संपादकीय

पीएम का दोहराव भाषण…

प्रधानमंत्री मोदी ने राष्ट्रपति अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव पर सियासी जवाब दिया और विपक्ष को निशाने पर रखा। यह संसदीय परंपरा है कि केंद्र में राष्ट्रपति मौजूदा सरकार की नीतियों और उसके कार्यक्रमों पर अभिभाषण देते हैं और राज्यों में यह भूमिका राज्यपाल निभाते हैं। अभिभाषण सरकार के अधिकारी ही लिखते हैं, लिहाजा सांसदों या विधायकों का संबोधन पूरी तरह राजनीतिक होता है। प्रधानमंत्री मोदी ने करीब 95 मिनट के भाषण में गांधी परिवार, केजरीवाल और अखिलेश यादव सरीखे विपक्ष पर कई पलटवार किए, तंज भी कसे और पुराने, अप्रासंगिक मुद्दों को भी उठाया। प्रधानमंत्री ने 1961-63 के दौरान अमरीका के राष्ट्रपति रहे जॉन एफ. कैनेडी और भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू के आपसी संबंधों का जिक्र किया और कैनेडी पर लिखी एक किताब पढऩे की सलाह दी। अमरीका के 35वें राष्ट्रपति कैनेडी पर असंख्य किताबें लिखी गई हैं, लेकिन आज कैनेडी-नेहरू के संबंधों की प्रासंगिकता क्या है? यह मोदी-टं्रप का दौर है। आज 1962 के भारत-चीन युद्ध के दौरान हमारी असफलताओं को क्यों दोहराया जाए? बेशक चीन का भारत की 38,000 से ज्यादा वर्ग किलोमीटर जमीन पर कब्जा है। वह चीन युद्ध की देन है। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने भी इस आयाम पर बयान दिया है। फिर इस किताब की प्रासंगिकता कितनी है, जिसमें तत्कालीन प्रधानमंत्री नेहरू की विदेश नीति की आलोचना की गई थी। यह भी उल्लेख था कि नेहरू चीन के युद्ध को समझ ही नहीं पाए। भारत की सेनाओं की तैयारियां ही नहीं थीं।

चीन को लेकर कैनेडी ने नेहरू को सावधान किया था, लेकिन नेहरू ने उसे गंभीरता से नहीं लिया। ये तमाम करीब 63 साल पुराने संदर्भ हैं। बीते 11 साल से मोदी सरकार काम कर रही है। आज भारत-चीन के बीच अरबों डॉलर का कारोबार होता है, तो सैन्य रूप से दोनों देश प्रतिद्वंद्वी भी हैं। लद्दाख में भारत के हजारों सैनिक चीनी सैनिकों के सामने तन कर तैनात रहे, अंतत: सेनाओं को पीछे हटने पर समझौता करना पड़ा। यह आज का महत्वपूर्ण यथार्थ है। यदि प्रधानमंत्री मोदी उचित समझते, तो उन सवालों के जवाब दे सकते थे, जो नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी समेत विपक्ष के कुछ सांसदों ने राष्ट्रपति अभिभाषण के संदर्भ में उठाए थे। उन्हें अनर्गल करार देकर खारिज कर सकते थे। प्रधानमंत्री के मुख से ये आंकड़े देश कई बार सुन चुका है कि मोदी सरकार ने 12 करोड़ घरों में नल से जल पहुंचाया है, उज्ज्वला योजना लागू की है, 40 लाख करोड़ रुपए सीधे ही जनता-जनार्दन के खातों में जमा कराए हैं, 10 करोड़ फर्जी लाभार्थियों के नाम मिटा कर 3 लाख करोड़ रुपए गलत हाथों में जाने से बचाए हैं, बुनियादी ढांचे का बजट 11 लाख करोड़ रुपए तय किया है, भारत आज विश्व की 5वीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है, 3.5 लाख करोड़ रुपए किसानों के खातों में डाले हैं और 10 साल में कृषि का बजट 10 गुना बढ़ाया है। यह सूची बेहद लंबी है। बेशक हम ‘विकसित भारत’ का संकल्प लेकर आगे बढ़ रहे हैं, लेकिन अब वाकई ‘जहर की राजनीति’ नहीं होनी चाहिए। प्रधानमंत्री भी दोहराव करते न दिखें।

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