संपादकीय

US इलेक्शन में भारत का संतुलित रुख

डॉनल्ड ट्रंप अमेरिका के अगले राष्ट्रपति होंगे। रिपब्लिकन पार्टी के प्रत्याशी ट्रंप ने राष्ट्रपति चुनाव में डेमोक्रेटिक उम्मीदवार कमला हैरिस को हराया है। ट्रंप के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ अच्छे संबंध रहे हैं। पिछले चुनावों में जब बाइडन से ट्रंप हार गए थे, तब अमेरिका में मोदी ट्रंप के राजनीतिक कार्यक्रम में भी शामिल हुए थे। इसकी तब आलोचना भी हुई थी। लेकिन इस बार पीएम मोदी ने निष्पक्ष रवैया अपनाए रखा, जो मुनासिब था और यह नीति सही भी है।

दोस्ती का हवाला

2016 से 2020 के दौरान जब डॉनल्ड ट्रंप अमेरिका के राष्ट्रपति थे, तो मोदी के साथ उनकी बेहतरीन केमिस्ट्री अक्सर चर्चा में रहती थी। इसका असर इन चुनावों के दौरान इस रूप में दिखा कि एक से अधिक मौकों पर ट्रंप ने मोदी के साथ अपनी अच्छी दोस्ती का हवाला दिया। बेशक, वह इसके जरिये अमेरिका में भारतीय मूल के वोटरों को प्रभावित करना चाहते थे। हाल ही में जब मोदी अमेरिका की यात्रा पर गए तो ट्रंप ने कहा कि भारतीय प्रधानमंत्री उनसे मिलने आ रहे हैं। उन्होंने यह भी कहा कि इस यात्रा के दौरान मोदी उनके एक राजनीतिक कार्यक्रम में शामिल होंगे।

निश्चित दूरी
भारत की तरफ से इन बातों की पुष्टि नहीं की गई, न मोदी उनके कार्यक्रम में शामिल हुए। वजह यही थी कि राष्ट्रीय हित को देखते हुए भारत ने इन चुनावों में दोनों पक्षों से निश्चित दूरी बनाए रखी। जब डेमोक्रेट बराक ओबामा अमेरिका के राष्ट्रपति थे, तब पीएम मोदी के नेतृत्व में दोनों देशों के बीच रिश्ते और मजबूत हुए। ट्रंप का कार्यकाल खत्म होने के बाद डेमोक्रेटिक पार्टी के जो बाइडन राष्ट्रपति बने तो उन्होंने भारत के लिए कुछ जरूरी टेक्नॉलजी का रास्ता खोला। इस दौरान भारत और अमेरिका में रणनीतिक सहयोग भी बढ़ा है।

परमाणु ऊर्जा करार
जब डॉ. मनमोहन सिंह भारत के प्रधानमंत्री थे, तब उनकी और तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा की करीबी की भी काफी चर्चा होती थी। दरअसल, भारत और अमेरिका के रिश्ते दो दशक से लगातार मजबूत हुए हैं। रिपब्लिकन लीडर जॉर्ज बुश के राष्ट्रपति रहने के दौरान भारत के साथ परमाणु ऊर्जा समझौता हुआ था, जिसे मील का पत्थर माना जाता है।

निष्पक्ष और संतुलित
अमेरिका से अच्छे रिश्तों के बावजूद भारत ने अंतरराष्ट्रीय संबंधों में निष्पक्षता की नीति बनाए रखी। यूक्रेन और फलस्तीन-इस्राइल युद्ध इसकी हालिया मिसालें हैं। भारत को रूस का करीबी माना जाता है, लेकिन यूक्रेनी राष्ट्राध्यक्ष वोलोदिमीर जेलेंस्की उससे मध्यस्थता की अपील कर चुके हैं। ‘यह युद्ध का दौर नहीं है’, मोदी ने यह बात रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पूतिन के सामने ही कही थी, जिसे अमेरिका और पश्चिमी देशों ने भी सराहा था। यह भी भारत के निष्पक्ष रूख का प्रमाण था और अभी तक इस निष्पक्षता का उसे फायदा ही मिला है। आज ग्लोबल साउथ भी भारत की ओर उम्मीद भरी नजरों से देख रहा है। इसमें कोई शक नहीं कि वैश्विक स्तर पर भारत की यह निष्पक्षता और उसकी स्वतंत्र विदेश नीति देश को नई ऊंचाइयों पर ले जाएगी।

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