संपादकीय

गिद्ध-सुअर की सियासत…

महाशिवरात्रि, 26 फरवरी, शिव-शक्ति के विवाह-संस्कार का दिन और प्रयागराज महाकुंभ का समापन भी। यह बेहद सुखद और आध्यात्मिक एहसास हो सकता है कि देश के करीब 116 करोड़ सनातनी हिंदुओं में से 50 फीसदी से अधिक, 65 करोड़, आस्थावानों ने संगम में डुबकी लगाई। यह भारत के हिस्से एक और विश्व कीर्तिमान है। उप्र के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने विधानसभा में कहा कि महाकुंभ में जिसने जो तलाशा, उसे वही मिला। गिद्धों को लाश मिली, सुअरों को गंदगी, संवेदनशील लोगों को रिश्तों की खूबसूरत तस्वीर मिली। आस्थावान को पुण्य, गरीबों को रोजगार, अमीरों को धंधा और श्रद्धालुओं को साफ व्यवस्था मिली। योगी की यह शब्दावली लाक्षणिक, मुहावरेदार हो सकती है, लेकिन महाकुंभ के संदर्भ में ‘गिद्ध’ और ‘सुअर’ कौन हैं? क्या ये उपमाएं देना जरूरी था? योगी आदित्यनाथ सबसे पहले नाथ संप्रदाय के मठाधीश हैं, संन्यासी हैं, परम आदरणीय हैं। उसके बाद वह राजनीतिज्ञ और मुख्यमंत्री हैं। योगी ने ये शब्द किसी चुनावी जनसभा में नहीं, बल्कि विधानसभा में बोले हैं। उस लिहाज से ये शब्द ‘असंसदीय’ हैं, लिहाजा रिकॉर्ड से हटाए जाने चाहिए। निश्चित रूप से मुख्यमंत्री ने इन शब्दों के जरिए राजनीतिक कटाक्ष किया है। कमोबेश महाकुंभ के संदर्भ में यह स्वीकार्य नहीं है, क्योंकि यह अनैतिक, अशालीन है। क्या महाकुंभ को लेकर किसी भी तरह की भद्दी और विद्रूप राजनीति की जानी चाहिए थी? दरअसल सवाल यह है कि क्या महाकुंभ के दौरान लाशें और गंदगी उपलब्ध थीं कि गिद्धों और सुअरों को उनका भोज्य मिल सका?

लेकिन राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) सरीखी अदालत ने त्रिवेणी संगम के पानी को प्रदूषित पाया था, लिहाजा उप्र प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड से कुछ सवालों के जवाब मांगे हैं। यही नहीं, भारत सरकार के केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने एक रपट में खुलासा किया था कि गंगा, यमुना, सरस्वती संगम के जल में मानव और पशुओं के मल-मूत्र की मात्रा तय मानकों से करीब 20 गुना अधिक है, लिहाजा यह जल न तो स्नान और न ही आचमन के लायक है। यह रपट 18 फरवरी को सामने आई थी। ऐसे मल-मूत्र को तकनीकी भाषा में ‘फीकल कोलीफॉर्म’ कहते हैं। संगम के जल में इसकी मात्रा 2500 एमपीएन प्रति 100 मिलीलीटर होनी चाहिए, जबकि केंद्रीय बोर्ड ने यह मात्रा करीब 49,000 एमपीएन पाई थी। पानी के नमूने जनवरी में लिए गए थे। बीती 18 फरवरी को रपट के बाद भी 10 करोड़ से अधिक श्रद्धालुओं ने संगम में आस्था की डुबकी ली। कोई महामारी या बीमारी फैलने या किसी के बीमार होने की कोई खबर नहीं है। मुख्यमंत्री योगी ने भारत सरकार के बोर्ड की रपट को खारिज कर दिया और संगम के पानी को बिल्कुल स्वच्छ और पवित्र करार दिया। मल-मूत्र के अपशिष्ट बैक्टीरिया के प्रभाव को भी करीब 2300 एमपीएन बताया। यह कैसा विरोधाभास और डबल इंजन की सरकार है। उप्र बोर्ड ने जल के नमूने 12 जनवरी को लिए थे, जब महाकुंभ शुरू ही नहीं हुआ था, लिहाजा अदालत की आंख में धूल झोंकने की कोशिश करने पर एनजीटी से उप्र सरकार को फटकार भी लगाई। बहरहाल महाकुंभ के पटाक्षेप के साथ ही प्रदूषित या पवित्र गंगा जल का यह मुद्दा भी क्या दफन हो जाएगा?

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