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रंगपर्व होली के धार्मिक और वैज्ञानिक महत्व को ऐसे समझिए

पर्व-त्यौहारों के देश भारत वर्ष में रंग पर्व होली का त्यौहार प्रमुखता से मनाया जाता है। यह सामाजिक सद्भावना बढ़ाने का लोकपर्व है। इसे वसंतोत्सव भी कहा जाता है। इस त्यौहार का सांस्कृतिक और आर्थिक महत्व भी है। इसके देशज पहचान को समझने के लिए हमें विभिन्न राज्यों के प्रचलनों पर गौर करना होगा। उनके स्थानीय भावों को वहां प्रचलित गवनई के माध्यम से समझना होगा। शास्त्रों में इसे शूद्रों अर्थात सेवकों का त्यौहार भी कहा जाता है। इस दिन नए सफेद वस्त्र पहनने और तरह तरह के पकवान खाने का भी रिवाज है।

यूँ तो ब्रज की होली पूरे देश में प्रसिद्ध है। बरसाना की लठमार होली की बात ही कुछ और है। राधा-कृष्ण को भी इस पर्व से जोड़ दिया गया है ताकि सांसारिक प्राणियों को उनका सुख मिलता रहे। वहीं, खान-पान के नजरिए से मालपुआ इस पर्व का सुप्रसिद्ध पकवान है, जिसको पकाने के तौर तरीके क्षेत्र के हिसाब से बदल जाते हैं। ठंडई इस दिन का प्रचलित पेय है जो भांग से बनती है। इसमें मेवा और दूध भी डाले जाते हैं। इन सबको अतिथियों को भी परोसा जाता है। सवाल है कि होली का त्योहार फाल्गुन मास की पूर्णिमा तिथि को ही क्यों मनाया जाता है? दूसरा सवाल है कि होली जलाने का क्या कोई वैज्ञानिक कारण भी है या सिर्फ धार्मिक मान्यता ही है?

जहां तक रंग पर्व होली की धार्मिकता की बात है तो पौराणिक कथा के अनुसार, असुरराज हिरण्यकशिपु का पुत्र प्रह्लाद भगवद्भक्त था अर्थात भगवान विष्णु का अनन्य भक्त, जिसकी भक्ति सुरभि से पूरा साम्राज्य सुवाषित हो रहा था। शायद इसलिए असुरराज हिरण्यकशिपु निज पुत्र प्रह्लाद को भगवान श्रीहरि की पूजा करने से मना किया करता था। किन्तु जब भक्तराज प्रह्लाद अपने पिता की बात नहीं माने तो उसने यानी हिरण्यकशिपु ने उन्हें यानी प्रह्लाद को मारने के नानाविध उपाय किये, लेकिन असफल रहा। कभी प्रह्लाद को पहाड़ पर ले जाकर गहरी खाई में गिराया तो कभी अस्त्र-शस्त्र से उसे मारने का प्रयास किया गया, किन्तु हिरण्यकशिपु के सभी प्रयास विफल रहे। 

इससे चिंतित हिरण्यकशिपु की बहन होलिका ने कहा- “भैया! मैं एक पल में इसे जलाकर मार सकती हूँ। मैं इसे गोद में लेकर जलती चिता में बैठ जाऊँगी और यह जलकर मर जायेगा। क्योंकि मुझे वरदान है कि मैं जलती अग्नि में प्रवेश कर जाऊँ तो भी नहीं जलूँगी।” किन्तु होलिका यह भूल गयी थी कि यह वरदान उसे अकेली रहने पर की अवधि के लिए मिला था न कि किसी को साथ लेकर प्रविष्ट होने के लिए। इसलिए वह खुशी-खुशी चिता तैयार करवाकर प्रह्लाद को लेकर बैठ गयी। चिता में उसके ही कहने पर राक्षसों ने आग लगायी। उधर प्रह्लाद आँखें बंद किये हरि के नाम का स्मरण करने में लीन थे। आग लगते ही होलिका जलकर भस्म हो गयी और प्रभु कृपा से प्रह्लाद का बाल भी बाँका न हुआ।

चूंकि यह घटना बिहार के पूर्णिया जिले में पूर्णिमा के समीप ही घटित हुई थी, इसलिए तब से पूर्णिमा के दिन ही उस राक्षसी होलिका को जलाने की प्रक्रिया पूरे देश में हर वर्ष मनायी जाती है। इस प्रकार भारत में आश्विन मास में रावण दहन और फाल्गुन माह में होलिका दहन के द्वारा बुराई पर अच्छाई की जीत का संदेश जनमानस को दिया जाता है। इससे एक सप्ताह पहले और एक सप्ताह बाद तक होली मिलन समारोह मनाया जाता है, ताकि राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक, धार्मिक औए सांस्कृतिक समरसता बनी रहे। पहले के राजा और धन्नासेठ और आज के जनप्रतिनिधियों और कारोबारियों के द्वारा भी यह पर्व उल्लास पूर्वक मनाया जाता है। अब तो यह विधान भारतीयों के साथ पूरी दुनिया में पहुंच गया है। 

वहीं, जल रही होलिका में लोग खेतों से जौ, चने गेहूँ, आलू आदि नई फसलों की बालियाँ या फली तोड़कर भूनते हैं। यह भूनने की क्रिया करने का अर्थ है कि सर्वप्रथम हम अपने देवताओं को अन्न की आहुतियाँ प्रदान करते हैं। पहले आहुतियाँ अग्नि में ही दी जाती हैं। उसके बाद प्रसाद स्वरूप अन्न घर ले जाते हैं अर्थात् उसके बाद गेहूँ, जौ आदि फसलों की कटाई शुरू होती है।

जहां तक वसंतोत्सव होली पर्व की वैज्ञानिकता की बात है तो यह पर्व पूर्ण रूप से वैज्ञानिकता पर आधारित है। क्योंकि जब जाड़े की ऋतु समाप्त होती है और ग्रीष्म ऋतु (गर्मी) का आगमन होता है, उस ऋतु संक्रमण काल में ही यह पर्व मनाया जाता है। चूंकि ऋतु बदलने के कारण अनेक प्रकार के संक्रामक रोगों का शरीर पर आक्रमण होता है, जैसे- चेचक, हैजा, खसरा आदि। लिहाजा, इन संक्रामक रोगों को वायुमण्डल में ही भस्म कर देने का यह सामूहिक अभियान होलिका दहन है। 

आपको पता है कि पूरे देश में रात्रि काल में एक ही दिन होली जलाने से वायुमण्डलीय कीटाणु जलकर भस्म हो जाते हैं। यदि एक जगह से उड़कर ये दूसरी जगह जाना भी चाहें तो भी इन्हें स्थान नहीं मिलेगा, क्योंकि प्रत्येक ग्राम और नगर में होली की अग्नि जल रही होती है। अग्नि की गर्मी से कीटाणु भस्म हो जाते हैं, जो हमारे लिए अत्यधिक लाभकारी है। अत: वैज्ञानिक दृष्टि से भी होली का त्योहार उचित है। इसके अलावा, जलती होलिका की प्रदक्षिणा यानी चारों ओर चक्कर लगाने से हमारे शरीर में कम-से-कम 140 फॉरेनहाइट ताप वाली गर्मी प्रविष्ट होती है। उसके बाद यदि रोग उत्पन्न करने वाले जीवाणु हम पर आक्रमण करते हैं या हमें काटते हैं तो उनका प्रभाव हम पर नहीं होता है, क्योंकि हमारे अंदर आ चुकी उष्णता (गर्मी) से वे स्वयं नष्ट हो जाते हैं। 

इसके बाद दूसरे दिन रंगों की होली मनायी जाती है और अबीर-गुलाल उड़ाए जाते हैं। क्योंकि रंगों का भी हमारे जीवन में बहुत लाभ है। शास्त्रकारों ने टेसुआ (ढाक के फूलों का रंग) जैसे रंग को होली में उपयोग करने की मान्यता दी है। होली से एक दिन पहले छोटी होली होती है, जिसमें धूल और गीली मिट्टी एक दूसरे पर डालने का विधान है। बहुत जगह पर होलिका दहन को सम्मत फूंकना भी बताया जाता है। कहीं अंडी के पेड़ और पुआल से, कहीं वृक्षों की टहनियों और उपले को जलाया जाता है। इससे पूर्व भगवान विष्णु के नरसिंह रूप सहित विविध स्वरूपों की पूजा की जाती है। विभिन्न प्रकार के उबटन, तिल, कर्पूर, शुद्ध घी आदि इसमें अर्पित किए जाते हैं। – कमलेश पांडेय

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