विपक्षी आंदोलन के मायने

विपक्ष का विरोध-प्रदर्शन, भीडऩुमा आंदोलन अपने साथ कई पक्ष जोड़ रहा है। रेलवे ने खुलासा किया है कि बीती 8 अक्तूबर को दोपहर 12 बजे के बाद, प्रदर्शन की भीड़ के कारण, करीब 5000 लोगों की टे्रन छूट गई। जाहिर है कि वे अपने गंतव्य तक नहीं पहुंच पाए। राजधानी दिल्ली के कनॉट प्लेस से ही गुजर कर लोग ‘नई दिल्ली रेलवे स्टेशन’ तक पहुंचते हैं। कनॉट प्लेस के ‘सागर रत्ना’ और ‘मोएट्स’ में ही विपक्ष के सांसदों का लंच तय किया गया था, लिहाजा वहां अप्रत्याशित, अवांछित भीड़ थी। दोनों रेस्टॉरेंट के आसपास की दुकानें बंद रखनी पड़ीं, फुटपाथ पर कारोबार करने वाले अपना सामान नहीं बिछा सके, आम लोगों की सामान्य आवाजाही बाधित हुई, सबसे शर्मनाक और अलोकतांत्रिक यह रहा कि कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने श्रीनगर (कश्मीर) के एक मुस्लिम नौजवान की खूब पिटाई की। यह अराजकता, गुंडागर्दी नहीं तो क्या है? उस नौजवान का कसूर सिर्फ यह था कि वह अपने देश को नेपाल और बांग्लादेश नहीं बनने देना चाहता था। भारत के नागरिक होने के नाते यह उसका मानवाधिकार और नागरिक अधिकार था कि वह अपनी आवाज बुलंद कर सके। कांग्रेस और विपक्ष अपनी मांग, जिद पर अड़े हैं कि मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) ज्ञानेश कुमार गुप्ता को बर्खास्त किया जाए। यह मांग ही गलत और असंवैधानिक है। जब तक सीईसी खुद इस्तीफा देने को तैयार नहीं हो जाते, तब तक कोई भी उन्हें पद से हटा नहीं सकता। उन्हें संवैधानिक संरक्षण प्राप्त है। बेशक विपक्ष संसद में महाभियोग प्रस्ताव ला सकता है, लेकिन लोकसभा में ही कुल 540 में से 184 सांसद ही विपक्षी खेमे में हैं। महाभियोग पारित कराने के लिए दो-तिहाई बहुमत, यानी 360 सांसदों का समर्थन, अनिवार्य है। लोकसभा में द्रमुक के 22 सांसद ‘इंडी’ गठबंधन से अलग हो चुके हैं। ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस के 28 सांसदों में से 20 सांसदों ने पाला बदल लिया है और वे एनडीए के खेमे में चले गए हैं।
उनकी ‘सांसदी’ पर स्पीकर ओम बिरला का फैसला अभी आना है। आम आदमी पार्टी के सांसद भी ‘इंडी’ ब्लॉक छोड़ चुके हैं। राहुल गांधी किन 300 सांसदों की गिनती करा रहे हैं! बहरहाल संसद में महाभियोग पारित होने की संभावनाएं भी नगण्य हैं। नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने बेहद सनसनीखेज आरोप लगाया है कि प्रधानमंत्री मोदी, गृहमंत्री अमित शाह, सीईसी ज्ञानेश कुमार और सरसंघचालक मोहन भागवत ने ‘आपराधिक साजिश’ करके हिंदुस्तान को हाईजैक कर लिया है, संविधान को नष्ट करने की कोशिश की है, वोट चोरी कराई है। राहुल गांधी के इस गंभीर, खोखले आरोप को संघ अदालत में चुनौती देने पर विचार कर रहा है। दरअसल हम आंदोलन-विरोधी नहीं हैं। यह विपक्ष ही नहीं, सभी भारतीयों का बुनियादी संवैधानिक अधिकार है कि सडक़ों पर विरोध-प्रदर्शन करें। अलबत्ता यह विरोध सोद्देश्य होना चाहिए। जब मुद्दा सर्वोच्च अदालत के विचाराधीन है और 27 अक्तूबर को सुनवाई होनी है, शीर्ष अदालत में विपक्ष का भी विश्वास है, तो सडक़ों पर क्यों बिछा जाए? पुलिस कर्मियों पर लात, घूंसे और कोहनी से प्रहार क्यों किए जाएं? यह किस शांतिपूर्ण, गांधीवादी आंदोलन या विरोध-प्रदर्शन की भाषा है? सर्वोच्च और उच्च न्यायालय के 42 सेवानिवृत्त जजों ने चुनाव आयोग और सीईसी का समर्थन करते हुए खुला पत्र लिखा है कि संवैधानिक संस्थाओं का इस कदर विरोध किया जाता रहेगा, तो उससे लोकतंत्र ही अस्थिर होगा। बहरहाल हम भी एसआईआर के खिलाफ नहीं हैं, लेकिन देश के एक भी नागरिक का मताधिकार छीना जाएगा, तो उसका धुर विरोध किया जाएगा।
हमने कई विश्लेषणों में एसआईआर की खामियों, गलतियों, विसंगतियों को उजागर किया है, लेकिन अब चुनाव आयोग ने नए सिरे से 20 राज्यों में ‘विशेष अभियान’ चला कर अपनी गलतियां सुधारने की पहल की है, तो उसे स्वीकारना भी चाहिए। चुनाव आयोग ज्ञानेश कुमार का पूरक नहीं है। यह चेहरा भी बदल जाएगा, लेकिन चुनाव आयोग भारत का विश्वास, लोकतंत्र का आधार, निष्पक्षता का उदाहरण रहा है, लिहाजा प्रत्येक गतिविधि, आंदोलन और विरोध-प्रदर्शन मर्यादा और गरिमा के दायरे में ही होना चाहिए। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू से विपक्ष के 10 प्रमुख नेता मुलाकात करेंगे, तो क्या सीईसी को बर्खास्त करने का आग्रह करेंगे अथवा एसआईआर को रद्द करने की मांग करेंगे! अंतत: यह निर्णय भी केंद्र सरकार का एक उच्च अधिकारी, निर्देशों के अनुसार ही, करेगा। आंदोलन किया जा सकता है, किंतु जनता को हो रही असुविधाओं की कीमत पर नहीं। जनता को कोई भी असुविधा नहीं होनी चाहिए। हर आंदोलन की कीमत आम जनता ही तो चुकाती है। इससे सत्ता पक्ष और विपक्ष के स्वार्थों की पूर्ति हो सकती है, मगर आम जनता बुरे तरीके से प्रभावित होती है। इसलिए आम जनता की असुविधाओं को ध्यान में रखकर आंदोलन हो।



