राष्ट्रीय

भगत सिंह के सवालों के लिए क्या हम तैयार हैं?

शहादत के रंग में आजादी को देखने का एक नजरिया मात्र बन गए हैं भगत सिंह और आधुनिक तौर पर देखा जाए तो भगत सिंह की तस्वीर में सिर पर पगड़ी या टोपी, चेहरे पर हल्की गंभीर सहजता, आंखों में दृढ़ता और उम्र महज 23 साल। हम उन्हें देखते हैं, याद करते हैं, उनके नाम के नारे लगाते हैं और उनकी शहादत को सलाम करते हैं लेकिन भगत सिंह की कहानी उनकी तस्वीर से कहीं बड़ी है। तस्वीर उन्हें याद रखने का जरिया है, उनके विचार हमें उन्हें समझने की जिम्मेदारी देते हैं और शायद यही कारण है कि भगत सिंह को याद करना आसान है लेकिन उन्हें पढऩा थोड़ा असहज करने वाला काम है।

लाहौर जेल में अपने जीवन के आखिरी दिनों में भी भगत सिंह का रिश्ता किताबों और विचारों से बना रहा। उनके लेखों, पत्रों और साथियों के दस्तावेजों में एक ऐसा युवक दिखाई देता है, जो जानता था कि उसके जीवन के दिन गिने जा चुके हैं, फिर भी उसके सवाल खत्म नहीं हुए थे। वह अपने फैसलों पर सोच रहा था, समाज को समझने की कोशिश कर रहा था और यह भी सोच रहा था कि जिस आजादी के लिए उसने अपना जीवन दिया, उसका मतलब आखिर क्या है। अगर असैंबली में बम फैंकने की घटना को ही देखें तो इसके तरीके से यह साफ है कि भगत सिंह और उनके साथियों के लिए यह केवल विस्फोट नहीं था, बल्कि वे इसे एक राजनीतिक संदेश के रूप में देखते थे। वे चाहते थे कि उनकी बात अदालत और सार्वजनिक बहस के माध्यम से लोगों तक पहुंचे और यहीं से तस्वीर वाला भगत सिंह और विचार वाला भगत सिंह अलग-अलग दिखाई देने लगते हैं। तस्वीर में वे साहसी हैं और दस्तावेजों में वे सवाल करने वाले युवा हैं और आज उन्हें समझने की सबसे बड़ी जरूरत यही है कि उनकी शहादत को उनके विचारों से अलग करके न देखा जाए।

भगत सिंह के लिए अंग्रेजी शासन से मुक्ति जरूरी थी, लेकिन सवाल यहीं खत्म नहीं होता था। वह यह भी सोच रहे थे कि सत्ता बदलने के बाद समाज कैसा होगा। क्या सिर्फ अंग्रेजों के चले जाने से गरीब और अमीर के बीच का अंतर खत्म हो जाएगा? क्या राजनीतिक आजादी अपने आप सामाजिक बराबरी ले आएगी? क्या मजदूर और किसान की जिंदगी बदल जाएगी? क्या आम आदमी को अपने विचार रखने की आजादी मिलेगी? इन सवालों को आज के भारत में हूबहू लागू करना सही नहीं होगा। 1930 का भारत और 2026 का भारत एक जैसा नहीं है लेकिन सवालों की प्रकृति में कुछ समानताएं जरूर दिखाई देती हैं।

आज भारत तेजी से बदलती अर्थव्यवस्था है। विकास, बुनियादी ढांचे और नए अवसरों की चर्चा होती है। साथ ही रोजगार और अच्छी नौकरी का सवाल लाखों युवाओं के सामने है। अगस्त, 2026 के सरकारी क्करुस्नस् आंकड़ों में 15 वर्ष और उससे अधिक आयु की आबादी के लिए बेरोजगारी दर 5 प्रतिशत रही, लेकिन 15-29 वर्ष के युवाओं के लिए बेरोजगारी की स्थिति इससे अलग है। 2025 की वाॢषक क्करुस्नस् रिपोर्ट में इस आयु वर्ग के लिए राष्ट्रीय स्तर पर बेरोजगारी दर 10 प्रतिशत से ऊपर थी। डिग्री लेने वाला युवा रोजगार की तलाश में प्रतियोगी परीक्षाओं की लंबी कतार में खड़ा है, कोई शहर बदल रहा है, कोई अस्थायी काम कर रहा है और कोई बेहतर अवसर के लिए दूसरे देश की ओर देख रहा है। सवाल इतना भर है कि जिस देश की सबसे बड़ी ताकत उसकी युवा आबादी है, क्या उस युवा को केवल रोजगार चाहिए या उसे आगे बढऩे के समान अवसर भी चाहिएं? और आर्थिक सवाल यहीं खत्म नहीं होता।

भगत सिंह की चिंता का एक बड़ा हिस्सा आॢथक और सामाजिक असमानता से जुड़ा था। एक परिवार के लिए विकास का मतलब नया फ्लाईओवर या डिजिटल सुविधा हो सकता है, तो दूसरे परिवार के लिए इसका अर्थ बच्चों की अच्छी शिक्षा, स्थायी रोजगार और इलाज का खर्च उठा पाने की क्षमता हो सकता है। आज भी किसी बच्चे का भविष्य केवल उसकी मेहनत से तय नहीं होता। उसके परिवार की आर्थिक स्थिति, गांव या शहर में रहना, स्कूल की गुणवत्ता, डिजिटल पहुंच और सामाजिक परिस्थितियां उसके अवसरों को प्रभावित करती हैं। 
इसका मतलब यह नहीं कि भारत में कुछ बदला नहीं है। बदला है और बहुत कुछ बदला है। लेकिन सवाल यह है कि क्या अवसर भी उतनी ही तेजी से समान हुए हैं? भगत सिंह को इसी जगह पढऩा दिलचस्प हो जाता है। उनके लिए आजादी केवल सत्ता के हस्तांतरण का नाम नहीं थी। उसमें समाज को बदलने का विचार भी शामिल था। आज हमारे सामने यह सवाल एक अलग रूप में है कि क्या लोकतंत्र का मतलब केवल वोट देने का अधिकार है या यह भी कि हर नागरिक को सम्मान, अवसर और अपनी बात कहने की जगह मिले?

आज सोशल मीडिया ने हर व्यक्ति को बोलने का मंच दिया है लेकिन उसी के साथ एक समस्या भी पैदा हुई है। हम अक्सर जानकारी से ज्यादा अपनी पसंद की जानकारी देखते हैं। जो बात हमारी राय से मिलती है, उसे तुरंत सच मान लेते हैं और जो बात हमारे विचार से अलग होती है, उसे खारिज कर देते हैं। बहस कई बार विचारों की जगह पहचान और निष्ठा की लड़ाई बन जाती है और ऐसे समय में भगत सिंह का पढऩे वाला और सवाल करने वाला रूप शायद उनकी सबसे जरूरी विरासत है।

भगत सिंह को केवल राष्ट्रवादी कहेंगे तो उनके सामाजिक और आॢथक सवाल पीछे छूट जाएंगे। केवल समाजवादी कहेंगे तो उनकी राष्ट्रीय मुक्ति की ङ्क्षचता छोटी हो जाएगी। केवल क्रांतिकारी कहेंगे तो उनके पढऩे, सोचने और लगातार अपने विचार बदलने-विकसित करने वाले पक्ष की उपेक्षा होगी। इसलिए बेहतर सवाल यह है कि उनके विचार आज हमसे क्या पूछते। क्या हमारी आजादी हर नागरिक के लिए समान अवसर में बदल रही है? क्या आॢथक विकास का फायदा समाज के कमजोर हिस्सों तक पर्याप्त रूप से पहुंच रहा है? क्या हमारे युवाओं के पास रोजगार के साथ अपनी पसंद का जीवन चुनने की स्वतंत्रता भी है? क्या शिक्षा केवल परीक्षा पास करने का साधन रह गई है या वह सवाल करने की क्षमता भी पैदा कर रही है? क्या हम अपने विरोधी विचार को सुनने के लिए तैयार हैं? और क्या हम किसी ऐतिहासिक नायक को केवल तब तक याद करते हैं जब तक वह हमारी सुविधा के मुताबिक बोलता है? ये पूरे समाज के सवाल हैं। भगत सिंह को किसी वर्तमान राजनीतिक खांचे में फिट करने की कोशिश करने की बजाय इन सवालों के सामने खड़ा करना ज्यादा उपयोगी होगा, क्योंकि उनकी सबसे बड़ी विरासत शायद कोई तैयार राजनीतिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि सोचने और सवाल करने की आदत है।

आज उनकी तस्वीर दीवार पर लगाना आसान है। विचार को जीवन में उतारना मुश्किल है। शहीद भगत सिंह को फूल चढ़ाना सम्मान है, लेकिन उन्हें पढऩा जिम्मेदारी। उनके नाम का नारा लगाना स्मृति है लेकिन उनके सवालों को अपने ऊपर लागू करना आत्मपरीक्षण। उनके विचार हमें यह याद दिलाते हैं कि आजादी को केवल इतिहास की घटना मानकर नहीं छोड़ा जा सकता। आजादी हर पीढ़ी से अपना अर्थ पूछती है और शायद इसी वजह से भगत सिंह की तस्वीर जितनी पुरानी है, उनका सवाल उतना ही नया है कि जिस आजादी के लिए हमने शहादत देखी, वह आम आदमी के जीवन में कितनी दिखाई देती है? तस्वीर इतिहास को याद रखती है और विचार इतिहास से आगे जाकर वर्तमान से सवाल करते हैं। भगत सिंह की असली प्रासंगिकता शायद इसी सवाल में है कि क्या हम उन सवालों के लिए तैयार हैं?-राजीव शुक्ला 

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