संपादकीय

पहलगाम के बाद

पहलगाम का आतंकी हमला हताशा में किया गया एक ऐसा कुकृत्य है, जिस पर हमेशा की तरह सुई पाकिस्तान की तरफ घूमती है। खुद आतंकवाद का दंश झेल रहा एक देश सरकारी और तैयार आतंकियों के जरिये भारत को बार-बार गहरे जख्म देने की नापाक नीति पर चल रहा है। पाकिस्तान स्थित प्रतिबंधित लश्कर-ए-तैयबा के एक संगठन द रेजिस्टेंस फ्रंट ने पर्यटकों पर हुए इस कायरतापूर्ण हमले की जिम्मेदारी ली है। इस दुखद घटना ने वर्ष 2008 में दुस्साहसपूर्ण ढंग से मुंबई और भारत को हिलाकर रख देने वाले लश्कर-ए-तैयबा द्वारा रचे गए नरसंहार की याद दिला दी है। यह महज संयोग नहीं कि यह हमला 26/11 के आरोपी तहव्वुर राणा के भारत प्रत्यर्पण और पाक सेना प्रमुख जनरल असीम मुनीर के भारत विरोधी बयान के बीच हुआ है। मुनीर ने पिछले हफ्ते ही कश्मीर को अपने देश की ‘गले की नस’ बताकर 22 अप्रैल के हमले की भयावहता की जमीन तैयार कर दी थी। एक ओर जहां बलूच विद्रोह ने मुनीर व सेना की नींद उड़ा रखी है, वहीं उन्होंने दो-राष्ट्र सिद्धांंत को उछालना चुना। दावा किया कि हिंदुओं व मुसलमानों में कोई समानता नहीं है। गैर मुस्लिमों को निशाना बनाना और वह भी अमेरिकी उपराष्ट्रपति जे.डी.वेंस की भारत यात्रा के दौरान- यह स्पष्ट करता है कि आतंकवादियों व उनके आकाओं ने भाजपा के नेतृत्व वाली सरकार को चुनौती दे दी है। पाक ने पर्यटकों की मौत पर शोक व्यक्त करने का प्रपंच तो रचा, लेकिन हमले की निंदा करने से परहेज किया। उरी(2016) और पुलवामा (2019) की तरह क्या पहलगाम हत्याकांड भी ऐसी प्रतिक्रिया को जन्म देगा? मोदी सरकार, क्या पाकिस्तान को फिर से सबक सिखाने के लिये भारी दबाव में है? वैसे कूटनीतिक मोर्चे पर, भारत के लिये अंतर्राष्ट्रीय क्षेत्र में इस्लामाबाद को बेनकाब और शर्मिंदा करने का एक बड़ा अवसर है। पहलगाम जांच के नतीजों और राणा से पूछताछ से भारत के इस रुख की पुष्टि होने की उम्मीद है कि पाकिस्तान आज भी आतंकवाद का केंद्र बना हुआ है।

बहरहाल, पहलगाम के बैसरन में पाक पोषित आतंकियों ने जो खूनी खेल खेला, उसने पूरे देश को झकझोरा है। सैर-सपाटे के लिये गए लोगों को मौत मिलेगी, ऐसी किसी ने कल्पना भी नहीं की होगी। लेकिन एक हकीकत है कि देश-विदेश के 26 पर्यटक आतंकियों की गोली के शिकार हुए। हमले ने शेष देश के साथ कश्मीर की आत्मा को भी झकझोरा है। यह त्रासदी सिर्फ जम्मू-कश्मीर की ही नहीं है, बल्कि इस हमले ने पूरे देश को गहरा जख्म दिया है। उल्लेखनीय तथ्य यह है कि इस पीड़ादायक हादसे के बाद घाटी के लोगों ने हमले की एकजुट होकर निंदा की गई है। घाटी में 35 साल बाद पहली बार आतंकी हमले के खिलाफ बंद का आयोजन किया गया है। बुधवार को बंद के आह्वान के बाद श्रीनगर में अधिकांश व्यापारिक प्रतिष्ठान बंद रहे। लोग सड़कों में दुख और आक्रोश व्यक्त करते नजर आए। कहा कि यह घटना कश्मीर की अतिथि और शांति की भावना के साथ विश्वासघात है। लश्करे-ए-तैयबा से जुड़े आतंकी संगठन के इस हमले का मकसद पर्यटकों में खौफ पैदा करना और घाटी में सामान्य स्थिति की वापसी को रोकना था। यहां उल्लेखनीय है कि बीते साल जम्मू-कश्मीर में पैंतीस लाख से अधिक पर्यटक पहुंचे थे। लेकिन पहलगाम जैसी जगह में जहां सत्तर फीसदी लोगों की आजीविका पर्यटन से जुड़ी है, वहां स्थिति सामान्य होने में अब लंबा वक्त लगेगा। आने वाले दिनों के लिये पर्यटकों ने अपनी यात्राएं रद्द कर दी हैं। बहरहाल, इस दुर्भाग्यपूर्ण घटना के बाद केंद्र सरकार ने युद्धस्तर पर कार्रवाई की है। प्रधानमंत्री मोदी अपनी विदेश यात्रा को बीच में ही रोककर भारत लौटे हैं। गृहमंत्री अमित शाह ने भी घाटी पहुंचकर तत्काल जमीनी स्थितियों का आकलन होने तक पूरी सरकारी मशीनरी की ताकत झोंक दी है। तात्कालिक प्रतिक्रिया के तौर पर इस संवेदनशील क्षेत्र की सुरक्षा बढ़ा दी गई है। वहीं रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने कहा कि हमलावरों को यथाशीघ्र को कड़ा जवाब दिया जाएगा। लेकिन अधिकारियों को घाटी की उन आवाजों को भी बुलंद करना चाहिए जिन्होंने हिंसा को खारिज करके मानवता को चुना है।

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