संपादकीय

चार ट्रिलियन डॉलर की आर्थिकी

भारत जापान को पीछे कर दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन गया है। यकीनन ऐतिहासिक उपलब्धि और सुखद खबर है। नीति आयोग के सीईओ बीवीआर सुब्रह्मण्यम ने परिषद की बैठक में यह घोषणा की। अब भारत की अर्थव्यवस्था 4.187 ट्रिलियन, अर्थात 4000 अरब डॉलर की है। 2028 में भारत की अर्थव्यवस्था 5.58 ट्रिलियन डॉलर की हो सकती है और भारत जर्मनी (5.25 ट्रिलियन डॉलर) को पछाड़ कर तीसरे स्थान पर पहुंच सकता है। फिलहाल अमरीका (30 ट्रिलियन से अधिक), चीन (19 ट्रिलियन से ज्यादा) और जर्मनी (4.75 ट्रिलियन डॉलर) ही भारत से बड़ी अर्थव्यवस्थाएं हैं। बीते 10 सालों के दौरान भारत की अर्थव्यवस्था दोगुनी हुई है। 2032 में भारत 10 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था वाला देश होगा। भारत की इतनी अर्थव्यवस्था स्वाभाविक भी है, क्योंकि यह 146 करोड़ से अधिक की आबादी वाला देश है। देश की सकल आय और संसाधन ही जीडीपी का आकार तय करते हैं। भारत की आर्थिक विकास दर 6-7 फीसदी या उससे अधिक 8-9 फीसदी तक रही है। औसत 6.5 फीसदी के करीब मान सकते हैं, जबकि अमरीका की विकास दर 2.1 फीसदी है और चीन की 4.5 फीसदी है। यह अर्थव्यवस्था तब है, जब हमने कोरोना वैश्विक महामारी का दंश तीन साल तक झेला और हमारी आर्थिक विकास दर ऋणात्मक हो गई थी। अर्थव्यवस्था की यह गति और उछाल 1991 से शुरू हुई, जब तत्कालीन वित्त मंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने आर्थिक उदारीकरण और भूमंडलीकरण की शुरुआत की। भारत एक खुली अर्थव्यवस्था और खुले बाजार वाला देश बना। बेहतर यह रहा कि राजनीतिक विपक्ष के प्रधानमंत्रियों-अटल बिहारी वाजपेयी और नरेंद्र मोदी-ने उन आर्थिक सुधारों को, नए समकालीन, अपेक्षित संशोधनों के साथ, जारी रखा। आज नतीजा सामने है कि भारत दुनिया की चौथी बड़ी अर्थव्यवस्था है और सबसे तेज गति से विकास कर रहा है।

नीति आयोग के सीईओ ने अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) के ताजा आंकड़ों के आधार पर यह घोषणा की है, लेकिन आज भी एक विरोधाभासी विडंबना हमारे साथ चिपकी है कि भारत एक अमीर देश है, लेकिन उसके नागरिक गरीब हैं। इतनी बड़ी अर्थव्यवस्था होने के बावजूद भारत में आज भी 20 करोड़ से अधिक लोग गरीबी-रेखा के नीचे जीने को अभिशप्त हैं। कुछ विशेषज्ञ यह आंकड़ा ज्यादा बताते हैं। गरीबी रेखा बहुआयामी भी परिभाषित की गई है, जिसके मुताबिक, 11 करोड़ भारतीय आज भी गरीब हैं। यह निष्कर्ष संघ के संगठन ‘स्वदेशी जागरण मंच’ का है। ऐसा नहीं है कि अमरीका में गरीब नहीं हैं अथवा महंगाई, बेरोजगारी, किसानी की समस्याएं नहीं हैं, लेकिन वहां प्रति व्यक्ति सामाजिक सुरक्षा की व्यवस्था है। कम आबादी है और अर्थव्यवस्था सबसे बड़ी है। बहरहाल भारत में आज भी 80 करोड़ से अधिक लोगों को, प्रति माह, मुफ्त अनाज बांटा जाता है। वे मुफ्त की उस योजना के मोहताज हो गए हैं। यह योजना कोरोना के दौरान शुरू की गई थी और अभी 2029 तक तो चलेगी। भारत में अंबानी, अदाणी, गोयनका, बिरला, गोदरेज सरीखा एक अति धनाढ्य वर्ग है, तो करीब 82 फीसदी आम आदमी ऐसे भी हैं, जिन्हें औसतन 560 रुपए प्रतिदिन की कमाई ही नसीब है। भारत में ऐसी आर्थिक विषमताएं और असमानताएं आजादी के दिन से ही हैं। ये कांग्रेस के सत्ता-काल में भी थीं, लिहाजा ‘गरीबी हटाओ’ का नारा दिया गया था। लेकिन इन विषमताओं के बावजूद भारत एक ‘आर्थिक महाशक्ति’ बना है। भारत में फिलहाल प्रति व्यक्ति आय 2.5 लाख रुपए से कुछ अधिक है, लेकिन जापान, ब्रिटेन, फ्रांस आदि देशों में यह हमसे कई गुना ज्यादा हैं, हालांकि वे अर्थव्यवस्थाएं भारत से पिछड़ चुकी हैं। प्रति व्यक्ति आय के संदर्भ में भारत 141वें स्थान पर है, जबकि जापान का स्थान 34वां है। हम मानव विकास सूचकांक में भी बहुत पीछे हैं। आज भी कुपोषण एक नाजुक मुद्दा है, लेकिन आज भारत 23,622 करोड़ रुपए का रक्षा-निर्यात करता है। लघु, सूक्ष्म कंपनियां भी 12.39 लाख करोड़ रुपए का निर्यात करती हैं और दिसंबर, 2024 तक इस सेक्टर में 24 करोड़ से अधिक रोजगार दिए गए हैं। विकास के असंख्य आयाम भारत स्थापित कर चुका है, लेकिन भयावह सवाल पर भी चिंतन हो।

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