चुपचाप रहकर ‘महातबाही’ से बच गया भारत, चीन कहां खा गया गच्चा?

नई दिल्ली: चीन का आक्रामक रवैया अमेरिका को कतई रास नहीं आया है। यही कारण है कि पूरी दुनिया में अकेला ड्रैगन ही गच्चा खाया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने बुधवार देर रात को चौंकाने वाला कदम उठाया। उन्होंने भारत समेत ज्यादातर देशों पर लगने वाले भारी टैक्स को रोक दिया। लेकिन, चीन को उन्होंने नहीं बख्शा। ट्रंप ने चीन पर टैक्स को 125% तक बढ़ा दिया। ट्रंप ने दावा किया कि यह फैसला उन्होंने चीन की ओर से विश्व बाजारों के प्रति अनादर दिखाने के कारण लिया। इसके पहले चीन ने जवाबी ऐक्शन लेते हुए अमेरिकी उत्पादों पर 84% टैक्स लगाने का ऐलान किया था। इससे चीन और अमेरिका के बीच तलवारें खिंच गईं। अमेरिका का इतना ऊंचा टैरिफ चीनी वस्तुओं को अमेरिकी बाजार में लगभग प्रतिस्पर्धा से बाहर कर देगा। इससे चीन के निर्यात में भारी गिरावट आएगी। उसकी आर्थिक विकास दर प्रभावित होगी। बेरोजगारी बढ़ सकती है। इसके उलट भारत ने इस ‘महातबाही’ को ‘चुपचाप’ रहकर बचा लिया। उसने पूरे मामले में सधा रुख अपनाया। विवाद के बजाय बातचीत का रास्ता अपनाया।
पॉज से पहले अमेरिका ने जिन देशों पर रेसिप्रोकल टैरिफ लगाए थे, उस लिस्ट में भारत और चीन दोनों के नाम शामिल थे। लेकिन, पूरे मामले को डील करने में भारत और चीन के रुख में जमीन-आसमान का अंतर देखने को मिला। अमेरिका के टैरिफ के जवाब में चीन ने भी जवाबी टैरिफ लगाए। इसने व्यापार युद्ध को हवा दी। दोनों देशों की इस जंग ने वैश्विक व्यापार व्यवस्था को भी अस्थिर किया। चीन इस व्यापार युद्ध में बुरी तरह उलझ गया। उसका फोकस अन्य महत्वपूर्ण रणनीतिक क्षेत्रों से भटक गया।
भारी-भरकम टैरिफ चीन को कर देगा प्रतिस्पर्धा से बाहर
125% टैरिफ चीन के लिए गंभीर चुनौती है। इसका असर सिर्फ उस पर ही नहीं, वैश्विक अर्थव्यवस्था पर भी होगा। इतना भारी-भरकम टैरिफ चीनी वस्तुओं को अमेरिकी बाजार में लगभग अप्रतिस्पर्धी बना देगा। इससे चीन के निर्यात में भारी गिरावट आनी तय है। यह उसकी आर्थिक विकास दर को भी प्रभावित करेगा। पहले ही चीन की अर्थव्यवस्था सुस्ती से गुजर रही है। यह चीन में बेरोजगारी को भी बढ़ा सकता है। चीन एक्सपोर्ट-ओरिएंटेड देश है। ऐसे में उसे नए बाजार तलाशने होंगे।
इसके अलावा चीन ग्लोबल सप्लाई चेन का महत्वपूर्ण हिस्सा है। चीनी वस्तुओं पर ऊंचे टैरिफ लगने से वैश्विक व्यापार में बड़ा व्यवधान आएगा। इससे कई अन्य देशों की अर्थव्यवस्थाएं भी प्रभावित होंगी। चीनी वस्तुओं के विकल्प महंगे हो सकते हैं। इससे आयात करने वाले देशों में महंगाई बढ़ सकती है। इस तरह का कदम चीन और टैरिफ लगाने वाले अमेरिका के बीच भू-राजनीतिक तनाव को और बढ़ाएगा। इससे अंतरराष्ट्रीय संबंध और जटिल हो सकते हैं।
भारत ने बड़ी कुशलता से खुद को बचाया
दूसरी ओर भारत की संतुलित और संवाद-आधारित रणनीति ने उसे बेहतर स्थिति में रखा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अमेरिका जाकर ट्रंप के सामने भारत की बात रखी। इस मुलाकात के बाद अमेरिका के साथ संवाद बनाए रखा। ट्रंप की नीतियों को समझने के प्रयास ने भारत को संभावित नुकसान से बचाया। नए अवसरों का पता लगाने में मदद की। फायदा यह हुआ कि न सिर्फ भारत को दूसरों के मुकाबले कम टैरिफ का सामना करना पड़ा। बल्कि, अब अमेरिका के 90-दिनों के टैरिफ ‘पॉज’ में भी वह अमेरिका के साथ नए ट्रेड एग्रीमेंट को लेकर आगे बढ़ने की कोशिश करेगा। उसने कोई भी कदम जल्दबाजी या हड़बड़ी में नहीं उठाया। न ही वह किसी खेमेबाजी में फंसा। यह उसकी बड़ी डिप्लोमैटिक जीत भी है।



