संपादकीय

संघ-भाजपा के हिंदुत्व की परीक्षा का चुनाव

महाराष्ट्र में यह संघ-भाजपा के ‘हिंदुत्व’ की परीक्षा का चुनाव था। आरएसएस के नेतृत्व में 15, 20, 30, 45 लोगों की छोटी-छोटी करीब 60,000 बैठकें आयोजित की गईं। ऐसा चुनाव-प्रचार अप्रतिम कहा जा सकता है। फोकस हिंदुत्व पर ही था, लिहाजा घर-घर से मतदाताओं और समर्थकों को निकाल कर बूथ तक पहुंचाने का काम एक लक्ष्य, एक संकल्प की तरह किया गया। संघ के काडर ने यह काम लोकसभा चुनाव के दौरान नहीं किया था। काडर नाराज था अथवा तटस्थ रहा या अति विश्वास के मानस में था कि प्रधानमंत्री मोदी के नाम पर मतदान हो ही जाएगा, लिहाजा चुनाव-प्रचार बिखरा-बिखरा सा रहा। उसके नतीजे अब दुनिया के सामने हैं। कमोबेश महाराष्ट्र के चुनाव में फोकस ‘बंटेंगे, तो कटेंगे’ और ‘एक हैं, तो सेफ हैं’ पर ही रहा, जो परोक्ष रूप से हिंदुत्व का ही आह्वान किया गया था। संघ ने भी इन नारों को सत्यापित किया। चुनाव-प्रचार के दौरान मकसद और चिंता यह नहीं थी कि कमोबेश भाजपा के कितने विधायक जीत सकते हैं, 100 का आंकड़ा पार होगा या नहीं, अंतत: ‘महायुति’ के पक्ष में बहुमत हासिल होगा अथवा नहीं। बुनियादी चिंता और सरोकार यह था कि चुनाव के दौरान हिंदुत्व कितनी गहराई और व्यापकता में जा सकता है? उससे प्रभावित होकर कितना वोट हिंदुत्व के पक्ष में आ सकता है? महाराष्ट्र में जिस तरह मतदान किया गया और 1995 के बाद पहली बार 65 फीसदी से अधिक मतदान हुआ है, उसके मद्देनजर संघ-भाजपा का आकलन है कि चुनाव में हिंदुत्व का प्रयोग सफल रहा है। भाजपा का मानना है कि यदि वह 100 या उससे अधिक सीटें जीत कर सबसे बड़ी पार्टी के तौर पर उभरती है, तो सरकार ‘महायुति’ की ही बनेगी।

हिंदुत्व का यह प्रयोग छोटे, सीमित स्तर पर झारखंड में भी किया गया। वहां आदिवासी और घुसपैठ के जरिए हिंदुत्व की बात कही गई और प्रचार किया गया कि आबादी के समीकरण नहीं बदलने चाहिए। बहरहाल चुनाव के बाद जो अनुमान सामने आए हैं, उनमें ज्यादातर के आकलन यही हैं कि महाराष्ट्र में भाजपा-महायुति सरकार बन सकती है। वैसे ‘एग्जिट पोल’ अपनी साख, सर्वेक्षण क्षमता और विश्वसनीयता खो चुके हैं, क्योंकि लोकसभा चुनाव से लेकर हरियाणा के जनादेश तक उनके आकलन बिल्कुल गलत और विपरीत साबित हुए हैं। फिर भी पेशेवर तौर पर जो अनुमान सार्वजनिक हुए हैं, उन्हें एकदम खारिज नहीं किया जा सकता। कुछ अनुमान ऐसे भी हैं कि महाराष्ट्र में ‘महाविकास अघाड़ी’ और झारखंड में झामुमो गठबंधन के पक्ष में बढ़त है। हमने कांग्रेस के स्तर पर भी जानकारी जुटाई थी। खुद कांग्रेस का मानना है कि महाराष्ट्र में उसका स्ट्राइक रेट 60 फीसदी के आसपास रह सकता है, जबकि झारखंड में उसने पूरा दायित्व झामुमो को दे रखा था। कांग्रेस लगभग निष्क्रिय थी। अलबत्ता कांग्रेस का मानना है कि संविधान, जातीय जनगणना आदि विधानसभा चुनाव के दौरान भी प्रमुख मुद्दे बने रहे। दरअसल संघ-भाजपा 1990 के ‘हिंदुत्व’ मुद्दे को नए सिरे से जीवित करना चाहते हैं। हालांकि प्रभु राम का भव्य मंदिर अयोध्या में बन चुका है और शेष निर्माण भी जारी है। अब मथुरा की श्रीकृष्ण जन्मभूमि और काशी में विश्वनाथ कॉरिडोर का विस्तार और ज्ञानवापी मस्जिद से हिंदू मंदिर को कानूनन वापस लेना आदि हिंदुत्व के नए आधार हैं। दिलचस्प यह है कि केंद्र के साथ-साथ अधिकतर राज्यों में भाजपा-एनडीए सरकारें हैं, लिहाजा वे विकास का दावा भी कर सकते हैं। प्रधानमंत्री मोदी की कई योजनाओं की राष्ट्रव्यापी सार्थकता साबित हुई है। देश का बड़ा भाग आज भी प्रधानमंत्री के तौर पर मोदी का समर्थन कर रहा है। हालांकि देश पर करीब 200 लाख करोड़ रुपए का कर्ज है। महंगाई, बेरोजगारी, किसानी बेहद संवेदनशील मुद्दे हैं, लेकिन ‘वोट जेहाद’ का मुद्दा उछाला जाता है, तो हिंदुत्व के पक्ष में भी स्वाभाविक धु्रवीकरण होता है। बहरहाल यदि हिंदुत्व पर जनादेश अपेक्षानुसार रहता है, तो संघ-भाजपा इसका प्रयोग अन्य राज्यों में भी कर सकते हैं। 2025 में दिल्ली, बिहार में विधानसभा चुनाव होने हैं। कमोबेश बिहार बहुत महत्वपूर्ण राज्य है। वहां भाजपा-एनडीए सत्ता में है, लेकिन मुख्यमंत्री नीतीश कुमार समाजवादी, पिछड़ावादी किस्म के नेता हैं। वह हिंदुत्व को कितना स्वीकार कर पाते हैं, यह देखना भी बड़ा राजनीतिक सवाल है।

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