसे सशक्त कड़ी रही है। संविधान सभा ने 14 सितंबर 1949 को हिंदी को राजभाषा का दर्जा दिया और तभी से प्रत्येक वर्ष यह दिन हिंदी दिवस के रूप में मनाया जाता है। लेकिन केवल उत्सव के तौर पर यह दिन पर्याप्त नहीं है। यह आत्ममंथन का अवसर भी है कि क्या हिंदी अपने ही घर में वह सम्मान पा रही है, जिसकी वह हकदार है। आज हिंदी विश्व की तीसरी सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषा है। नवीनतम आंकड़ों के अनुसार लगभग 61 करोड़ लोग हिंदी बोलते हैं। प्रवासी भारतीयों के बीच भी यह भाषा उनकी पहचान और जड़ों से जुड़े रहने का सबसे मजबूत माध्यम बनी हुई है। यह स्थिति गौरवपूर्ण है, लेकिन एक दुखद विडंबना भी छुपाए हुए है- जिस भाषा का वैश्विक विस्तार हो रहा है, वही अपनी ही धरती पर उपेक्षित होने लगी है। शहरी समाज में हिंदी बोलना पिछड़ेपन का पर्याय बना दिया गया है। निजी अंग्रेजी स्कूलों में बच्चों को हिंदी बोलने पर दंडित किया जाता है और अभिभावक बच्चों से अंग्रेजी में संवाद कर गर्व अनुभव करते हैं। यही कारण है कि आज नई पीढ़ी सहजता से हिंदी में गिनती तक नहीं बोल पाती। महात्मा गांधी ने हिंदी को जनमानस की भाषा बताते हुए कहा था- ‘हिंदी का प्रसार राष्ट्र की आत्मा का प्रसार है।’ वर्तमान परिदृश्य उनकी चिंता को सही साबित कर रहा है।

आज, सात दशक बाद, हमें यह सवाल पूछना पड़ रहा है कि क्या हम सचमुच हिंदी के साथ न्याय कर रहे हैं? क्या हिंदी अपनी वास्तविक भूमिका निभा पा रही है या फिर अंग्रेजी और बाजारवाद की दौड़ में कहीं पीछे छूट रही है? दुर्भाग्य यह है कि आज का शिक्षित वर्ग, विशेषकर हमारे शहरों के युवा, हिंदी बोलने में संकोच अनुभव करते हैं। बच्चों का हिंदी से जुड़ाव केवल पाठ्यपुस्तक तक सीमित होकर रह गया है। यही नहीं, कई जगह बच्चे अपनी मातृभाषाओं- अवधी, भोजपुरी, कुमाउनी, मालवी- पर भी गर्व नहीं करते, और हिंदी उन्हें ‘अनुपयोगी’ भाषा प्रतीत होती है। यह स्थिति चिंताजनक है। भाषा केवल संवाद का साधन नहीं, बल्कि पहचान की धुरी है। लेखक राहुल सांकृत्यायन ने कहा था- ‘भाषा का ह्रास केवल शब्दों का नहीं, संस्कृति का विनाश है।’ हिंदी को खोना मानो उस स्मृति व संस्कृति को खोना है जिसने हमें एक जातीय अस्मिता दी। स्वतंत्रता संग्राम के दौर में हिंदी केवल भाषा भर नहीं रही, बल्कि जनजागरण का हथियार बनी। प्रेमचंद के उपन्यासों से लेकर रामधारी सिंह दिनकर, मैथिलीशरण गुप्त और सुभद्राकुमारी चौहान की कविताओं तक हिंदी ने जनता में चेतना और आत्मविश्वास जगाया।

रोहित पराशर

Show More

Daily Live Chhattisgarh

Daily Live CG यह एक हिंदी वेब न्यूज़ पोर्टल है जिसमें ब्रेकिंग न्यूज़ के अलावा राजनीति, प्रशासन, ट्रेंडिंग न्यूज, बॉलीवुड, बिजनेस, रोजगार तथा टेक्नोलॉजी से संबंधित खबरें पोस्ट की जाती है।

Related Articles

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Back to top button