‘सिंदूर’ की सियासत

पाकपरस्त आतंकवाद और ‘ऑपरेशन सिंदूर’ पर खूब सियासत हो रही है। प्रधानमंत्री मोदी शहर-शहर जनसभाओं को संबोधित कर रहे हैं। खूब तालियां और नारेबाजी बटोर रहे हैं। विपक्ष और खासकर कांग्रेस साररूप में ‘ऑपरेशन सिंदूर’ और मोदी सरकार की विदेश नीति को नाकाम करार दे रही है। विपक्ष की व्याख्या है कि मोदी सरकार के नेतृत्व में भारत अकेला रहा, जबकि पाकिस्तान के साथ चीन, तुर्किये, अजरबैजान आदि देश सक्रिय रूप से जुड़े रहे। विपक्ष सेना के शौर्य, पराक्रम और प्रहारों की प्रशंसा कर रहा है, लेकिन सरकार को हर स्तर पर नाकाम आंक रहा है। सरकार और सेना को विभाजित कैसे किया जा सकता है? सेना भी सरकार का ही हिस्सा है और राजनीतिक नेतृत्व के निर्देश पर ही काम करती है। क्या कांग्रेस, तृणमूल, सपा, शिवसेना (उद्धव) और वामपंथी दल इसीलिए संसद के विशेष सत्र की मांग कर रहे हैं, ताकि उनके सवालों पर विमर्श को केंद्रित किया जा सके और वे शब्द संसदीय रिकॉर्ड में दर्ज किए जा सकें? ताकि विपक्ष प्रधानमंत्री समेत सत्ता-पक्ष की घेराबंदी कर सके? बेशक हम संसद के आपातकालीन सत्र के खिलाफ नहीं हैं, संसद लोकतंत्र का अंतिम और निर्णायक मंच है, लेकिन उस सत्र से देश को हासिल क्या होगा? विपक्ष वही सवाल संसद में भी दोहरा सकता है, जो अब भी कर रहा है और मीडिया में खूब छप रहे हैं और टीवी चैनलों पर चिल्ल-पौं भी जारी है। ऐसी ही सियासत के लिए संसद सत्र हररोज नहीं बुलाए जा सकते। मॉनसून सत्र एक माह दूर ही है। संसद सत्र की कार्यवाही पर करोड़ों रुपए खर्च होते हैं। ‘ऑपरेशन सिंदूर’ अभी जारी है। बहुत से निष्कर्ष अभी हासिल किए जाने हैं। बेशक विपक्ष के विरोध का केंद्र प्रधानमंत्री मोदी ही हैं और विरोध के मद्देनजर फर्जी नेरेटिव भी गढ़े जा रहे हैं। सत्ता-पक्ष 1947-48 के दौर में तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरु की ऐतिहासिक गलतियों को दोहराएगा और बाद में प्रधानमंत्री रहीं इंदिरा गांधी की नाकामियों को भी गिनाएगा। आखिर इतिहास पर रोने-धोने से देश को हासिल क्या होगा? देश के सामने अद्र्धसत्य ही आएंगे, क्योंकि उस दौर की पीढ़ी तो लगभग दिवंगत हो चुकी है। इतिहास पूर्वाग्रहों पर आधारित हैं। दरअसल आज नेहरु-इंदिरा के नाम पर वोट भी नहीं मिलते।
सवाल है कि एक सशस्त्र ऑपरेशन चलाने, आतंकियों के 9 प्रमुख अड्डे मिट्टी-मलबा कर देने और 172 आतंकियों को ढेर कर देने के निष्कर्ष के तौर पर चंद सवाल ही पूछे जा रहे हैं कि देश को क्या मिला? क्या आतंकवाद खत्म हो गया? क्या हाफिज सईद, मसूद अजहर सरीखे खूंखार आतंकी सरगनाओं को भारत को सौंपने की शर्त तय हुई है? यह सब कुछ अनर्गल है। बहरहाल सियासत के प्रतीक के तौर पर अब ‘सिंदूर’ मिल गया है। भाजपा भी घर-घर जाकर महिलाओं को उपहार के तौर पर ‘सिंदूर’ बांटेगी। क्या सिंदूर कोई भी, किसी भी समय, बांट सकता है अथवा यह वैवाहिक रस्मों की एक पवित्र प्रक्रिया है? भाजपा ने 9 जून से एक माह का राष्ट्रीय अभियान शुरू करना तय किया है। इस तारीख पर, बीते वर्ष 2024 को, प्रधानमंत्री मोदी ने लगातार तीसरी बार प्रधानमंत्री पद की शपथ ली थी। उसी की सालगिरह मनाई जा रही है। मोदी पहली बार 26 मई, 2014 को देश के प्रधानमंत्री बने थे। उन्होंने यह तारीख गुजरात की जनता के साथ साझा की है। अब ‘सिंदूर’ ऐसा प्रतीक भाजपा के हाथ लगा है कि वह देश की जनता को सेना, युद्ध और आतंकवाद के आधार पर भावुक बना सकती है, लिहाजा पार्टी के पक्ष में एक राजनीतिक धु्रवीकरण भी हो सकता है। भाजपा का नया जनाधार भी तैयार हो सकता है। इस अभियान के दौरान केंद्रीय मंत्री और सांसदों समेत पार्टी पदाधिकारी और काडर पदयात्रा भी करेंगे। बूथ स्तर की सियासत सक्रिय की जाएगी। आम आदमी तक ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के सच भी भेजे जाएंगे और मोदी सरकार की प्रमुख योजनाओं के प्रचार भी किए जाएंगे। राजनीति की पराकाष्ठा यह है कि ‘ऑपरेशन सिंदूर’ के दौरान जिन विभागों ने, किसी भी तरह का, योगदान दिया था, उस पर एक डॉक्यूमेंट्री फिल्म भी बनाई जाएगी। विभागों के कर्मचारियों के परिजनों को वह शॉर्ट फिल्म दिखाई जाएगी। वीर रस और गौरव से भरी ऐसी सियासत नहीं देखी। पाकिस्तान को आतंकवादी देश घोषित कराने के लिए दबाव डालना होगा।



