संपादकीय

गर्म सिंदूर वाला लहू

पहलगाम नरसंहार को एक माह बीत चुका है। उन मासूम, बेगुनाह लोगों के हत्यारे और बहन-बेटियों का सिंदूर उजाडऩे वाले पापी कहां हैं, यह सहज सवाल हमारे भीतर भी खदबदा रहा है। हम देश की सेना और सुरक्षा बलों के साहस, पराक्रम और जांच पर रत्ती भर भी सवाल नहीं कर रहे हैं। उन्होंने 3000 संदिग्धों या आतंकियों के ‘जयचंदों’ से पूछताछ कर सुराग टटोलने की कोशिशें की हैं। कुछ गिरफ्तारियां भी की गई हैं। बीते 10-12 दिनों में कुछ आतंकियों और घुसपैठियों को ढेर भी किया गया है। यह आलेख लिखने तक जम्मू-कश्मीर के किश्तवाड़ में सेना और सुरक्षा बलों ने कुछ आतंकियों की घेराबंदी की थी और मुठभेड़ जारी थी। खुफिया लीड थी कि जैश-ए-मुहम्मद के 3-4 आतंकी उस इलाके के जंगलों में छिपे हैं। दरअसल पहलगाम नरसंहार आज भी एक जिंदा और प्रासंगिक मुद्दा है। उसी के संदर्भ में प्रधानमंत्री मोदी ने बीकानेर में लोगों को संबोधित करते हुए जो रौद्र रूप दिखाया है, वह अभूतपूर्व है और उसमें पहलगाम में सिंदूर मिटाने, उजाडऩे की चिंता और आक्रोश भी निहित है। प्रधानमंत्री इसे गुस्सा या आक्रोश ही नहीं मानते, बल्कि समर्थ भारत का रौद्र रूप और न्याय का नया स्वरूप मानते हैं और यही ‘ऑपरेशन सिंदूर’ है। प्रधानमंत्री ने यहां तक कहा कि उनकी रगों में लहू नहीं, गर्म सिंदूर बह रहा है।…जो सिंदूर मिटाने निकले थे, उन्हें मिट्टी में मिलाया है।…जब सिंदूर बारूद बन जाता है, तो उसके क्या नतीजे होते हैं, यह दुश्मन ने देख लिया है।’ प्रधानमंत्री मोदी के ये शब्द अभिधात्मक नहीं हैं, बल्कि सिंदूर के प्रतीक के तौर पर लाक्षणिक हैं। प्रधानमंत्री अब भी पहलगाम और सिंदूर की त्रासदियों से जुड़े हैं। यह राजनीति नहीं है। कोई भी चुनाव सामने नहीं है। बिहार और राजस्थान के बीच व्यापक दूरियां हैं। बीकानेर के एयरबेस से कुछ ही दूरी पर, सीमापार, पाकिस्तान का रहीम यार एयरबेस है, जो ध्वस्त होने के बाद आईसीयू में पड़ा है। न जाने अब वह कब खुलेगा। प्रधानमंत्री ने देश को बताया है कि सिंदूर उजाडऩे का बदला लिया जा चुका है, प्रण पूरा किया गया है।

प्रधानमंत्री ने यह भी स्पष्ट किया है कि यदि अब कोई आतंकी हमला भारत पर किया जाएगा, तो उसका करारा जवाब दिया जाएगा। हम आतंक और उसके सरपरस्तों को अलग-अलग नहीं समझेंगे, लिहाजा करारा जवाब पाकिस्तान, उसकी फौज और अर्थव्यवस्था को भी झेलना पड़ेगा। प्रधानमंत्री मोदी ने पाकिस्तान को यहां तक चेतावनी दी है कि उसे पाई-पाई को मोहताज कर दिया जाएगा। विडंबना यह है कि प्रमुख विपक्षी पार्टी कांग्रेस प्रधानमंत्री के संबोधन और सरोकारों को ‘फिल्मी डॉयलॉग’ करार दे रही है। नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने कहा है कि प्रधानमंत्री खोखले भाषण देना बंद करें। कैमरे के सामने ही आपका लहू गर्म क्यों होने लगता है? कांग्रेस लगातार सवाल दाग रही है कि जब हालिया संघर्ष में भारत ने पाकिस्तान का बहुत कुछ तबाह कर दिया था, तो अचानक युद्धविराम क्यों किया गया? अमरीकी राष्ट्रपति टं्रप के दबाव में युद्धविराम क्यों किया गया? आखिर हम पीओके तक पहुंच कर उसे वापस लेने में नाकाम क्यों रहे? ऐसे कई सवाल हैं, जिनके जवाब विदेश मंत्रालय और हमारे डीजीएमओ दे चुके हैं। दरअसल आज के संदर्भ में 1971 का भारत-पाक युद्ध और तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी भी प्रासंगिक हैं। 1972 में ‘शिमला समझौते’ के बाद तत्कालीन सैन्य फील्ड मार्शल जनरल सैम मॉनकशॉ ने इंदिरा गांधी के सामने जो टिप्पणी की थी, हम उसे लिख नहीं सकते। अलबत्ता कांग्रेस बखूबी जानती है कि तब युद्ध में पाकिस्तान के 93,000 से अधिक फौजियों के आत्मसमर्पण के बावजूद भारत पीओके को अपने कब्जे में क्यों नहीं ले सका था? युद्धविराम का सवाल तब भी प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से किया गया था। बहरहाल राष्ट्रपति टं्रप की विश्वसनीयता पर खुद अमरीका की रपट है कि उनके पहले कार्यकाल के दौरान राष्ट्रपति ने 30,573 झूठे या भ्रामक दावे किए थे। इस बार भी वह 8-10 बार बयानों को बदल चुके हैं। कांग्रेस को किसका भरोसा होगा कि युद्धविराम में उनकी कोई भूमिका नहीं थी। बहरहाल पहलगाम आज भी एक राष्ट्रीय मुद्दा है और प्रधानमंत्री के नेतृत्व में हमारी सेनाओं ने आतंकवाद का फन कुचलने की दमदार नीति और रीति दिखाई है। एकजुट होकर चलने की जरूरत है।

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