AAP, बीजेपी और कांग्रेस… किसी की साख तो किसी का भविष्य दांव पर, सबके लिए क्यों जरूरी हे दिल्ली चुनाव?

नई दिल्ली: दिल्ली की आठवीं विधानसभा के लिए आज वोटिंग होने जा रही है। इस बार भी तीन प्रमुख पार्टियां आप, बीजेपी और कांग्रेस सभी 70 सीटों पर मैदान में हैं। हालांकि इनके अलावा कई छोटी पार्टियां और निर्दलीय भी चुनाव मैदान में हैं लेकिन दिल्ली का अतीत इस बात का गवाह है कि 2013 के अलावा हर चुनाव में दिल्ली वालों ने स्पष्ट जनादेश दिया है। इस बार दिल्ली क्या जनादेश देती है, ये 8 फरवरी को पता चलेगा लेकिन इस चुनाव में तीनों ही प्रमुख दलों के लिए ये चुनाव कितना महत्वपूर्ण है, ये बता रहे हैं
आम आदमी पार्टी के लिए आर या पार की लड़ाई
गठन के पहली बार आम आदमी पार्टी के लिए चुनौतीपूर्ण चुनाव है। 2013 में सबसे बड़ी और फिर लगातार दो बार ऐतिहासिक बहुमत से सत्ता में आने वाली आप को इससे पहले कभी इतनी कड़ी टक्कर नहीं मिली। ऐसे में ये चुनाव न सिर्फ पार्टी के बड़े नेताओं अरविंद केजरीवाल और मनीष सिसोदिया की साख बल्कि पार्टी की आगे की राह भी तय करेगा।
कामयाबी मिली तो: अगर इतनी चुनौतीपूर्ण स्थिति में भी आम आदमी पार्टी भारी बहुमत साबित कर लेती है तो न सिर्फ दिल्ली में बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर भी ये पार्टी अपनी जगह बना लेगी। दरअसल, लंबे वक्त तक पार्टी के बड़े नेताओं के जेल जाने और फिर एंटी इनकमबेंसी के बावजूद जीत मिलने के बाद पार्टी नेताओं की साख न सिर्फ दिल्ली में बढ़ेगी बल्कि इन नेताओं का राष्ट्रीय राजनीति में भी रुतबा बढ़ेगा और राष्ट्रीय गठबंधन में वे पहले से स्थापित नेताओं को भी चुनौती देने की स्थिति में आ जाएंगे। इसके अलावा पार्टी कोशिश करेगी कि पंजाब के अलावा दूसरे राज्यों में भी उसका विस्तार हो। कुल मिलाकर पार्टी के लिए आगे की राह आसान होगी।
अगर नहीं मिली कामयाबी तो: आम आदमी पार्टी के लिए सबसे बड़ी चिंता कांग्रेस का प्रदर्शन है। अगर कांग्रेस ने बेहतर प्रदर्शन किया तो जाहिर है कि उसका असर आप पर सबसे अधिक पड़ेगा और उसका फिर से सरकार बनाने की उम्मीदें धूमिल होंगी। लेकिन इससे अधिक दिक्कत पार्टी की आगे की राह को लेकर भी होगी। जाहिर है कि पार्टी के लिए दूसरे राज्यों में दमखम से जाने की महत्वाकांक्षी योजनाओं को तो झटका लगेगा ही, साथ ही पार्टी को एकजुट रखना भी चुनौती होगी। सबसे बड़ी दिक्कत ये हो सकती है कि इससे शीर्ष नेताओं की पार्टी पर पकड़ कमजोर हो सकती है। जिसका असर पंजाब में आप की सरकार पर भी नजर आ सकता है।
BJP के लिए करो या मरो वाली स्थिति
लगभग 27 साल से दिल्ली की सत्ता से दूर रही बीजेपी के लिए ये चुनाव करो या मरो की स्थिति वाला है। पार्टी ने इस बार विधानसभा चुनाव जीतने के लिए जितना दमखम लगाया है, उतना शायद ही इससे पहले किसी चुनाव में लगाया हो। हालांकि विधानसभा चुनाव का ऐलान जनवरी में हुआ, लेकिन बीजेपी बीते एक साल से भी अधिक वक्त से लगातार चुनाव की तैयारियों में जुटी थी। इस बार पार्टी ने आम आदमी पार्टी को तगड़ी टक्कर देने के लिए वोटरों को एक से एक लुभावने वादे भी किए हैं। साथ ही पार्टी ने पहली बार आप के शीर्ष नेताओं के खिलाफ भी अपने दिग्गजों को मैदान में उतारा है।
कामयाबी मिली तो : पार्टी को इस चुनाव में कामयाबी मिलती है, तो उसके लिए ये एक बड़ी उपलब्धि होगी और उसके हौसले बुलंद होंगे। यही नहीं, इस जीत से खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह को भी बड़ी राहत मिलेगी। इन दोनों नेताओं के लिए दिल्ली इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि 2014 से बीजेपी देश के कई राज्यों में जीत का स्वाद चखती आ रही है, लेकिन दिल्ली में 1993 के बाद से उसे सफलता नहीं मिली है। जाहिर है कि अगर बीजेपी की सरकार बन गई, तो ये उसके लिए बड़ी जीत होगी। इससे पार्टी की दिल्ली इकाई के कई नेताओं का भी कद बढ़ेगा।
कामयाबी नहीं मिली तो : अगर बीजेपी इन तमाम कोशिशों के बावजूद सरकार बनाने लायक सीटें नहीं ला पाती है, तो इससे उसकी साख बुरी तरह से प्रभावित होगी। ये मान लिया जाएगा कि बीजेपी का शीर्ष नेतृत्व अब तक अरविंद केजरीवाल के नेतृत्व वाली आम आदमी पार्टी का मुकाबला करने में नाकाम है। ऐसे में न सिर्फ बीजेपी बल्कि उसके राष्ट्रीय नेतृत्व पर भी सवाल उठेंगे।
कांग्रेस के लिए अस्तित्व की लड़ाई
लगातार 15 साल दिल्ली में शासन करने वाली कांग्रेस के लिए ये चुनाव एक तरह से अस्तित्व की लड़ाई की तरह ही है। भले ही कांग्रेस बहुमत की लड़ाई में न मानी जा रही हो लेकिन उसके लिए दस साल बाद विधानसभा में एंट्री और वोट प्रतिशत को सम्मानजनक तरीके से बढ़ाने के लिए ये चुनाव अहम साबित हो सकता है।
अगर कामयाबी मिली तो : कांग्रेस के लिए सबसे बड़ी चुनौती विधानसभा में लगातार आ रहे शून्य को खत्म करने और अपने खोए हुए जनाधार को वापस लेने की है। अगर कांग्रेस चुनाव में अपना खाता खोल लेती है ओर उसका वोट प्रतिशत सम्मानजनक तरीके से बढ़ता है तो ऐसे में कांग्रेस के लिए ये बड़ी उपलब्धि होगी। ऐसे में पार्टी को ये उम्मीद बंधेगी कि दिल्ली में उसका जनाधार आगे और बढ़ेगा। साथ ही उसका संगठन भी मजबूत होगा और जो समर्थक मायूस होकर घर बैठ गए हैं, वे वापस कांग्रेस की ओर रुख करेंगे। यही नहीं, इससे राहुल गांधी और प्रियंका गांधी की भी साख बढ़ेगी और ये माना जाएगा कि दिल्ली में प्रचार के अंतिम चरण में उन्होंने जो जोर लगाया, उसका दिल्ली वालों पर असर हुआ है।
नाकाम रहे तो : अगर कांग्रेस इस बार भी शून्य पर रहती है और उसका जनाधार मामूली बढ़ता है या फिर उतना ही रहता है तो ये कांग्रेस के लिए सबसे निराशाजनक स्थिति होगी। इसका असर न सिर्फ दिल्ली बल्कि देश के अन्य राज्यों में भी कांग्रेस पर पड़ेगा और उसके वर्कर से लेकर नेताओं तक का मनोबल गिरेगा। यही नहीं, ये भी मान लिया जाएगा कि अब दिल्ली में भी कांग्रेस की वही स्थिति है, जो उड़ीसा, बिहार और यूपी जैसे राज्यों में है यानी वह तीसरे नंबर की पार्टी बन गई है। जो अपने बल बूते सीट जीतने की स्थिति में नहीं है। यही नहीं, राहुल गांधी, प्रियंका की साख भी कम होगी और ये भी हो सकता है कि दिल्ली की कांग्रेस से और नेता भी विदाई लेने लगें।-प्रशांत सोनी


