व्यापार

ब्रिक्स के जरिए लाभान्वित होगा भारत

भविष्य की अर्थव्यवस्था को ध्यान में रखते हुए भारत को सेमीकंडक्टर फैब्रिकेशन, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, क्वांटम कंप्यूटिंग, बायोटेक्नोलॉजी और स्पेस टेक्नोलॉजी जैसे अति आधुनिक क्षेत्रों (डीप-टेक) में अनुसंधान और विनिर्माण को बढ़ावा देने के लिए संयुक्त उद्यम स्थापित करने होंगे…

इन दिनों भारतीय अर्थव्यवस्था पर प्रकाशित हो रहे राष्ट्रीय और वैश्विक विश्लेषणों में कहा जा रहा है कि 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन से भारत के लिए बहुआयामी आर्थिक उपयोगिताएं मिली हैं। इस ऐतिहासिक सम्मेलन ने न केवल भारत की साख को नई ऊंचाई पर पहुंचाया है, बल्कि आने वाले दशकों के लिए भारत के आर्थिक विकास का एक सुदृढ़ और विस्तृत खाका भी तैयार किया है। इस शिखर सम्मेलन के माध्यम से भारत ने दुनिया के प्रमुख विकसित और विकासशील देशों के सामने अपनी आर्थिक स्थिरता, नीतिगत निरंतरता और बाजार की असीम क्षमताओं का प्रभावी प्रदर्शन किया है। सम्मेलन ने भारतीय बाजार के लिए बहुराष्ट्रीय व्यापार, प्रत्यक्ष विदेशी निवेश, वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला (सप्लाई चेन) के पुनर्गठन तथा अत्याधुनिक प्रौद्योगिकी के हस्तांतरण के क्षेत्र में असीम संभावनाओं के नए द्वार खोल दिए हैं। इस 18वें ब्रिक्स सम्मेलन का सबसे महत्वपूर्ण निष्कर्ष यह रहा कि भारत अब वैश्विक आर्थिक नीतियों और वित्तीय संरचना के निर्धारण में एक निर्णायक नीति-निर्माता तथा ग्लोबल साउथ की सशक्त और भरोसेमंद आवाज बनकर उभरा है। सम्मेलन के दौरान वैश्विक वित्तीय प्रणालियों के लोकतंत्रीकरण पर विशेष बल दिया गया, जिसके अंतर्गत अंतरराष्ट्रीय व्यापार में अमरीकी डॉलर पर अत्यधिक निर्भरता को धीरे-धीरे कम करने और सदस्य देशों के बीच स्थानीय मुद्राओं (लोकल करंसीज) में द्विपक्षीय व बहुपक्षीय व्यापार को बढ़ावा देने पर ऐतिहासिक सहमति बनी। स्थानीय मुद्रा में आयात-निर्यात के लेन-देन से भारतीय अर्थव्यवस्था को बहुस्तरीय आर्थिक लाभ प्राप्त होंगे।

इससे न केवल भारत के विदेशी मुद्रा भंडार पर बना रहने वाला अनावश्यक दबाव काफी हद तक कम होगा, बल्कि वैश्विक बाजार में मुद्रा विनिमय (करंसी कन्वर्जन) के दौरान होने वाली अतिरिक्त वित्तीय लागत में भारी बचत होगी। परिणामस्वरूप, अंतरराष्ट्रीय बाजारों में भारतीय वस्तुएं और सेवाएं अधिक मूल्य-प्रतिस्पर्धी (कॉस्ट कंपैटिटिव) बन सकेंगी, जिससे देश के कुल निर्यात में क्रांतिकारी उछाल आने की पूरी संभावना है। आर्थिक मोर्चे पर मेक इन इंडिया और आत्मनिर्भर भारत जैसे राष्ट्रीय अभियानों को ब्रिक्स के साझेदार देशों- ब्राजील, रूस, चीन, दक्षिण अफ्रीका तथा नए शामिल हुए सदस्य देशों से आने वाले पूंजीगत निवेश और उच्च तकनीक से अभूतपूर्व संबल प्राप्त होने जा रहा है। ब्रिक्स देशों के बीच व्यापारिक नियमों, सीमा शुल्क (कस्टम्स ड्यूटीज) की प्रक्रियाओं और विनियामक अनुपालनों में सरलीकरण लाने पर बनी सहमति से भारत में मैन्युफैक्चरिंग, भारी उद्योग, लॉजिस्टिक्स और डिजिटल इन्फ्रास्ट्रक्चर के क्षेत्रों में एक क्रांति का सूत्रपात होगा। वैश्विक कंपनियों द्वारा अपनी आपूर्ति श्रृंखला को विविधता देने और भारत को एक वैकल्पिक विनिर्माण केंद्र के रूप में स्थापित करने की रणनीति से देश में न केवल नए औद्योगिक गलियारों का निर्माण होगा, बल्कि बुनियादी ढांचे का भी अभूतपूर्व कायाकल्प होगा। इसके अतिरिक्त भारत ने अपने डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर, यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (यूपीआई) और ई-गवर्नेंस मॉडल्स के सफल प्रयोगों से दुनिया भर में जो धाक जमाई है, उसे अब ब्रिक्स के अन्य सदस्य देशों और अफ्रीकी व एशियाई महाद्वीपों की उभरती अर्थव्यवस्थाओं में निर्यात करने का मार्ग प्रशस्त हुआ है। इससे भारत का टेक-निर्यात बढ़ेगा और देश की डिजिटल अर्थव्यवस्था को एक वैश्विक पहचान और नई वित्तीय ताकत प्राप्त होगी। उल्लेखनीय है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ब्रिक्स बिजनेस फोरम को संबोधित करते हुए कहा कि वैश्विक आर्थिक उथल-पुथल के बीच भी चालू वित्तीय वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही (अप्रैल-जून) के ताजा आंकड़ों के अनुसार, भारत ने 7.8 प्रतिशत की आश्चर्यजनक और मजबूत जीडीपी वृद्धि दर दर्ज की है। यह साबित करता है कि भारतीय अर्थव्यवस्था पर वैश्विक मंदी का प्रभाव न्यूनतम रहा है। प्रधानमंत्री ने कहा कि जहां एक ओर दुनिया भर में व्यापार की बाधाएं बढ़ रही हैं, वहीं भारत विभिन्न देशों के बीच इकोनॉमिक ब्रिजेज बना रहा है। उन्होंने उल्लेख किया कि 2014 से लेकर अब तक भारत ने लगभग 40 देशों के साथ मुक्त व्यापार समझौते (एफटीए) किए हैं।

भारत ने पिछले कुछ वर्षों में अपनी सप्लाई चेन को अधिक विविध और विश्वसनीय बनाया है। इसी मजबूती और लचीलेपन के कारण भारत वैश्विक अनिश्चितताओं के बीच भी दुनिया को विकास और स्थिरता का भरोसा दे रहा है। प्रधानमंत्री ने मेक इन इंडिया पर जोर देते हुए भारतीय उत्पादों को वैश्विक स्तर पर ले जाने की बात कही। भारत के यूपीआई जैसे डिजिटल पेमेंट्स और ओपन इकोसिस्टम ने वित्तीय समावेशन और रियल-टाइम ट्रांजैक्शन को नई गति दी है, जिसे आज दुनिया के कई देश अपना रहे हैं। साथ ही, भारत राजनीतिक स्थिरता, पूर्वानुमानित नीतियों और व्यापार-अनुकूल सुधारों की बदौलत दुनिया की सबसे खुली और निवेश-अनुकूल अर्थव्यवस्थाओं में से एक बनकर उभरा है। नि:संदेह पूरी दुनिया में आर्थिक चुनौतियों के बीच बढ़ती हुई भारतीय अर्थव्यवस्था की अहमियत को स्वीकार किया जा रहा है। देश की इस सुदृढ़ स्थिति को स्वीकार करते हुए हाल ही में प्रसिद्ध अंतरराष्ट्रीय क्रेडिट रेटिंग एजेंसी जापानी क्रेडिट रेटिंग ने भारत की सॉवरेन रेटिंग को बीबीबी प्लस से बढ़ाकर ए माइनस की उत्कृष्ट श्रेणी में अपग्रेड कर दिया है। रेटिंग में किया गया यह सुधार भारत की मजबूत आंतरिक खपत मांग, सरकार द्वारा लगातार किए जा रहे बुनियादी ढांचागत पूंजीगत व्यय (पब्लिक कैपेक्स) और देश की सुदृढ़ बैंकिंग व्यवस्था पर अंतरराष्ट्रीय निवेशकों के अटूट विश्वास पर एक मजबूत मुहर लगाता है। यह बात भी महत्वपूर्ण है कि 11 सितंबर तक भारत का कुल विदेशी मुद्रा भंडार 780.78 अरब डॉलर के उच्च स्तर पर है। विदेशी मुद्रा भंडार की यह वित्तीय ढाल भारत को वैश्विक वित्तीय झटकों, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा बाजार के उतार-चढ़ाव और कच्चे तेल की कीमतों में होने वाली अचानक वृद्धि से पूर्ण सुरक्षा और संप्रभुता प्रदान करती है। इसके साथ ही, केंद्र सरकार द्वारा अपनाए गए सख्त राजकोषीय अनुशासन के कारण देश का राजकोषीय घाटा जीडीपी के 4.4 प्रतिशत के सुरक्षित स्तर पर आ गया है। निश्चित रूप से 18वां ब्रिक्स शिखर सम्मेलन भारत के लिए आर्थिक और कारोबारी दृष्टिकोण से अत्यधिक महत्वपूर्ण रहा है।

ब्रिक्स सम्मेलन से उत्पन्न हुए इन अभूतपूर्व अवसरों का शत-प्रतिशत लाभ उठाने और अर्थव्यवस्था को निरंतर 7.8 प्रतिशत से अधिक की तीव्र विकास दर पर बनाए रखने के लिए भारत को अपनी दीर्घकालिक रणनीतिक प्राथमिकताओं पर तीन तरह से पूरी तत्परता से काम करना होगा। पहला, ब्रिक्स देशों के केंद्रीय बैंकों के साथ मिलकर स्थानीय मुद्रा व्यापार के निष्पादन के लिए एक पारदर्शी और कुशल क्लियरिंग हाउस मैकेनिज्म की स्थापना करनी होगी ताकि व्यापारियों को विनिमय दर के जोखिमों से बचाया जा सके। दूसरा, भविष्य की अर्थव्यवस्था को ध्यान में रखते हुए भारत को सेमीकंडक्टर फैब्रिकेशन, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, क्वांटम कंप्यूटिंग, बायोटेक्नोलॉजी और स्पेस टेक्नोलॉजी जैसे अति आधुनिक क्षेत्रों (डीप-टेक) में अनुसंधान और विनिर्माण को बढ़ावा देने के लिए ब्रिक्स साझेदारों के साथ संयुक्त उद्यम स्थापित करने होंगे। तीसरा, भारत की अर्थव्यवस्था की रीढ़ माने जाने वाले सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्योगों को आधुनिक तकनीक, सस्ता संस्थागत ऋण और वैश्विक बाजार तक पहुंच प्रदान कर उन्हें अंतरराष्ट्रीय आपूर्ति श्रृंखला से जोडऩा होगा।-डा. जयंती लाल भंडारी

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