राष्ट्रपति का आर्थिक फोकस

राष्ट्रपति का अभिभाषण भारत सरकार का ही दस्तावेजी वक्तव्य होता है। उसे सरकार लिखती है और राष्ट्रपति उसे पढ़ते हैं, क्योंकि सरकार राष्ट्रपति के नाम से ही संचालित की जाती है। यह गणतंत्र की एक खूबसूरत परंपरा है कि राष्ट्रपति संसद की साझा बैठक को संबोधित करते हैं। अभिभाषण के मायने स्पष्ट हैं कि केंद्र सरकार की नीतियों, योजनाओं, उसके कार्यक्रमों और विजन का यह सारांश खुलासा होता है। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने भी उसी गरिमामय परंपरा को निभाया है। उन्होंने मोदी सरकार की उन परियोजनाओं की प्रशंसा की, जिन्हें देश अक्सर सुनता रहा है, लेकिन विपक्ष पूरी तरह सहमत नहीं है। वह उन्हें लीपापोती मानता है अथवा झूठे आंकड़े करार देता है। मसलन-गरीबी से बाहर निकालने वाले लोगों का डाटा सवालिया है। देश की जनता उन परियोजनाओं से इसलिए भी वाकिफ है, क्योंकि वह ही लाभार्थी है, लेकिन इस बार राष्ट्रपति मुर्मू का फोकस आर्थिक समृद्धि और सुधारों की निरंतरता पर अधिक रहा है। देश की आर्थिक विकास दर 8 फीसदी के करीब है और भारत का औसत विकास विश्व में सर्वाधिक और सबसे ज्यादा गतिमान है। भारत बहुत जल्द विश्व की तीसरी सबसे बड़ी तीसरी अर्थव्यवस्था होगा, सरकार का यह संकल्प है। यानी जापान और जर्मनी भी भारत से पीछे होंगे। राष्ट्रपति का उल्लेख कोई नया नहीं है। सत्तारूढ़ पक्ष अक्सर ऐसे दावे करता रहा है।
आम चुनाव के दौरान ऐसे डाटा की भरमार रही, लेकिन मोदी सरकार ने राष्ट्रपति के जरिए यह खुलासा कराया है, लिहाजा उसे विश्वसनीय मानना चाहिए। राष्ट्रपति मुर्मू ने 18वीं लोकसभा के पूर्ण बजट का भी कुछ प्रारूप रखा है कि वह भारत की जनता की आकांक्षाओं और जरूरतों के अनुसार होगा। संसद के जुलाई सत्र में जो बजट पेश किया जाएगा, वह वाकई जनवादी होगा। उसमें दूरगामी नीतियों और भविष्य के विजन के साथ-साथ ऐतिहासिक कदम भी उठाए जाएंगे। बेशक राष्ट्रपति भी उन कदमों का खुलासा नहीं कर सकती थीं, क्योंकि बजट की गोपनीयता का तकाजा था। यह गौरतलब रहा कि मोदी सरकार ने राष्ट्रपति के सौजन्य से यह सिद्धांत स्पष्ट कराया कि देश का विकास, उसके राज्यों के विकास पर ही, आश्रित है, क्योंकि तभी एक राष्ट्र के समग्र विकास का आकलन किया जा सकता है और एक राष्ट्रीय तस्वीर सामने आती है। इस विकास में प्रतिस्पद्र्धा भी होनी चाहिए और सहकारिता का भाव भी रहना चाहिए, यही भारत का सच्चा संघीयवाद है। राष्ट्रपति ने कुछ ऐसे क्षेत्रों का उल्लेख किया, जो ‘सूर्योदय’ की तरह माने जाते हैं। मसलन-विद्युत वाहन, सेमीकंडक्टर, ग्रीन हाईड्रोजन, बैटरी आदि। इन क्षेत्रों को भी प्रोत्साहित किया जा रहा है। ये भारत की बढ़ती अर्थव्यवस्था और प्रगति के प्रतीक हैं। राष्ट्रपति ने जलवायु परिवर्तन का भी जिक्र किया, जो बराबर की चुनौती है और सरकार उस संदर्भ में लगातार सक्रिय है। यह भी वैश्विक चुनौती है, जो किसी महामारी से कम नहीं है। राष्ट्रपति मुर्मू का फोकस महिला सशक्तिकरण पर रहा और उन्होंने देश के संपूर्ण बुनियादी ढांचे की सराहना की। जो सडक़ें, पुल, राजमार्ग, एक्सप्रेस-वे आदि बनाए जा रहे हैं, रेल और हवाई यात्रा का विस्तार किया गया है, कमोबेश उन्हें मोदी सरकार का ‘हालमार्क’ माना जाता है। गौरतलब तथ्य यह भी है कि बेशक भारत विश्व की तीसरी महाशक्ति होगा, अमरीका और चीन के बाद भारत की अर्थव्यवस्था होगी, लेकिन विश्व की तमाम बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में भारत सबसे गरीब देश भी होगा। यह लड़ाई अभी बहुत लंबी है। भारत में आर्थिक असमानताएं काफी व्यापक हैं। दरअसल मोदी सरकार की अग्निपरीक्षा यह है कि वह विकास के सभी स्तंभों की बुनियाद मजबूत करे। इसमें कृषि, विनिर्माण और सेवा-क्षेत्र शामिल हैं। सभी क्षेत्रों में व्यापक स्तर पर रोजगार और नौकरियां पैदा करे, ताकि करोड़ों बेरोजगारों को माकूल काम दिया जा सके। उससे भी आर्थिक विकास बढ़ता है। राष्ट्रपति के जरिए नीट पेपरलीक का मुद्दा उठवाया गया और संसद में शोर-हंगामे की बात कही गई, वह इतने व्यापक संदर्भों में बेमानी है। राष्ट्रपति ने जो आर्थिक विजन दिया है, यदि सरकार उसका अक्षरश: पालन कर सके, तो भारत की तस्वीर बदल सकती है। अभी बयान ज्यादा हैं और यथार्थ निश्चित ही बेहद कुरूप है।



