राष्ट्रीय

हर वर्ग की नुमाइंदगी करे AMU

सुहेल वहीद: सय्यद अहमद खां ने जब ‘आईने अकबरी’ का उर्दू तर्जुमा किया तो उसका प्रिफेस लिखने के लिए मिर्ज़ा गालिब से दरख्वास्त की। गालिब ने उन्हें जवाब दिया कि ‘अब जबकि आधुनिक दुनिया का संविधान कलकत्ता में लिखा जा रहा है तो ऐसे वक्त में अकबर के निजामे हुकूमत (शासकीय व्यवस्था) का जश्न मनाने की जरूरत क्यों आन पड़ी है’। मिर्जा गालिब की इस सलाह के बाद ही सय्यद अहमद खां ने बदलती आधुनिक दुनिया की तरफ हैरत भरी निगाहों से देखना शुरू किया वर्ना यह वही हैं जिन्होंने अपनी किताब ‘कौले मतींन दर इबताल हरकते ज़मीनं’ में प्राचीन मान्यता के मुताबिक 1848 में लिखा था कि पृथ्वी एक जगह पर खड़ी है और सूरज समेत सभी ग्रह उसके चारों ओर चक्कर लगा रहे हैं। हालांकि बाद में उन्होंने गलती मानी और संशोधन कर दिया।

आधुनिक शिक्षा की अलख

बाद में उन्हीं सय्यद अहमद खां ने पूरे भारतवर्ष के मुसलमानों के दरमियान शिक्षा की अलख जलाने जैसा बड़ा कारनामा कर दिखाया। इससे पहले कुछ बंगाली मुसलमान ही आधुनिक शिक्षा हासिल कर पाते थे। सैय्यद अहमद के अलीगढ़ आंदोलन के बाद ही बंगाल में नवाब अब्दुल लतीफ और सय्यद अमीर अली ने इसी लीक पर बंगाल में मुसलमानों की आधुनिक शिक्षा के बड़े काम किए। अंग्रेजों ने सय्यद अहमद खां को 1888 में नाइटहुड से नवाजा और वह ‘सर सय्यद अहमद खां’ हो गए।

इलीट तबके का संस्थान

माना जाता है सर सय्यद अहमद खां ने AMU को मुसलमानों के अशराफ तबके के लिए कायम किया था। पत्रकार सईद नकवी अपनी किताब ‘बीइंग द अदर : द मुस्लिम इन इंडिया’ के उर्दू वर्जन ‘वतन में गैर’ के पेज-49 पर लिखते हैं, ‘सर सय्यद अहमद खां ने कैंब्रिज यूनिवर्सिटी की तर्ज पर अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी की बुनियाद रखी, उन्हें पूरा इम्तिनान और यकीन था कि ये कैंपस अशराफ के लिए है।’ हालांकि उस ज़माने में क्या हिंदू और क्या मुसलमान, सबका इलीट तबका ही अपने बच्चों का पढ़ाता था।

मुस्लिम छात्रों की तादाद 

करीब तीस साल पहले मेडिकल और इंजिनियरिंग में 70% छात्र गैर मुस्लिम थे, बाकी जागीरदार और ताल्लुकेदार मुसलमानों के बच्चे। लेकिन अब माहौल बदला है, मुसलमानों में तालीम हासिल करने का रुझान तेजी से बढ़ रहा है। हॉस्टल्स में हवाई चप्पल पहने पसमांदा तबके के बच्चे भी दिखते हैं, मुस्लिम छात्रों की तादाद पचास प्रतिशत तक पहुंच गई है। इंजिनियरिंग फैकल्टी में करीब 40% और फैकल्टी ऑफ मेडिसिन में 50% हिंदू हैं और डेंटल एवं मेडिकल कॉलेज के प्रिंसिपल भी हिंदू हैं। AMU में टीचिंग स्टाफ में 15-20% और नॉन टीचिंग स्टाफ में लगभग 30% गैर-मुस्लिम हैं।

बेहतरीन रैंकिंग 

AMU में डॉ. आंबेडकर हॉल में करीब छह हॉस्टल हैं। सरोजनी नायडू हॉल में भी सात हैं। राजा महेंद्र प्रताप के नाम पर भी एक हॉस्टल है। AMU के जवाहर लाल नेहरू मेडिकल कॉलेज में ही कोवैक्सीन का ट्रायल हुआ था। यहां के मैथेमेटिक्स विभाग को वर्ल्ड रैंकिंग में चौथा स्थान प्राप्त हुआ था और AMU का संस्कृत विभाग देश के सबसे पहले स्थापित होने वाले विभागों में से एक है। यूनिवर्सिटी के रूप में AMU की रैंकिग हमेशा बेहतरीन रही है।

अपर कास्ट मुस्लिम को तरजीह

बेहतरीन तालीमी इंस्टिट्यूशन के रूप में AMU की विश्वसनीयता पर उंगली शायद नहीं उठाई जा सकतीस लेकिन क्या यह देश के हर वर्ग, तबके और समुदाय के विशेष रूप से मुसलमानों के बच्चों को शिक्षा देने में कामयाब हुआ है? टीचर्स में भी सभी तरह के मुसलमानों की नुमाइंदगी करने में सफल हुआ है या नहीं? AMU की इंटरनल क्वॉलिटी अश्योरेंस सेल के हवाले से सूत्र बताते हैं कि 2016 तक वहां पर अपर कास्ट मुस्लिम टीचर्स डॉमिनेट कर रहे थे। हालांकि इस सेल के प्रमुख इन आंकड़ों से इनकार करते हैं, लेकिन यह जरूर मानते हैं कि इस सेल में यह काम होता रहा है। हर दो साल पर टीचर्स से और सभी छात्रों से दाखिले के वक्त उनकी जाति एक फॉर्म पर लिखवाई जाती है तो ये आंकड़े मिलने में दुश्वारी तो नहीं है।

पॉलिसी में तब्दीली नहीं 

सन 1858 में सर सय्यद अहमद खां ने एक मोनोग्राफ लिखा था, ‘असबाबे बगावते हिंद’। इसमें उन्होंने 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के नाकाम होने के जो पांच मुख्य कारण गिनाए थे। उनमें चौथा कारण ‘मुस्लिमों और मुस्लिम हितों के प्रति ब्रिटिश सत्ता की उदासीनता’ बताया था। जब वह खुद इस बात को मानते हैं कि मुस्लिमों की उपेक्षा ठीक नहीं है तो उनकी अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी में मुस्लिम समाज के 80% से ज्यादा वाले गैर अशराफ तबके की नुमाइंदगी कम क्यों है? अब जबकि AMU में छात्रों के दाखिले में अपर कास्ट मुस्लिमों की तादाद कम होती जा रही है तो उसी तरह शिक्षक भर्ती में भी ऐसी ही तब्दीली नज़र न आना चूक माना जा सकता है।

डायवर्सिटी पर हो जोर 

AMU के माइनॉरिटी स्टेटस को लेकर बड़ी लंबी कानूनी लड़ाई अभी भी पूरी तरह से खत्म नहीं हुई है। एक बुनियादी सवाल बार-बार ज़हन में आता है कि इसके माइनॉरिटी स्टेटस से फायदा कौन उठा सकता है? क्या वही जागीरदार और ताल्लुकेदार मुस्लिम तबका, जो एक हद तक अभी भी वहां काबिज दिखता है? ये वही लोग हैं जिन्होंने AMU के बिहार, बंगाल में सेंटर खोले जाने का विरोध इसीलिए किया था कि उनकी मोनोपॉली न खत्म होने पाए। इन हालात में AMU की जिम्मेदारी है कि वह एक आदर्श शिक्षा केंद्र बना रहे और मुस्लिम समाज के हर वर्ग की नुमाइंदगी के पुख्ता इंतजाम भी करे। इसकी शुरुआत AMU कोर्ट से हो तो बेहतर है जहां एक ही जैसे लोग हैं, डायवर्सिटी नजर नहीं आती।

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