राष्ट्रीय

कूटनीति-राजनीति का संतुलनकर्ता भारत

पश्चिमी यूरोप में रूस, दक्षिण एशिया में चीन, कोरियाद्वय तथा विगत दस वर्षों में प्रमुख रूप में भारत की राष्ट्रीयता की भावना व विचार शक्तिहीन न होकर प्रत्युत अत्यधिक शक्तिशाली ही हुए हैं। भारत की ये स्थिति डीपस्टेट्स को बेचैन किए हुए है। डीपस्टेट्स के हाथों में जाकर कठपुतली बन जैसे-तैसे चलने की नियति भारत की इसलिए नहीं है. क्योंकि भारतीय सेना का भारत भूमि के प्रति समर्पण असीमित है, जिसके सम्मुख दुनिया की कोई भी नकारात्मक शक्ति कभी भी खड़ी नहीं हो सकती है…

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 79वें स्वतंत्रता दिवस के ध्वजारोहण समारोह में जो भाषण दिया, वह भारत राष्ट्र की कूटनीतियों को सुदृढ़ता तथा विभिन्न बाधाओं के उन्मूलन के प्रति शासन की सुशासकीय कार्यनीतियों की सक्रियता का द्योतक था। उनके अनेक वक्तव्यों ने राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्थितियों के संदर्भ में लोगों को एक नव विचार प्रदान किया है। चाहे वक्तव्य शीघ्र ही भारत के विश्व की सबसे बड़ी तीसरी अर्थव्यवस्था बनने का हो, सामरिक क्षेत्र में व्यापक उन्नति का हो, शासन को फाइलों से निकालकर फील्ड में कार्यव्यस्त करने का हो, वस्तु एवं सेवा कर व्यवस्था के द्वारा कर संग्रहण की सुव्यवस्था के बल पर प्रत्येक तिमाही में कर संग्रह में वृद्धि के बारे में हो, आगामी दिवाली में देशवासियों के लिए वस्तुओं एवं सेवाओं के मूल्य में कमी का हो, अमेरिका हो चाहे कोई अन्य देश उसके मनमाने समझौते के सामने न झुकने का हो, कृषकों, बुनकरों, मछुआरों, लघु क्षेत्र के उद्यमियों व व्यापारियों के हित संरक्षण हेतु सुदृढ़ता से खड़े रहने का हो, अंतरराष्ट्रीय षड्यंत्र से भारत में विपक्ष को जैसे-तैसे राजनीतिक रूप में मजबूत बनाने के लिए देश की जनसांख्यिकी को बदलने का हो, देश में पाकिस्तान, बांग्लादेश तथा अन्य सीमांत देशों से हुई अथवा हो रही अवैध घुसपैठ का हो।

इसके अलावा सुशासन में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सिद्धांतों एवं कार्यपरायण उत्तरदायित्वों के 100 वर्षीय योगदान का हो, अथवा राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के नेतृत्व में केंद्र में भारतीय जनता पार्टी के गत 12 वर्षीय शासन की समयावधि में चहुंदिश अपेक्षाकृत वृहद् उपलब्धियों का वक्तव्य हो, लगभग सभी क्षेत्रों एवं विषयों के बारे में प्रधानमंत्री ने भारतीय जनता को दायित्वबोध के साथ अवगत कराया कि वे राष्ट्र व राष्ट्रीयता के लिए आजीवन समर्पित रहेंगे। प्रधानमंत्री के भाषण के आलोक में आवश्यकता इस विचार की है कि वर्तमान अंतरराष्ट्रीय परिदृश्य सामने जैसा भी दिखाई दे रहा है, वास्तव में वह सत्य नहीं है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड जे. ट्रंप भारत के विरुद्ध जो व जैसी भी राजनीति, अर्थनीति, भाषणनीति एवं कार्यनीति क्रियान्वित करते हुए दिखाई दे रहे हैं, वह अंतरराष्ट्रीय कूटनीति का एक नवीन कार्यव्यवहार है, जो अधिसंख्य लोगों को सीधे-सीधे समझ नहीं आ रहा है। इस कूटनीति में न केवल अमेरिका, भारत तथा विश्व के अन्य देशों के संप्रभुगत हितों की सुरक्षा चिन्हित है, अपितु इसके बल पर समग्र विश्व के डीप स्टेट्स के विरुद्ध एक शक्तिशाली प्रतिरोधी तंत्र भी साकार हो रहा है। ब्रिक्स को इस तंत्र के आरंभिक उभार के रूप में देखा, समझा जा सकता है। इस संदर्भ में भारत अपने प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में अपनी राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय भूमिका, दायित्व एवं कार्यों को भलीभांति संपन्न कर रहा है।

आत्मसम्मान एवं गौरव के साथ अपनी जीवन-यात्रा करने वाले देशों में चाहे भारत हो अथवा कोई अन्य देश, सभी स्थानों पर मुद्रा, मादक व द्रव्य पदार्थों, मानव तस्करी, वेश्यावृत्ति, इत्यादि क्षेत्रों में जो अवैध व्यापार व्यापक स्तर पर होता हुआ आया है तथा अब भी निरंतर हो रहा है, उसमें अमेरिका एवं यूरोप के धनी देशों के वे डीपस्टेट्स खरबपति कुछेक खूंखार लोग लिप्त हैं जो अवैध धन के बल पर पनपी अपनी सनक को पूरी दुनिया पर थोपना चाहते हैं। इसके लिए वे देशों के सामने अपने मनमाने प्रस्ताव रखते हैं। यदि देश राष्ट्रीयता, संप्रभुता के आधार पर ऐसे प्रस्तावों का विरोध करते हैं, तो ये लोग वहां अलोकतांत्रिक ढंग से सत्ता परिवर्तित करके अपने संकेतों पर चलने वाले उन देशों के राजनीतिक दलों, नेताओं, व्यापारियों को सत्तारूढ़ कर देते हैं। लीबिया, इराक, सीरिया, श्रीलंका, बांग्लादेश, पाकिस्तान ऐसे ही देश हैं जहां दुनिया के खरबपति डीपस्टेट्स ने अपने अनुसार सत्ताओं को बनाने-बिगाडऩे का खेल खेला है। ऐसे डीपस्टेट्स ने नाटो के सदस्य 27 यूरोपीय देशों पर भी एक ढंग से अपना आधिपत्य स्थापित कर रखा है। विश्व की प्रमुख संस्थाएं- विश्व व्यापार संगठन, विश्व स्वास्थ्य संगठन, अंतर्राष्ट्रीय मुद्रा कोष, संयुक्य राष्ट्र महासभा इत्यादि सभी की सभी ऐसे डीप स्टेट्स के मनमाने प्रस्तावों के आधार पर ही अपनी वैश्विक नीतियां बनाती हैं तथा उनमें मनमाना परिवर्तन करती हैं। विश्व के ऐसे मानवता विरोधी घातक तंत्र को ध्वस्त करने के लिए गत दस वर्षों से भारत के नेतृत्व में कूटनीति स्तर पर जैसे व जितने प्रयास किए जा रहे हैं, वह इस तंत्र को बुरी तरह चुभने लगे हैं।

फलस्वरूप डीप स्टेट्स तंत्र ने भारत को दबाने के लिए चीन का सहारा लेकर सीमाक्षेत्रों पर दोनों देशों के मध्य संघर्ष बढ़ाने की कुचेष्टा की, बांग्लादेश में तख्तापलट करवाया, म्यांमार में अराजकता फैलाई, नेपाल व श्रीलंका को अस्थिर किया, पाकिस्तान के माध्यम से आतंक फैलाने की युक्तियां अधिक प्रभावी नहीं हुईं तो पहलगाम करवाकर भारत को ऑपरेशन सिंदूर करने के लिए विवश किया और जब पाकिस्तान को परास्त करने वाले अल्पावधि के युद्ध में डीप स्टेट्स ने देखा कि कैसे भारत की सामरिक शक्तियां रूस व इजरायल के सहयोग से उनके नियंत्रण वाले हथियार निर्माताओं की सामरिक शक्तियों को चुनौती देने लगी हैं, तो उन्होंने अमेरिकी शासन पर दबाव डालकर शुल्क वृद्धि का नव कूटनीतिक अभियान छेड़ दिया है। इस आकलन के आधार पर स्पष्ट हो जाता है कि अमेरिका की ओर से राष्ट्रपति ट्रंप के रूप में जो व्यक्ति हमें भारत का प्रत्यक्ष शत्रु दिखाई दे रहा है, वास्तव में वह तो माध्यम है। मूलत: ये डीपस्टेट्स हैं, जो अमेरिका में अपने प्रिय राजनीतिक दल डेमोक्रेट्स एवं इसके नेताओं के माध्यम से राष्ट्रीयता की धारणा पर चलने वाले दल रिपब्लिकन एवं इसके नेता ट्रंप को दिखावटी रूप में दुनिया व भारत के लिए खतरनाक सिद्ध करने पर तुले हुए हैं।

डीपस्टेट्स अथवा ग्लोबलिस्ट्स, अवैध धंधों के बल पर खरबपति बने गिनती के इन कुछेक लोगों को दुनिया के किसी भी देश में देशभक्ति का शासकीय, राजनीतिक व सार्वजनिक वातावरण नहीं चाहिए और जिन देशों में शासन, राजनीति एवं जनता के स्तर पर राष्ट्रीयता का भाव-विचार क्षीण हुआ है, वहां की सेनाओं को अपने नियंत्रण में लेकर इन्होंने मनमाने सत्ता परिवर्तन करवाए हैं। पश्चिमी यूरोप में रूस, दक्षिण एशिया में चीन, कोरियाद्वय तथा विगत दस वर्षों में प्रमुख रूप में भारत की राष्ट्रीयता की भावना व विचार शक्तिहीन न होकर प्रत्युत अत्यधिक शक्तिशाली ही हुए हैं। भारत की ये स्थिति डीपस्टेट्स को बेचैन किए हुए है। डीपस्टेट्स के हाथों में जाकर कठपुतली बन जैसे-तैसे चलने की नियति भारत की इसलिए नहीं है. क्योंकि भारतीय सेना का भारत भूमि के प्रति समर्पण, त्याग की निष्ठा तथा सैन्य पराक्रमी वैभव व्योम जैसा असीमित है, जिसके सम्मुख दुनिया की कोई भी नकारात्मक, अवैध तथा अमानवीय शक्ति कभी भी खड़ी नहीं हो सकती है। स्वतंत्रता दिवस पर प्रधानमंत्री ने देशवासियों के लिए राष्ट्रीयता का जैसा आह्वान किया है, वह षड्यंत्रकारी वैश्विक परिस्थिति के संदर्भ में ही किया गया है। अत: स्वतंत्रता दिवस मनाने की श्रेष्ठ शिक्षा यही है कि लोगों को अब देश में राजनीति के उन खटकर्मों की उपेक्षा आरंभ करनी होगी, जो कहीं न कहीं वैश्विक डीपस्टेट्स की खाद-पानी से नकारात्मक एवं अनुपयोगी होकर उछल-कूद मचाए हुए हैं।-विकेश कुमार बडोला

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