‘जेन जी’ के आईने में दिल्ली व पंजाब विश्वविद्यालय के चुनाव

जंतर -मंतर पर ‘जेन जी’ आंदोलन और उसके दबाव में नरेंद्र मोदी सरकार से पहली बार किसी मंत्री के इस्तीफे से बदलते राजनीतिक परिदृश्य में पंजाब विश्वविद्यालय (पीयू) और दिल्ली विश्वविद्यालय (डीयू) के छात्र संघ चुनाव परिणाम चौंकाने वाले हैं। ऑनलाइन बनी कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) का नीट पेपर लीक मामले में शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग को ले कर जंतर-मंतर आंदोलन शिक्षा-परीक्षा व्यवस्था के विरुद्ध छात्र-युवा आक्रोश का प्रतीक बन गया था।
देर से ही सही, मोदी सरकार ने उसके दबाव में झुकना बेहतर समझा। न सिर्फ शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा हुआ, बल्कि आत्महत्या करने वाले छात्रों के परिवारों को मुआवजा देने तथा प्रदर्शनकारियों के विरुद्ध दर्ज मुकद्दमे वापस लेने की मांगें मानने की घोषणा भी दो मंत्रियों ने सीजेपी प्रतिनिधियों के साथ संयुक्त प्रेस कॉन्फ्रेंस में की। इस परिदृश्य से विपक्षी दलों का आत्मविश्वास सातवें आसमान पर पहुंच जाना स्वाभाविक ही था। जो काम विपक्ष 12 साल में नहीं कर पाया, वह सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश की टिप्पणी के प्रतिक्रियास्वरूप बनी सीजेपी ने चंद महीनों में कर दिखाया।
जंतर-मंतर के बाद हुए तीन विधानसभा उप चुनावों में से दो में भाजपा की हार को भी अन्य कारकों के साथ ही ‘जेन जी’ असंतोष से भी जोड़ कर देखा-दिखाया गया। बांकीपुर सीट तो भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नबीन के इस्तीफ से खाली हुई थी। चंद महीने पहले हुए विधानसभा चुनाव में खाता तक न खोल पाने वाली जन सुराज पार्टी के मुखिया प्रशांत किशोर के मुकाबले बांकीपुर में भाजपा नितिन नबीन समेत कई दिग्गजों के बूथों पर भी हार गई। ऐसे में अगले साल सात राज्यों में विधानसभा चुनाव के मद्देनजर भाजपा और उसके विरोधी दलों के मनोबल का अंदाजा लगा पाना मुश्किल नहीं होना चाहिए था, पर पीयू और डीयू के छात्र संघ चुनाव परिणामों ने राजनीतिक पंडितों को फिर से सोचने पर मजबूर कर दिया है। तकनीकी तौर पर अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद (एबीवीपी) राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से संबद्ध है, पर भाजपा से उसके रिश्ते छिपे नहीं हैं। इसीलिए पहले पीयू और फिर डीयू में भी एबीवीपी की जीत पर बधाई देने, जेन जी में प्रधानमंत्री की लोकप्रियता बताने और विपक्ष को नसीहत देने की भाजपा नेताओं में होड़-सी लग गई।
पंजाब विश्वविद्यालय में पंजाब, हरियाणा और हिमाचल प्रदेश के छात्र ज्यादा पढ़ते हैं। स्वाभाविक ही सबसे ज्यादा दबदबा पंजाब के छात्रों का ही रहता है। कोशिश तो हरियाणा और हिमाचल के नेता भी करते हैं, पर पीयू की राजनीति से पंजाब सीधे जुड़ा रहता है। इसीलिए पंजाब में सत्तारूढ़ आप ने युवा सांसद गुरमीत सिंह मीत हेयर को पीयू चुनाव का प्रभारी बनाया, लेकिन वह एबीवीपी को लगातार दूसरी बार अध्यक्ष पद जीतने से नहीं रोक पाए। पंजाब में भाजपा की पहचान शिरोमणि अकाली दल के जूनियर पार्टनर की ही रही है। फिर भी लगातार दूसरी बार एबीवीपी का अध्यक्ष पद जीत जाना सत्तारूढ़ आप और मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस के लिए विधानसभा चुनाव से चंद महीने पहले ही जोरदार झटका है।
अध्यक्ष पद के मुकाबले में आप का छात्र संगठन दूसरे और कांग्रेस का छात्र संगठन एनएसयूआई तीसरे स्थान पर रहा। हार की झेंप छिपाने के लिए शिरोमणि अकाली दल के छात्र संगठन सोई द्वारा एबीवीपी को समर्थन की आड़ ली जा रही है। बेशक अपने अध्यक्ष पद उम्मीदवार का नामांकन रद्द हो जाने पर सोई ने एबीवीपी को समर्थन दिया और उसे दोनों के बीच फिर से चुनावी गठबंधन का संकेत भी माना जा रहा है, लेकिन इस सच से तो मुंह नहीं मोड़ा जा सकता कि पिछली बार एबीवीपी अपने दम पर अध्यक्ष पद जीतने में सफल रही थी। यह भी कि उससे पहले एक दशक तक पीयू में एनएसयूआई और क्षेत्रीय छात्र संगठन का ही दबदबा रहा।
पीयू के बाद हुए डीयू छात्र संघ चुनाव के परिणाम तो और भी चौंकाने वाले हैं। बेशक एनएसयूआई उम्मीदवारों ने कड़ी टक्कर दी, लेकिन एबीवीपी अध्यक्ष समेत तीन पद जीतने में सफल हो गई। एक दशक में पहली बार एनएसयूआई का खाता तक नहीं खुला। जंतर-मंतर के बाद शिक्षा-परीक्षा व्यवस्था की खामियों के चलते जिस भाजपा को ‘जेन जी’ के निशाने पर माना जा रहा था, उसी के द्वारा समर्थित एबीवीपी की दिल्ली विश्वविद्यालय में ऐसी जीत साधारण घटना तो हरगिज नहीं है। डीयू से संबद्ध कॉलेजों के छात्र संघ चुनाव में भी एबीवीपी का प्रदर्शन प्रभावशाली रहा। सिर्फ डेढ़ महीने में ‘जेन जी’ का मन या उसकी बाबत चल रहा नैरेटिव कैसे बदल गया? इसे समझने की कोशिश की जानी चाहिए।
सीजेपी नेता सौरव दास ने एबीवीपी की साधन संपन्नता का जिक्र करते हुए डीयू चुनाव का परंपरागत विश्लेषण ही किया है कि विपक्ष एकजुटता की कमी के चलते हारा। बेशक एबीवीपी उम्मीदवार ज्यादा अंतर से नहीं जीते। अगर सभी विपक्षी दल एकजुटता से उम्मीदवार चुनते और चुनाव लड़ते तो परिणाम पलट भी सकते थे, लेकिन जो विपक्ष सही उम्मीदवार नहीं चुन सकता, उससे एकजुट चुनाव लडऩे की उम्मीद कुछ ज्यादा ही है। विभाजित विपक्ष की यह विडंबना न तो नई है और न ही किसी से छिपी है।
देश के सबसे पुराने राजनीतिक दल कांग्रेस का हाल यह है कि उसने उस दीपांशु शौकीन को उपाध्यक्ष पद का उम्मीदवार बनाने लायक नहीं समझा, जिसने निर्दलीय लड़ कर 30000 से भी ज्यादा रिकॉर्ड वोट हासिल किए और 13 हजार से भी ज्यादा अंतर से जीता। 17 साल में पहली बार किसी निर्दलीय ने डीयू के केंद्रीय पैनल में जीत का परचम लहराया है। डीयू में एनएसयूआई के शून्य के बाद राहुल गांधी की नाराजगी की खबरों से कांग्रेस कितना सुधरेगी, यह तो समय ही बताएगा।-राज कुमार सिंह



