राजा बनने से लेकर गुमनामी के अंधेरे में खो जाने तक, अहंकार जिसने Nokia का साम्राज्य ढहा दिया

नई दिल्ली: भारत में एक समय नोकिया की बादशाहत थी। यह सिर्फ एक मोबाइल हैंडसेट ब्रांड नहीं था। बजाय इसके ऐसा इमोशन था जिसने देश के कोने-कोने में डिजिटल क्रांति की नींव रखी। छोटे शहरों से लेकर महानगरों तक टॉर्च वाला नोकिया 1100 हर हाथ की शान हुआ करता था। ग्लोबल स्मार्टफोन के तूफान और गलत रणनीतियों के चलते भले नोकिया गुमनामी के अंधेरे में खो गया। लेकिन, आज भी भारत के साथ उसका पुराना रिश्ता इतिहास के पन्नों में अमर है।
2000 का दशक। भारत में मोबाइल फोन मार्केट अपने शुरुआती दौर में था।। तब नोकिया ने यहां कदम रखा। देखते ही देखते इसने देश के बाजार पर पूरी तरह कब्जा कर लिया। नोकिया 3310, 1100 और बाद में ई-सीरीज और एन-सीरीज जैसे मॉडल्स ने भारत के मध्यम वर्गीय परिवारों का दिल जीता। इसकी मजबूती, लंबी बैटरी लाइफ और आसान इंटरफेस ने भारतीय उपभोक्ताओं के बीच ऐसा भरोसा पैदा किया कि उस दौर में मोबाइल का मतलब ही ‘नोकिया’ बन गया था। चेन्नई (श्रीपेरंबुदूर) में अपनी विशाल मैन्युफैक्चरिंग यूनिट के साथ नोकिया ने ‘मेक इन इंडिया’ की तर्ज पर भारी पैमाने पर उत्पादन किया। देश के लाखों युवाओं को रोजगार देकर यह ब्रांड भारतीय अर्थव्यवस्था का अहम स्तंभ बना।
फिर साल 2007-08 के आसपास पिक्चर बदलनी शुरू हुई। दुनिया में टच-स्क्रीन स्मार्टफोन का दौर आया। ऐपल के आईफोन और गूगल के एंड्राइड ने बाजार में दस्तक दी। हालांकि, नोकिया इस बदलाव को भांपने में बुरी तरह चूक गई। भारतीय बाजार में भी जहां युवा वर्ग इंटरनेट, ऐप्स और आधुनिक टच-स्क्रीन अनुभव की ओर तेजी से आकर्षित हो रहा था। वहीं, नोकिया अपने पुराने सिम्बियन ऑपरेटिंग सिस्टम और कीपैड वाले फोनों पर ही अड़ा रहा। कंपनी का यह अति-आत्मविश्वास और भारतीय उपभोक्ताओं की बदलती तकनीकी प्राथमिकताओं को समय पर न समझ पाना उसके पतन की सबसे बड़ी वजह बन गया। इससे धीरे-धीरे उसका दबदबा कम होने लगा।
ग्लोबल लेवल पर पिछड़ने का असर भारत में भी साफ दिखने लगा। ऊपर से कानूनी और टैक्स विवादों ने चेन्नई प्लांट की चमक फीकी कर दी। माइक्रोसॉफ्ट की ओर से नोकिया के मोबाइल बिजनेस के अधिग्रहण के बाद जब विंडोज आधारित लूमिया फोन भारतीय बाजार में उतरे तो वे उपभोक्ताओं को रिझाने में पूरी तरह नाकाम साबित हुए। स्मार्टफोन बाजार की इस दौड़ में चाइनीज कंपनियों ने उस खाली जगह को तेजी से भर दिया। इसे कभी नोकिया ने अकेले संभाला था। नतीजतन, भारत के सबसे चहेते ब्रांड को बाजार से लगभग बेदखल होना पड़ा।
हालांकि, कहानी यहीं खत्म नहीं हुई। कुछ सालों के अंतराल के बाद नोकिया ने एचएमडी ग्लोबल के जरिए एंड्राइड प्लेटफॉर्म पर लौटते हुए भारतीय बाजार में फिर से एंट्री की। पुरानी यादों के सहारे अपनी जगह तलाशनी शुरू की। इसके साथ ही कंज्यूमर हैंडसेट मार्केट की मुख्य दौड़ से पीछे हटने के बाद नोकिया ने भारत के टेलीकॉम इंफ्रास्ट्रक्चर और 5जी नेटवर्क डेवलपमेंट में अपनी असली ताकत झोंक दी। आज नोकिया भारत की बड़ी टेलीकॉम कंपनियों को नेटवर्क उपकरण मुहैया कराने वाली मजबूत और अदृश्य रीढ़ की हड्डी के रूप में देश की डिजिटल ग्रोथ में लगातार योगदान दे रही है।



