संपादकीय

शिक्षा में बड़ी चुनौती

देश के ग्रामीण हिस्सों में स्कूली बच्चों की शिक्षा की स्थिति पर एनुअल स्टेटस ऑफ एजुकेशन रिपोर्ट (ASER) का ताजा संस्करण पहली नजर में जरूर चिंतित करता है, लेकिन समग्रता में देखने पर साफ हो जाता है कि हालात निराशाजनक नहीं बल्कि चुनौतीपूर्ण हैं।

बुनियादी स्किल : 14 से 18 साल के आधे से ज्यादा बच्चे अगर तीसरी-चौथी क्लास के मैथ के सिंपल डिविजन प्रॉब्लम सॉल्व न कर सकें तो यह कोई अच्छी स्थिति नहीं कही जा सकती। वजह यह है कि डिविजन करने की क्षमता को व्यावहारिक जीवन में काम आने वाली बुनियादी गणनाओं के लिए जरूरी माना जाता है। खास बात यह कि इन स्टूडेंट्स का एक बड़ा हिस्सा जॉब मार्केट से कुछ ही कदम दूर है।

महामारी का प्रभाव : लेकिन इस तथ्य को भुलाया नहीं जा सकता कि इस उम्र समूह के लोगों को रिपोर्ट में पिछली बार 2017 में कवर किया गया था। और इस दौरान देश-दुनिया ने कोरोना महामारी की जबर्दस्त चुनौती झेली है। खासकर ग्रामीण क्षेत्र के बच्चों की पढ़ाई तो कोरोना काल में लगभग ठप ही हो गई थी।

पॉजिटिव नतीजे : महामारी के संदर्भ में रिपोर्ट की दो बातें खास तौर पर ध्यान खींचती हैं। एक तो यह कि 89 फीसदी बच्चे ऐसे हैं जिनके घर में स्मार्टफोन है। वहीं, 92 फीसदी बच्चों ने बताया कि वे स्मार्टफोन चलाना जानते हैं। निश्चित रूप से इसके पीछे महामारी के दौरान ऑनलाइन पढ़ाई की मजबूरी का बड़ा हाथ माना जा सकता है। दूसरी बात यह कि एनरोलमेंट की संख्या (86.8 फीसदी) का 2017 (85.6 फीसदी) से ज्यादा होना बताता है कि महामारी के दौरान आजीविका के नुकसान के चलते ज्यादातर बच्चों के दोबारा स्कूल न लौटने का डर गलत साबित हुआ है।

ड्रॉप आउट की चुनौती : हालांकि इसी रिपोर्ट से यह भी पता चलता है कि करीब एक तिहाई बच्चे 12वीं से आगे नहीं पढ़ते। लड़कों के मामले में ड्रॉप आउट की सबसे बड़ी वजह रुचि की कमी पाई गई तो लड़कियों के मामले में पारिवारिक मजबूरी। निश्चित रूप से डेमोग्रैफिक डिविडेंड पर ध्यान केंद्रित किए एक युवा देश के लिए यह चिंता की बात है।

समस्या नई नहीं :
 मैथ्स की बात हो या लैंग्वेज की, पढ़ाई में पिछड़ापन अपने देश के लिए कोई नई बात नहीं। ASER की ही पिछली रिपोर्टों में यह बात रेखांकित की जाती रही है। लेकिन यह कोई बचाव नहीं हो सकता। चुनौती बड़ी इसलिए भी है कि स्कूली पढ़ाई की नियमित प्रक्रिया में इसका इलाज नहीं है क्योंकि बड़ी कक्षा में आने के बाद टीचर्स उसी क्लास के टेक्स्ट बुक को फॉलो करते हैं। उनके लिए बच्चों की बुनियादी समझ पर ध्यान देना मुश्किल होता है। जाहिर है, विशेष प्रयास करने पड़ेंगे, लेकिन दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी इकॉनमी बनने की राह पर बढ़ रहा देश इस चुनौती से मुंह नहीं मोड़ सकता।

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