कैशलेस अर्थव्यवस्था की हकीकत, डिजिटल भुगतान के दौर में भी कायम है नकदी पर भरोसा

देश में डिजिटल भुगतान प्रणाली बड़ा बदलाव लेकर आई है। इससे नकद लेन-देन भले ही कम हुआ है, लेकिन देश की अर्थव्यवस्था का पूरी तरह नकद रहित होना शायद अभी संभव नहीं है। दिलचस्प बात यह है कि नकद पैसे का मकसद भी अब बदल रहा है। आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक, देश में यूपीआइ के जरिए प्रतिदिन औसतन 66 करोड़ रुपए का लेन-देन होता है।
इस वर्ष मार्च में 2,264 करोड़ रुपए के लेन-देन का उच्चतम स्तर दर्ज किया गया। वित्त वर्ष 2025-26 में डिजिटल माध्यम से 24,161.7 करोड़ रुपए से अधिक का भुगतान हुआ। देश के कुल ‘डिजिटल रिटेल पेमेंट वॉल्यूम’ में यूपीआइ की हिस्सेदारी लगभग 85 फीसद है। इसके बावजूद नकद लेन-देन अर्थव्यवस्था में अपनी पैठ बनाए हुए है। आखिर क्या वजह है कि ऑनलाइन भुगतान के प्रति रुझान बढ़ने के साथ-साथ नकदी का महत्त्व बना हुआ है?
भले ही डिजिटल माध्यम से भुगतान मुख्य रूप से रोजमर्रा के लेन-देन के लिए नकद पैसे की जगह ले रहा है, लेकिन यह उन सभी वजहों को खत्म नहीं करता, जिनके कारण लोग भौतिक रूप में पैसा रखना चाहते हैं। ज्यादातर लोगों के लिए आज भी नकद पैसा अनिश्चितता के समय के लिए एक सुरक्षा कवच की तरह है। बिजली जाने, नेटवर्क ध्वस्त होने, साइबर ठगी या डिजिटल भुगतान प्रणाली में खराबी आने पर पैसों का लेन-देन भी रुक जाता है। जबकि नकद पैसे के लिए किसी स्मार्टफोन, पासवर्ड, बैटरी या इंटरनेट की जरूरत नहीं होती।
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इसका एक व्यापक सामाजिक पहलू भी है। बुजुर्गों, गरीब परिवारों, छोटे व्यापारियों और इंटरनेट की कम पहुंच वाले इलाकों में रहने वाले लोगों से यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि वे पूरी तरह से स्मार्टफोन और बैंक खाते पर आधारित अर्थव्यवस्था में शामिल हो पाएंगे। नकद पैसा कुछ हद तक सुरक्षा और निजता के पहलू से भी जुड़ा है। लोग इस बात को भी समझने लगे हैं कि हर भुगतान डिजिटल तरीके से करने पर सुविधा और निगरानी साथ-साथ चल सकते हैं।
दुनिया भर में नकद भुगतान की हिस्सेदारी अलग-अलग है। अधिकांश विकासशील देशों में लोग लगभग पूरी तरह से नकद मुद्रा पर निर्भर हैं, जबकि नॉर्डिक और डिजिटल-फर्स्ट अर्थव्यवस्थाओं में यह फीसद ज्यादातर एक अंक में है। स्वीडन और नॉर्वे में नकदी का इस्तेमाल दुनिया में सबसे कम है। थाईलैंड, ग्रीस, मेक्सिको, इटली और वियतनाम जैसे देशों में पर्यटन एवं सेवा क्षेत्र में नकदी का इस्तेमाल अभी भी आम है। यह खासतौर पर यात्रा के दौरान छोटे-मोटे खर्चों के मामले में देखा जा सकता है। जैसे टैक्सी का किराया, पर्यटन शुल्क, बीच पर खरीदारी, किराने की दुकान और रेस्तरां में भुगतान इत्यादि, जहां अक्सर नकदी ही सबसे सुविधाजनक या एकमात्र भुगतान का तरीका होता है।
विश्व के कुछ अन्य विकसित देशों की बात करें, तो जापान में नकद लेन-देन 42 फीसद, जबकि जर्मनी जैसे देश में 45 फीसद तक होता है। अमेरिका में यह लगभग 14 फीसद, तो ब्रिटेन में 8-9 फीसद तक होता है। वहीं, चीन में मात्र 5 से 9 फीसद लोग ही नकद लेन-देन करते हैं। विकासशील और छोटे देशों की बात की जाए, तो इनमें से कुछ में नकद लेन-देन 90-95 फीसद तक होता है। इनमें नेपाल, पाकिस्तान, लेबनान, म्यांमा, जाम्बिया, इथियोपिया और लाओस जैसे देश शामिल हैं। ऑस्ट्रिया, फिनलैंड, स्वीडन और नीदरलैंड की सरकारों ने तो अपने नागरिकों को सलाह दी है कि वे घर पर कुछ नकदी अवश्य रखें, ताकि बिजली आपूर्ति ठप होने, साइबर हमले या युद्ध जैसी स्थितियों में उन्हें किसी तरह की परेशानी से न जूझना पड़े।
भारत की नकद पैसे पर निर्भरता का एक नकारात्मक पहलू भी है। इससे एक बड़ी अनौपचारिक अर्थव्यवस्था पूरी तरह से वित्तीय पारदर्शिता के दायरे से बाहर काम करती है। संपत्ति की खरीद-फरोख्त इसका एक प्रमुख उदाहरण है, जहां सरकारी मूल्यांकन यानी सर्कल रेट और असल बाजार कीमत के बीच का अंतर नकद भुगतान को बढ़ावा देता है। इससे जाहिर होता है कि नोटबंदी जैसे बड़े कदम के जरिए मौजूदा मुद्रा के भंडार को खत्म करने से ही वे आर्थिक कारण खत्म नहीं हो सकते, जो बिना रिकॉर्ड वाले भुगतान को जन्म देते हैं। इसलिए डिजिटल माध्यमों से भुगतान के बढ़ते इस्तेमाल को देश के नकद ढांचे को खत्म करने की वजह मानना सही नहीं होगा। भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआइ) को अभी भी नोट छापने वाली मशीनों, मुद्रा बांटने वाले तंत्र, एटीएम और नोटों के पर्याप्त रिजर्व की जरूरत है।
किसी भी अर्थव्यवस्था की मजबूती कुछ हद तक इस बात पर निर्भर करती है कि जब उसकी मुख्य प्रणाली काम करना बंद कर दे, तो उसके पास कोई वैकल्पिक व्यवस्था मौजूद हो। यूपीआइ ने भारत में लोगों के भुगतान करने के तरीके को जरूर बदला है, लेकिन अनिश्चित स्थिति के लिए नकद बचाकर रखने की मानवीय प्रवृत्ति को नहीं बदला है। इसलिए देश के डिजिटल बदलाव की असली परीक्षा यह नहीं है कि नकद लेन-देन खत्म हो जाए, बल्कि यह है कि क्या नागरिक बिना किसी प्रणाली के कमजोर पड़ने पर डिजिटल और नकद पैसे के बीच चुनाव कर सकते हैं।
वर्ष 2016 की नोटबंदी ने देश की कुल नकद मुद्रा का 86 फीसद हिस्सा बेकार कर दिया था। कहा जा रहा था कि नोटबंदी से कालाधन बाहर आएगा, लेकिन औपचारिक तौर पर ऐसा कुछ होता हुआ नहीं दिखा। कुछ ही समय में यह सारा पैसा वापस वित्त व्यवस्था में लौट आया था। ऐसे में नोटबंदी के उद्देश्य को समझ पाना आम आदमी के लिए मुश्किल है।
साफ है कि भारत समेत कई देशों में नकद राशि को अब अच्छे दिनों के बजाय बुरे दिनों के लिए एक जरूरी सुविधा के तौर पर देखा जा रहा है। नीति निर्माताओं के लिए सबक स्पष्ट है कि डिजिटल भुगतान ने नकद व्यवस्था के महत्त्व को खत्म नहीं किया है। पहली नजर में ऐसा लग सकता है कि भारत तेजी से नकद पैसों का इस्तेमाल खत्म कर रहा है, हालांकि हकीकत थोड़ी जटिल और अलग है।
आरबीआइ की वित्तीय वर्ष 2024-25 की सालाना रिपोर्ट के अनुसार, भारत का ‘करंसी-टू-जीडीपी’ अनुपात अभी लगभग 11.1 फीसद है। इसका मतलब है कि अर्थव्यवस्था में नकद मुद्रा की कुल कीमत अभी भी देश की जीडीपी का लगभग 11.1 फीसद है। भले ही यह वर्ष 2021 में लगभग 14.4 फीसद और वर्ष 2023 में 12.5 फीसद रही हो। कोरोना महामारी के समय भी यह अनुपात लगभग 14.4 फीसद था और तब से इसमें कमी आई है। यानी भारत पहले से कहीं ज्यादा डिजिटल भुगतान का इस्तेमाल कर रहा है, लेकिन साथ ही नकद पर भी लोगों का भरोसा अभी कायम है। यही वजह है कि देश शायद निकट भविष्य में पूरी तरह से ‘नकद रहित’ न बन पाए, लेकिन इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि भुगतान के लिए डिजिटल माध्यमों का इस्तेमाल फिलहाल बढ़ता रहेगा।



