आत्महत्याओं के आईआईटी

आईआईटी बॉम्बे के होनहार, मेधावी, प्रतिभाशाली, भावी नवप्रवर्तक या आविष्कारक साहिल वाकोडे ने आत्महत्या कर ली। पंखे से लटक कर जान दे दी। पल भर में ही सपनों और संभावनाओं का संसार समाप्त हो गया। कुछ अरसे के बाद यह त्रासदी भी ‘अतीत’ हो जाएगी, क्योंकि युवा छात्रों में आत्महत्या की प्रवृत्ति और पराजित मन:स्थिति एक निरंतर प्रक्रिया है, सिलसिला बन गया है। ऐसी घटनाएं बेहद मर्माहत करती हैं, त्रासद् होती हैं, परिवार बिखर जाता है, उन माता-पिता की स्थिति पर जरा-सा भी चिंतन नहीं किया जाता, जिन्होंने ‘आईआईटी औलाद’ के लिए संसाधनों का जुगाड़ किया। अब बुजुर्ग होने की उम्र के मुहाने पर वे अचानक ‘अकेले’ कर दिए गए हैं। ये युवा आत्महत्याएं सभी प्रमुख आईआईटी में हो रही हैं और कोटा जैसे कोचिंग सेंटर के शहरों में हो रही हैं। ऐसा कौन-सा मानसिक दबाव, प्रतिस्पद्र्धा का खौफ, पारिवारिक चिंताएं और सबसे भयावह अकेलापन है, जो जिंदगी से हार कर हमारे प्रतिभाशाली बच्चे ‘आत्मघाती’ होते जा रहे हैं? आईआईटी में आने के बावजूद उन्हें सिखाना पड़ेगा कि संघर्ष कैसे करना है? सरकार और शीर्ष शैक्षिक संस्थानों ने छात्रों, प्रशासन और प्रोफेसरों के लिए कुछ दिशा-निर्देश तय किए थे, उन्हें राष्ट्रीय शिक्षा नीति में शामिल किया था, फिर भी आत्महत्याएं जारी हैं! बेहद चिंतित स्थिति है। 2026 के पहले सात माह के दौरान आईआईटी बॉम्बे में ही 3 छात्र आत्महत्या कर चुके हैं।
सबसे अधिक आत्महत्याएं आईआईटी खडग़पुर और मद्रास में की जाती हैं। 2025 में सभी प्रमुख आईआईटी में 15 छात्रों ने आत्महत्याएं कीं और 2021-25 के बीच यह आंकड़ा 65 तक पहुंच गया। 2006-26 के बीच 171 ‘असामान्य मौतें’ दर्ज की गईं। उनमें से 140 आत्महत्याएं आईआईटी छात्रों ने कीं। केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय ने भी संसद में यह रपट और आंकड़े पेश किए हैं कि देश के शीर्षस्थ संस्थानों (आईआईटी, आईआईएम, एनआईटी) में बीते कुछ सालों में आत्महत्याओं के दर्जनों मामले दर्ज किए गए हैं। हालांकि आईआईएम में ऐसी युवा त्रासदियां इक्का-दुक्का ही सामने आई हैं, लेकिन अन्य संस्थानों में आत्महत्या की मन:स्थिति बढ़ती ही जा रही है। व्यवस्थाएं भी जिम्मेदार हैं। करीब 65 फीसदी उच्च शिक्षा संस्थानों में ‘मानसिक स्वास्थ्य सेवाएं’ ही उपलब्ध नहीं हैं। मानसिक अवसाद, तनाव को नियंत्रित करने की व्यवस्था ही नहीं है। आत्महत्या करने वाले छात्र साहिल के प्रति सहानुभूति और उसके परिजनों के प्रति संवेदनाएं स्वाभाविक हैं, लेकिन प्रो. सूर्यनारायण ने उसका जातिवादी उत्पीडऩ किया था और अपशब्दों का इस्तेमाल करते रहे थे, इस निष्कर्ष तक पहुंचना भी ‘अन्यायपूर्ण’ और ‘पूर्वाग्रही’ होगा। ऐसे प्रोफेसर ही नवाचार की पीढ़ी तैयार करते हैं, क्योंकि वे बुनियादी रूप से शिक्षक हैं। हमने अपने छात्र-जीवन में दलित, ओबीसी शिक्षकों के पांव छुए हैं। बेशक जेन-जी की सोच कुछ और होगी! लेकिन शिक्षक-छात्र का रिश्ता ‘जातिवादी’ नहीं होता। यह भी एक राजनीतिक नेरेटिव है। आईआईटी की औसत कक्षा में 60 फीसदी से अधिक छात्र अनुसूचित जाति, जनजाति और ओबीसी के होते हैं। उन छात्रों के अपने समूह होते हैं, लिहाजा कोई भी प्रोफेसर अथवा सवर्ण छात्र, सहजता से, उन्हें जातीय आधार पर शोषित या अलग-थलग नहीं कर सकता। इस दुष्प्रचार से बचना चाहिए। आईआईटी के स्तर पर प्रोफेसर-छात्र के संबंध ‘दोस्ताना’ भी होने लगते हैं, क्योंकि छात्रों में से ही कुछ जूनियर प्रोफेसर बनकर संस्थान में आ सकते हैं। हालांकि पुलिस ने आरोपित प्रोफेसर के खिलाफ आत्महत्या के लिए उकसाने, बाध्य करने और एससी/एसटी कानून की धाराओं में केस दर्ज किया है, लिहाजा जांच की प्रतीक्षा करनी चाहिए।
बेशक मृतक छात्र के माता-पिता का गुस्सा, आक्रोश समझा जा सकता है, लिहाजा उनके आरोप स्वाभाविक हो सकते हैं, लेकिन प्रोफेसर को बिना किसी साक्ष्य अथवा जांच के ‘खलनायक’ करार देना भी न्यायिक नहीं है। आईआईटी बॉम्बे में करीब 14,000 छात्र हैं। उसके अधिकतर छात्र और प्रोफेसर ‘आरोपित शिक्षक’ के समर्थन में हैं। अन्य आईआईटी ने भी उनका समर्थन किया है। महज इन आधारों पर किसी भी निश्चित निष्कर्ष तक नहीं पहुंचा जा सकता। आईआईटी में 56 फीसदी से अधिक फैकल्टी प्रोफेसर ‘अगड़े’ हैं, जबकि 7 फीसदी से कुछ अधिक दलित प्रोफेसर हैं और जनजातीय प्रोफेसर तो 2 फीसदी से भी कम हैं। इस समीकरण के लिए हमारी सरकारी व्यवस्था दोषी है और व्यवस्था ही बुनियादी जवाबदेह है। क्या इस ‘असमानता’ को खंडित किया जाएगा?



