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तो क्या चांद पर कभी नहीं पड़े इंसान के कदम? दुनिया से झूठ बोलता रहा अमेरिका

चंद्रमा पर क्या कभी कोई पहुंचा था या नहीं? आप ये सवाल सुनकर चौंक जाएंगे क्योंकि हम सबने यही पढ़ा है कि चांद की सतह पर अमेरिकन अंतरिक्षयात्री नील आर्मस्ट्रॉन्ग पहली बार लैंड हुए थे और उन्होंने अमेरिका का झंडा भी फहराया था. हालांकि हर कोई ऐसा नहीं मानता और इसे अमेरिका का सबसे बड़ा झूठ भी कहा जाता है.

चंद्रमा पर 1969 में नील आर्मस्ट्रॉन्ग ने अपने कदमों के निशान छोड़े थे. नासा द्वारा जारी की गई तस्वीरों के मुताबिक ऐसा लग रहा था मानो चांद की सतह पर लगा अमेरिकी झंडा हवा में लहरा रहा हो. यहां तक ​​कि उस समय अमेरिकी टेलीविजन पर दिखाए गए वीडियो में भी झंडा थोड़ा लहराता हुआ दिखाई दे रहा था. हालांकि कॉन्पिरेसी थ्योरी के तहत सिद्धांतकारों ने इस पर तमाम सवाल खड़े किए और कहा कि ये झूठ है कि चंद्रमा की सतह पर कोई उतरा था.

कॉन्सपिरेसी थ्योरिस्ट के मुताबिक जब चंद्रमा पर हवा ही नहीं है तो वहां चंद्रमा पर झंडा कैसे फहरा रहा है? हालांकि, नासा ने दावा किया कि तस्वीर में झंडा इस तरह दिख रहा है क्योंकि यह लंबे समय से मुड़ा हुआ था और उसे साइड में एक पोल की सहायता से फहराया गया था.

नासा की इस छवि में चांद पर कोई क्रेटर नहीं दिख रहा है, जहां रोवर ने चंद्रमा की सतह को छुआ है. इस तस्वीर को देखने के बाद कई वैज्ञानिकों ने सवाल उठाया कि क्या नासा के अंतरिक्ष यात्री वाकईचंद्रमा पर उतरे थे?

कॉन्सपिरेसी थ्योरिस्ट्स के मुताबिक नासा की ओर से जारी तस्वीरों में अलग-अलग वस्तुओं की अलग-अलग छाया देखी गई, जो प्रकाश के अलग-अलग स्रोतों से ही संभव है, जबकि वहां तो सूर्य के अलावा प्रकाश का कोई स्रोत है ही नहीं. इस पर नासा ने दावा किया कि चंद्रमा की सतह से परावर्तित होने वाली सूर्य की रोशनी भ्रम का कारण बनी. वैज्ञानिकों के एक समूह ने दावा किया कि पहाड़ के लिए ऐसी छाया बनाना संभव ही नहीं है.

चंद्र मिशन की तस्वीरें जारी होने के बाद वैज्ञानिकों के एक समूह ने ये भी कहा कि नासा ने चंद्र मिशन की जो तस्वीर जारी की है, उसमें अंतरिक्ष यात्री के हेलमेट के शीशे पर धुंधली तस्वीर दिख रही है. ऐसा लग रहा है जैसे कोई वस्तु रस्सी या तार से लटकी हो.उन्होंने दावा किया कि ऐसा नजारा फिल्म स्टूडियो में देखने को मिल सकता है. नासा ने इस शिकायत को लो क्वालिटी की तस्वीर कहकर खारिज़ कर दिया.

नासा ने दावा किया कि ‘अपोलो-11’ ‘वैन एलियन रेडिएशन बेल्ट’ से होकर गुजरा. ‘वैन एलियन रेडिएशन बेल्ट’ एक विशिष्ट क्षेत्र तक ही सीमित है. कॉन्पिरेसी थ्योरिस्ट्स कहते हैं कि अंतरिक्ष यात्री इतने लंबे समय तक उस बेल्ट में रहते तो वे जल जाते. इस पर नासा ने बताया कि अपोलो 11 अंतरिक्ष यान का बेल्ट से केवल थोड़ा सा संपर्क था, इसलिए अंतरिक्ष यात्रियों को उतना नुकसान नहीं हुआ.

एक अन्य महत्वपूर्ण शिकायत अपोलो 11 चंद्र मिशन के वीडियो और तस्वीरों के बारे में थी. कॉन्सपिरेसी थ्योरिस्ट्स के मुताबिक तस्वीर में साफ आसमान दिख रहा है, कोई बादल या तारे दिखाई क्यों नहीं देते? इस मामले में भी नासा ने तर्क दिया कि तस्वीर की क्वालिटी लो होने की वजह से वे स्पष्ट रूप से दिखाई नहीं दे रहे थे.

नासा द्वारा जारी चंद्र मिशन की तस्वीरों में से एक में चंद्रमा पर एक कंकड़ दिखाई दे रहा है जिस पर अंग्रेजी अक्षर ‘सी’ और ‘क्रॉस’ का निशान लिखा हुआ है. आलोचकों का दावा है कि इस सिग्नल का इस्तेमाल स्टूडियो शूट के दौरान किया गया थाय हालांकि, इस आरोप को खारिज करते हुए नासा ने दावा किया, ‘तस्वीर को विकसित करते समय टेक्स्ट और स्पॉट का इस्तेमाल किया गया था.’ आलोचकों का दावा है कि चंद्रभियान की विभिन्न तस्वीरों की पृष्ठभूमि मिश्रित की गई है.

आखिरकार आलोचकों ने एक और अकाट्य तर्क उठाया है. अमेरिकी फ़िल्म निर्देशक स्टैनली कुब्रिक के साथ कंट्रोवर्सी ये जुड़ी हुई है कि तत्कालीन अमेरिकी सरकार ने उन्हें चंद्र मिशन को शूट करने का प्रस्ताव दिया था. आखिरकार 2001: A Space Odyssey फिल्म में इसी फुटेज का इस्तेमाल किया गया. इस विवाद ने मून मिशन को लेकर सबसे बड़ा संदेह पैदा किया, जिसका जवाब नहीं मिल सका. ऐसे में चांद पर अमेरिका की पहली लैंडिंग पहेली बनकर रह गई. (Disclaimer: लेख में मौजूद जानकारी इंटरनेट पर अलग-अलग वेबसाइट से ली गई है. News18 हिंदी इसकी पुष्टि नहीं करता, विस्तृत जानकारी के लिए किसी विशेषज्ञ की राय ज़रूर लें.)

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