राष्ट्रीय

चीन की परियोजना से उत्पन्न होते खतरे

पंकज चतुर्वेदी

भारत, बांग्लादेश और भूटान इस बात को लेकर चिंतित थे कि चीन तिब्बत में दुनिया की जो सबसे बड़ी जल-विद्युत परियोजना शुरू कर रहा है, वह भूकंपीय दृष्टि से संवेदनशील क्षेत्र में स्थित है और ऐसे बांधों से दक्षिण एशिया में बड़ी तबाही हो सकती है। इसी बीच, तिब्बत में 6.8-7.1 तीव्रता के भूकंप ने करीब 200 लोगों की जान ले ली और बड़े क्षेत्र को प्रभावित किया। चीन का प्रस्तावित बांध जल सुरक्षा, पारिस्थितिकीय संतुलन और क्षेत्रीय रिश्तों के मामले में आशंकाएं पैदा कर रहा है। दरअसल, ब्रह्मपुत्र नदी भारत के पूर्वोत्तर राज्यों की जीवन रेखा है, और इसके प्रवाह में किसी भी महत्वपूर्ण बदलाव से जल उपलब्धता संकट में पड़ सकती है, खासकर शुष्क मौसम में। बांध से नदी के प्रवाह पर चीन के रणनीतिक नियंत्रण का डर है, जो किसी तनाव के समय प्रभाव डाल सकता है।

यह जलविद्युत परियोजना यारलुंग जांग्बो नदी (ब्रह्मपुत्र का तिब्बती नाम) के निचले हिस्से में हिमालय की एक विशाल घाटी में बनाई जाएगी। इस बांध के कारण भारत सहित कई अन्य देशों में भय का कारण यह भी कि परियोजना स्थल टेक्टोनिक प्लेट सीमा पर स्थित है। तिब्बती पठार, जिसे दुनिया की छत माना जाता है, अक्सर भूकंप की मार झेलता है क्योंकि यह टेक्टोनिक प्लेटों के ऊपर स्थित है। 60 गीगावाट की यह परियोजना नदी प्रवाह के ऐसे मोड़ पर बनाई जा रही हैं जहां से सियांग या दिहांग नदी के रूप में अरुणाचल प्रदेश में प्रवेश करने से पहले तिब्बती प्लैट्यू पर यारलुंग बेहद ऊंचाई से गिरती है। इस मोड़ के लगभग 50 किलोमीटर के इलाक़े को इस्तेमाल किया जाएगा, जिससे पानी 2,000 मीटर की ऊंचाई से गिरे और उसके ज़रिए पनबिजली पैदा की जा सके। चीन ने अभी तक यारलुंग नदी का इस्तेमाल बिजली बनाने में सबसे कम किया है, महज 0.3 फीसदी। अब उसने मेडॉग इलाक़े के पास अपनी भौगोलिक सीमा के लगभग अंतिम छोर पर नदी को रोकने की योजना का क्रियान्वयन शुरू कर दिया।

चीन द्वारा विशाल नदियों पर बांध बनाकर जलाशयों में पानी रोकने से लंबी अवधि में नदी के पारिस्थितिकी तंत्र और जैव विविधता पर गंभीर असर पड़ेगा। इसके जवाब में, भारत भी अपने हिस्से की नदी पर 10 गीगावाट क्षमता का बांध बनाने की योजना पर काम कर रहा है। हालांकि, यदि चीन नदी के मुख्य प्रवाह को नियंत्रित करेगा, तो भारत की जल जरूरतों का नियंत्रण भी चीन के पास होगा, और भारत को भी पारिस्थितिकी तंत्र को नुकसान पहुंचाना पड़ेगा। दोनों देशों की ये हाइड्रोपॉवर परियोजनाएं इस क्षेत्र के पारिस्थितिकी नुकसान को बढ़ा सकती हैं, जिससे जल पारितंत्र स्थिर हो सकता है और स्वच्छ जल की उपलब्धता प्रभावित हो सकती है।

समझना होगा कि सदियों पहले नदियों के साथ बह कर आई जिस मिट्टी ने कभी असम राज्य का निर्माण किया, अब वही द्रुत-व्यापक जलधाराएं इस राज्य को बाढ़ व भूमि कटाव से श्रापित कर रही हैं। ब्रह्मपुत्र, बराक तथा उनकी करीब 50 सहायक नदियों का तेज बहाव अपने किनारे की बस्तियों और खेतों को लगातार उजाड़ता रहा है, जिससे राज्य में कई तरह के संकट उत्पन्न होते हैं, जिनमें विस्थापन और भूमिहीनता प्रमुख हैं। आज भी असम और पूर्वोत्तर के कई इलाकों में बाढ़ के साथ आने वाली तलछट से नई भूमि बनती है, जो वहां की खेती का आधार है। यदि भविष्य में तिब्बत और भारत की सीमा पर बड़े बांधों का निर्माण किया जाता है, तो यह तलछट की आवक को रोक देगा। बांधों और जलाशयों के कारण बड़ी मात्रा में तलछट एकत्र हो जाएगा, जिससे नदी के किनारे कटाव बढ़ जाएगा। चीन में बनाए गए थ्री गोरजेस डैम इसका उदाहरण हैं, जहां बांध के नीचे आने वाली नदियों के किनारों पर कटाव बढ़ा है। भारत में पूर्वोत्तर राज्य पहले ही इस प्रकार के भू-कटाव से प्रभावित हैं।

इतनी विशाल मात्रा में भारत के ‘सिर’ पर एकत्र जल-निधि हमारी सुरक्षा को भी खतरा है। यदि भूकंप या किन्हीं प्राकृतिक कारणों से बांध फट जाए या फिर युद्ध की स्थिति में चीन इसका पानी नीचे बहा दे तो भारत को जान-माल का काफी नुकसान हो सकता है। यह क्षेत्र भूकंपीय रूप से संवेदनशील है, और धरती के भीतर से उभरने वाले आंतरिक दबाव के परिणामस्वरूप भूकंप यहां लगातार महसूस किए जाते हैं। यह पूरा इलाका लगातार नमीदार बना रहता है। जलवायु परिवर्तन के कारण सर्वाधिक संवेदनशील तिब्बत के पहाड़ों पर अचानक तेज बरसात, तापमान में बेहद उतार-चढ़ाव, हिमस्खलन, भूस्खलन, और मलबे के बहाव जैसी स्थितियों की मार बहुत गहरी है और उनका पूर्वानुमान जटिल है। चूंकि भारत और चीन के बीच में कभी जल को लेकर कोई संधि हुई नहीं है। वह वास्तविक आंकड़े और गतिविधियां कभी पड़ोसी से साझा नहीं करता। इस बांध के कारण प्रभावित इलाकों में अरुणाचल प्रदेश का वह हिस्सा भी है जिस पर चीन दावा करता रहा है।

बता दें कि चीन और पाकिस्तान में मित्रता है, चीन ने पाकिस्तान में काफी निवेश भी किया है। हाल के वर्षों में भारत पाकिस्तान को सिंधु नदी और पंजाब की नदियों का पानी रोकने की धमकी देता रहा है। सिंधु नदी तिब्बत से निकलती है और लद्दाख होते हुए पाकिस्तान में प्रवेश करती है, जहां इसकी पानी की मात्रा नील नदी से भी अधिक है। भारत ने इस नदी के पानी के बंटवारे पर किए गए पुराने समझौतों पर पुनर्विचार की बात की है। ऐसे में संभावना है कि जब चीन अपने बांधों के जल-नियंत्रण पर चर्चा करेगा, तो वह पाकिस्तान की मिसाल सामने रखेगा।

चूंकि चीन और भारत दोनों देशों के पास साफ पानी की कमी है और खेती के लिए पानी की आवश्यकता है। यूं भी भविष्य में जल संसाधनों पर अधिक नियंत्रण की चाह सभी देशों में है। एक विशाल जल विस्फोट की आशंका, जैव विविधता व पर्यावरण पर विनाशकारी प्रभावों के मद्देनजर जरूरी है कि भारत ऐसे बांधों को रोकने के लिए अंतर्राष्ट्रीय संस्थाओं से सहयोग ले।

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