संपादकीय

बदलेगा मनरेगा

भले ही मौजूदा केंद्रीय सरकार में महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना यानी मनरेगा को लेकर उत्साहजनक प्रतिसाद नजर न आता हो, लेकिन बदलते वक्त में पैदा चुनौतियों में भी इसकी प्रासंगिकता कम नहीं हुई है। कोरोना काल ने इस योजना की उपयोगिता को साबित किया है। देश के ग्रामीण अंचल में जहां एक ओर लाखों श्रमिकों व महिलाओं को रोजगार मिला, वहीं अन्य राज्यों के लिये होने वाले पलायन पर रोक लगी। सही मायनों में देश के आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिये एक उम्मीद बनकर उभरा है मनरेगा। खासकर अकुशल श्रमिकों को अपने घर के आसपास काम मिलने से लाखों घरों के चूल्हे जलते रहे हैं। लंबे समय से इस योजना के लिये धन आवंटन तथा काम के दिन व मजदूरी बढ़ाने की मांग होती रही है। जिस पर संसद की स्थायी समिति ने मोहर लगा दी है। दरअसल हाल ही में संपन्न बजट सत्र के अंतिम सप्ताह में संसदीय समिति ने मंदी की आहट व ग्लोबल वार्मिंग के प्रभावों के चलते श्रम दिवसों की संख्या डेढ़ सौ दिन करने के साथ मजदूरी चार सौ रुपये प्रतिदिन करने की सिफारिश की है। निस्संदेह, बढ़ती महंगाई व अदृश्य बेरोजगारी दूर करने में ये बदलाव लाभकारी साबित हो सकते हैं। मौजूदा दौर में कम मजदूरी में जीवन-यापन लगातार कठिन होता जा रहा है। यदि ये बदलाव सिरे चढ़ते हैं तो योजना के सार्थक परिणाम सामने आएंगे। जिसे मूर्तरूप देने हेतु मनरेगा के लिये आवंटित धन में वृद्धि भी जरूरी है।

इसमें दो राय नहीं कि मनरेगा को लेकर अनेक विसंगतियां भी सामने आई हैं। इसमें भ्रष्टाचार और फर्जी प्रमाणपत्रों के जरिये लाभ उठाने के मामले हैं। आधार कार्ड के जरिये भुगतान ऑनलाइन करने के बाद लाखों श्रमिक फर्जी पाये गए। निस्संदेह, योजना के क्रियान्वयन में पारदर्शिता जरूरी है। लेकिन मानना चाहिए कि ग्रामीण इलाकों में कम पढ़े-लिखे लोगों व ऑनलाइन सेवाओं का उपयोग न कर पाने से भी कई तरह की विसंगतियां सामने आ सकती हैं। इसमें ठेकेदारों की मनमानी व अनियमितताओं की भी भूमिका हो सकती है। दरअसल, ग्रामीण विकास व पंचायती राज मंत्रालय की स्थायी समिति ने योजना का मूल्यांकन करके कई रचनात्मक सुझाव दिए थे। जिसमें राज्यों में मजदूरी में एकरूपता लाने तथा काम के दिन बढ़ाने के भी सुझाव शामिल थे। जिस पर अब संसद की स्थायी समिति ने मोहर लगाई है। साथ ही,नीतिगत सुधारों के लिये पारदर्शी सर्वेक्षण की बात भी कही गई है। निस्संदेह, ऐसे प्रयासों से योजना में श्रमिकों की भागीदारी बढ़ेगी। साथ ही जरूरी है कि मनरेगा के जरिये उत्पादक कार्यों को बढ़ावा दिया जाए। जिससे देश की कर्मशील आबादी में वृद्धि होगी। शायद तब देश के अस्सी करोड़ों लोगों को मुफ्त अनाज बांटने की जरूरत न होगी। लेकिन साथ ही जरूरी है कि मनरेगा के बजट आवंटन में जो ठहराव पिछले दिनों देखने में आ रहा था, उसे भी दूर किया जाए। जिसको लेकर विपक्षी कांग्रेस सत्तारूढ़ दल पर हमले बोलती रही है। कांग्रेस अपने कार्यकाल में लायी गई योजना को आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के लिये सुरक्षा कवच बताती रही है।

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