राष्ट्रीय

पाकिस्तान के विश्वासघात का परिणाम था कारगिल युद्ध, भारतीय सेना की बहादुरी की मिसाल बनी थी लड़ाई

जब भारतीय प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी पाकिस्तान के साथ शांति समझौता करने के लिए पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ के गले मिल रहे थे। पर पाकिस्तान के आर्मी चीफ परवेज मुशर्रफ का दिमाग कुछ और ही शैतानी चालें सोच रहा था। उन्होंने भारत की पीठ में छुरा घोंपते हुए ‘ऑप्रेशन बदरी’ लांच किया। जिसका उद्देश्य था कि बर्फीले पहाड़ों पर भारतीय सेना के खाली बंकरों पर अपने सैनिकों और जिहादियों की मदद से कब्जा कर लेना। 

आज से 25 साल पहले पाकिस्तान ने भारतीय जमीन निगलने के अपने खूनी इरादों को पूरा करने के लिए भारत के साथ विश्वासघात करके, भारतीय सेना द्वारा सॢदयों में बर्फबारी के कारण खाली किए गए कारगिल के बंकरों को धोखे से हड़प लिया।इस विश्वासघात के कारण भारतीय सेना की बहादुरी की मिसाल बनी कारगिल की लड़ाई। इस विश्वासघात के लिए उसने समय चुना था। 

शुरू में, जब भारतीय सेना के अधिकारियों को इस घुसपैठ की सूचना चरवाहों के माध्यम से मिली, तो इसकी व्यापकता का सही अंदाजा न होने के कारण उन्होंने अपने सैनिकों को आदेश दिया कि ‘कुछ चूहे अंदर आ गए हैं, उन्हें बाहर फैंक दो’। 
रक्षा मंत्री का भी दावा था कि 48 घंटों के अंदर सब कुछ क्लीयर कर दिया जाएगा। पर जब रैकी करने गए सैनिक सौरव शुक्ला को बुरी तरह तड़पाकर शहीद किया गया और भारतीय सेना को पाॢथव शरीर मिला तो जमीनी हकीकतों का पता चला। जब पाकिस्तानी सेना की शमूलियत और लड़ाई की व्यापकता के बारे में सही अंदाजा हुआ, तो भारतीय सेना ने 3 मई को ‘ऑप्रेशन विजय’ शुरू किया। भारतीय सेना को यह स्पष्ट निर्देश थे कि वे दुश्मन को खदेड़ेंगे पर एल.ओ.सी. पार नहीं करेंगे। दुश्मन के ऊंचाई पर जमे होने के कारण सीधे पैदल सेना के हमले असरदार नहीं थे। 

सेना में कहावत है कि पहाड़ सेना को खा जाते हैं। इसी कारण चोटी पर पोजीशन लिए बैठे हर पाकिस्तानी सैनिक को खदेडऩे के लिए कम से कम 27 भारतीय सैनिकों की जरूरत थी। इसीलिए परिस्थितियों को अपने पक्ष में करने के लिए भारतीय वायु सेना ने ऑप्रेशन ‘सफेद सागर’ के तहत मिग 21 और मिग 27 एयरक्राफ्ट से हमले शुरू किए। एक लड़ाकू हैलीकॉप्टर भी इस संघर्ष में क्रैश हो गया। जब हालात काबू में न आए तो 30 मई को मिराज 2000 द्वारा दुश्मन के ठिकानों को सटीक निशाना बनाते हुए लेजर गाइडेड बमों की बारिश शुरू कर दी गई। इससे जहां दुश्मनों के हौसले डगमगाने लगे, वहीं भारतीय सेना को भी आगे बढऩे में मदद मिलने लगी।इस युद्ध में दुश्मन को पूरी तरह से घेरने के लिए भारतीय नौसेना की भूमिका भी ‘ऑप्रेशन तलवार’ के तहत निर्धारित की गई। योजना यह थी कि पाकिस्तानी कराची बंदरगाह की घेराबंदी करके उसकी सप्लाई चेन को ब्लॉक कर दिया जाए। इसके लिए नेवी की वैस्टर्न और ईस्टर्न फ्लीट ने नॉर्थ अरेबियन सागर में चुनौतीपूर्ण पैट्रोङ्क्षलग करके दुश्मन देश को लड़ाई से बाज आने का कड़ा संदेश दिया। 

कारगिल लड़ाई में 5062 मीटर की ऊंचाई वाली टाइगर हिल की लड़ाई बड़ी अहम थी। इसे जीतने के लिए 8 सिख, 2 नागा और 18 ग्रेनेडियर ने घातक प्लाटून की सहायता से चौतरफा हमला किया। आखिरकार 12 घंटे की भीषण लड़ाई के बाद भारतीय सेना ने हर पाकिस्तानी कवच को भेदते हुए इस पर जीत प्राप्त की। ग्रेनेडियर योगेंद्र यादव ने अपने शरीर पर 17 गोलियों की बौछार झेलते हुए बुलंद हौसले का प्रदर्शन किया और बर्फीली हवाओं में भारतीय तिरंगा टाइगर हिल पर लहराने में अहम योगदान दिया। उन्हें युद्ध के बाद मरणोपरांत परमवीर चक्र प्रदान किया गया। दुश्मन के कब्जे अधीन एक और महत्वपूर्ण पहाड़ी चोटी थी- तोलोङ्क्षलग। यह बर्फीली चोटी श्रीनगर-लेह के नैशनल हाईवे 1डी की रक्षा के लिए बहुत अहम थी। इसकी जमीनी और पहाड़ी बनावट इस तरह थी कि इसे फतह करना बड़ा दुर्गम टास्क था। पर भारतीय सेना के जांबाज योद्धाओं ने अपने हिमालय जैसे बुलंद हौसले के साथ इस बर्फीली चोटी को 13 जून को जीत लिया। लेकिन इस जीत में कई फौजी अफसरों और सैनिकों ने शहादत प्राप्त की। मेजर राजेश सिंह अधिकारी, मेजर विवेक गुप्ता, मेजर पदमापाणि आचार्य को मरणोपरांत महावीर चक्र और हवलदार दिगेंद्र कुमार को महावीर चक्र प्रदान किया गया। कर्नल रविंद्र नाथ और कैप्टन विजयंत थापर को वीर चक्र प्रदान किया गया। 

श्रीनगर-लेह मार्ग के ठीक ऊपर सेना की रणनीतिक तौर पर एक बहुत महत्वपूर्ण बर्फीली चोटी थी-5140, जिसे दुश्मन के कब्जे से मुक्त कराने की जिम्मेदारी कैप्टन विक्रम बत्रा और उनकी टुकड़ी की थी।  कैप्टन विक्रम बत्रा बड़ी बहादुरी से अपनी टुकड़ी की अगुवाई करते हुए दुश्मनों के बेहद करीब पहुंच गए और उन्होंने आमने-सामने की लड़ाई में चार दुश्मनों को मार गिराया। लड़ाई का दुर्गम क्षेत्र होने के बावजूद 20 जुलाई को इस चोटी को फतह कर लिया गया। इसके बाद इस टुकड़ी का अगला निशाना था प्वाइंट 4875, यह लड़ाई पहले से भी मुश्किल होने वाली थी। 

कैप्टन विक्रम बत्रा ने जब अपने सैनिकों से कहा कि ‘‘मैं चोटी पर तिरंगा लहराकर आऊंगा या तिरंगे में लिपटकर आऊंगा, पर आऊंगा जरूर’’ तो सैनिकों ने प्रेरित होकर चट्टानी हौसले और सौ गुना उत्साह के साथ आगे बढऩा शुरू कर दिया। चोटी के दोनों तरफ खड़ी ढलान थी और सामने के रास्तों को दुश्मन ने भारी घेराबंदी के साथ ब्लॉक किया हुआ था। कैप्टन बत्रा ने लड़ाई की अगुवाई करते हुए भीषण लड़ाई में पांच सैनिकों को मौत के घाट उतार दिया। इसी टुकड़ी के कैप्टन अनुज नायर ने भी कई पाकिस्तानी सैनिकों का निशान मिटा दिया। भीषण लड़ाई में दोनों फौजी अफसर बुरी तरह घायल हो गए और वीरगति को प्राप्त हुए। युद्ध की समाप्ति के बाद कैप्टन विक्रम बत्रा को मरणोपरांत परमवीर चक्र और कैप्टन अनुज नायर को महावीर चक्र से सम्मानित किया गया। कारगिल की लड़ाई का अंत 26 जुलाई 1999 को हुआ। बर्फीली चोटियों को दुश्मनों के नापाक इरादों से मुक्त करके इन पर भारतीय तिरंगा लहरा दिया गया। इस युद्ध में भारतीय सेना के 527 बहादुर योद्धा शहीद हो गए और लगभग 1363 भारतीय सैनिक घायल हुए।  जहां भारतीय सेना के जांबाज योद्धा भारत को दुश्मनों से बचाने के लिए सीमा पर डटे हुए हैं, वहीं हमें भी चाहिए कि हम भारत के विकास में अपना योगदान देते रहें।-लै. कुलदीप शर्मा

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