संपादकीय

पहली बार भारत को मिली ‘ए’ रेटिंग

जेसीआर द्वारा भारत की संप्रभु रेटिंग को बेहतर करने से विश्व में यह संकेत गया है कि भारत की आर्थिक बुनियाद अब काफी मजबूत है। बेहतर रेटिंग से संप्रभु जोखिम कम माना जाता है और इससे सरकार, बैंकों और भारतीय कंपनियों को अंतरराष्ट्रीय बाजारों में कर्ज कम लागत पर मिलने लगता है…

जापानी रेटिंग एजेंसी ‘जेसीआर’ ने पिछले सप्ताह भारत की संप्रभु साख रेटिंग को बीबीबी (प्लस) से बेहतर करते हुए ए (माइनस) कर दिया है, जिसका मतलब यह है कि एजेंसी के अनुसार भारतीय अर्थव्यवस्था का स्थायी आउटलुक है। किसी भी ग्लोबल रेटिंग एजेंसी ने 35 वर्षों में पहली बार भारत को इस श्रेणी में रखा है। हालांकि शेष अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों द्वारा भारत की रेटिंग का पूर्ण आकलन करना अभी बाकी है, जेसीआर द्वारा भारत की रेटिंग के अभ्युत्थान का खासा महत्व है। रेटिंग में सुधार, दुनिया में भारत के लिए निवेश के माहौल को सकारात्मक बनाता है और कंपनियों द्वारा ऋण लेने को सस्ता और सुगम बनाता है। रेटिंग एजेंसियों का पक्षपात : हालांकि भारत सरकार और उससे जुड़े संस्थान, जेसीआर द्वारा बेहतर रेटिंग का श्रेय भारतीय अर्थव्यवस्था में मजबूती को दे रहे हैं, लेकिन यह भी सही है कि अभी तक भारत के प्रति रेटिंग एजेंसियों का रवैया कुछ पक्षपातपूर्ण रहा है। गौरतलब है कि भारत लंबे समय से दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में सबसे तेजी से बढऩे वाली अर्थव्यवस्था बना हुआ है। भारत ने आज तक कभी भी अपने ऋणों पर ब्याज या मूल चुकाने में कोताही नहीं की है, भारत के विदेशी मुद्रा भंडार निरंतर उच्च स्तर पर बने हुए हैं, भारत प्रौद्योगिकी क्षेत्र में निरंतर प्रगति करते हुए, प्रतिरक्षा, टेलीकॉम, अंतरिक्ष, डिजिटल भुगतानों सहित डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर के क्षेत्रों में नए से नए कीर्तिमान स्थापित कर रहा है।

कुछ समय पूर्व भारत जापान को पछाड़ते हुए, दुनिया की चौथी बड़ी अर्थव्यवस्था भी बन गया। भारत का बैंकिंग क्षेत्र भी पूर्व की समस्याओं से निजात पाते हुए आगे बढ़ रहा है, जहां क्रेडिट ग्रोथ 20 प्रतिशत से भी अधिक बनी हुई है। भारतीय बैंकों के एनपीए मार्च 2026 तक मात्र 1.73 प्रतिशत पर पहुंच चुके हैं। लेकिन भारत की तमाम उपलब्धियों के बावजूद ग्लोबल एजेंसियों मूडीज, स्टैण्डर्ड एंड पुअर्स, फिच आदि, द्वारा भारत क्रेडिट रेटिंग में मात्र मामूली ही सुधार किया और अभी भी मूडीज द्वारा भारत की रेटिंग बीएए 3 (स्टेबल), स्टैडर्ड एण्ड पुअर द्वारा बीबीबी (स्टेबल) और फिच द्वारा बीबीबी -(स्टेबल) ही बनी हुई है। पश्चिमी देशों के सुझावों और दबावों से चल रहे तथाकथित आर्थिक सुधारों पर चलने के बावजूद भारत की रेटिंग में लंबे समय तक कोई विशेष सुधार देखने को नहीं मिला। एक ओर जहां 2020 में मूडीज द्वारा कोरोना के कारण भारतीय बैंकों का आउटलुक को स्थायी से गिराकर नकारात्मक कर दिया गया था, जिसके कारण शेयर बाजारों में उथल-पुथल मच गई थी, लेकिन आश्चर्य का विषय यह है कि अमरीकी बैंकों में वित्तीय संकटों के बावजूद इन एजेंसियों ने तमाम जानकारी के बावजूद दुनिया को पता तक नहीं लगने दिया कि उनके निवेश भयंकर संकट में हैं। दिलचस्प बात यह है कि जहां इन रेटिंग एजेंसियों ने कोरोना महामारी के दौरान दुनिया भर की वित्तीय संस्थानों की रेटिंग को गिरा दिया था, लेकिन अपनी ग्राहक कंपनियों की रेटिंग को उच्च बरकरार रखा था। फाइनेंशियल टाइम्स लिखता है कि 2015 में स्टैंडर्ड एंड पुअर ने स्वयं स्वीकार किया था कि वे बिजनेस पाने के लिए अपने ग्राहक कंपनियों की रेटिंग को ऊंचा रखते हैं, ऐसे में इन कंपनियों की रेटिंग के वास्तव में कोई मायने नहीं हैं। पिछले कई सालों से भारतीय अर्थव्यवस्था के शानदार प्रदर्शन, जिसमें पिछले 5 वर्षों में 52 लाख करोड़ रुपए इंफ्रास्ट्रक्चर पर खर्च हो चुके हैं, भारतीय बैंक संकटों से उबर कर निरंतर प्रगति कर रहे हैं, भारत की जीडीपी पिछले 5 वर्षों में वैश्विक युद्धों, सप्लाई चैन व्यवधानों, अन्य देशों द्वारा करेंसी, वैल्यू चेन, भुगतान प्रणाली आदि के हथियारीकरण के बावजूद औसतन 8 प्रतिशत से ज्यादा तेजी से बढ़ रही है, जहां गरीबी (गरीबी और बहुआयामी गरीबी दोनों) दुनिया में सबसे तेजी से कम हो रही है, अंतरराष्ट्रीय एजेंसियों के कान पर जंू भी नहीं रेंग रही है। शायद यही कारण है कि इस वर्ष स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर अपने उद्बोधन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने आह्वान किया कि दुनिया की शीर्ष रेटिंग एजेंसियों में भारत की भी अपनी रेटिंग एजेंसी होनी चाहिए।

भारतवंशियों ने दरकिनार की रेटिंग : एक और जहां ग्लोबल रेटिंग एजेंसियां भारत की प्रगति को अनदेखा करते हुए अर्थव्यवस्था की रेटिंग को जानबूझकर कमतर आंकती रही हैं, विदेशों में रहने वाले भारतीय मूल के लोगों ने इस रेटिंग को खारिज कर दिया है। जहां ग्लोबल एजेंसियां भारतीय अर्थव्यवस्था को बीबीबी की रेटिंग दे रही हैं, जो लगभग ‘जंक’ के बराबर है, भारतवंशियों ने 8 जून से 31 अगस्त 2026 के बीच मात्र तीन माह से भी कम समय में 127 अरब डॉलर से भी अधिक विदेशी मुद्रा, विदेशी मुद्रा अनिवासी बैंक जमाओं में भेज दी। जानकारों का मानना है कि ऐसा इसलिए हुआ कि भारतवंशियों ने भारत के केंद्रीय बैंक और व्यावसायिक बैंकों में विश्वास जताया है कि उनकी जमाएं सुरक्षित हंै और उनको ब्याज तथा मूल की अदायगी का कोई खतरा नहीं है। यह सही है कि इस बार रिजर्व बैंक का बैंकों को रुपए के अवमूल्यन के जोखिम से मुक्त करना और इस कारण जमाकर्ताओं को अधिक ब्याज दर देना, एक प्रमुख कारण रहा, जिससे जमाओं में अभूतपूर्व प्राप्ति हो पाई, लेकिन इसके साथ ही इससे यह भी साबित हो गया कि रेटिंग एजेंसियों की पक्षपातपूर्ण रेटिंग, भारतवंशियों के भारत और भारतीय बैंकों के प्रति विश्वास को नहीं डिगा पाई।

क्या हैं जेसीआर की रेटिंग के मुख्य बिंदु : जापानी एजेंसी जेसीआर द्वारा भारत की रेटिंग में बीबीबी प्लस से ए माइनस में बदलाव करते हुए भारतीय अर्थव्यवस्था में सकारात्मक बदलाव की ओर संकेत किया है। सर्वप्रथम, भारत की लगातार ऊंची जीडीपी ग्रोथ एजेंसी को प्रभावित कर रही है। जहां इस वित्तीय वर्ष की पहली तिमाही में जीडीपी ग्रोथ 7.8 प्रतिशत आंकी गई, पिछले कई वर्षों से यह ग्रोथ 7.00 या उससे अधिक बनी हुई है, जो इस रेटिंग वर्ग के अन्य देशों से कहीं ज्यादा है। दूसरे, भारत में इंफ्रास्ट्रक्चर में लगातार भारी निवेश, भविष्य में उत्पादकता और ग्रोथ बढ़ाने की नींव रख रहा है। यानी जापान की जेसीआर रेटिंग एजेंसी भारत की वर्तमान ग्रोथ ही नहीं, भविष्य की ग्रोथ को भी देख रही है। तीसरे, जीएसटी कर सुधार, डिजिटल पब्लिक इन्फ्रास्ट्रक्चर, अर्थव्यवस्था का फाउंडेशन और सरकारी खर्च, खासतौर पर प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण में पूर्ण पारदर्शिता जैसे संरचनात्मक सुधार एवं बदलाव, भारत को अन्य देशों से अलग एवं उच्च स्थान पर रखते हैं। चौथे, भारत में बैंकिंग व्यवस्था में अभूतपूर्व सुधार, जैसे कि एनपीए का 2 प्रतिशत से भी कम होना, इंसौलवेंसी एवं बैंकरप्सी (दिवालिया) कोड के कारण बैंकों की बैलेंस शीट की सफाई, भारतीय रिजर्व बैंक की व्यावसायिक बैंकों पर सख्त निगरानी आदि कुछ महत्वपूर्ण बातें हैं जो शायद जानबूझकर अन्य रेटिंग एजेंसियों द्वारा नजरअंदाज की गई, लेकिन जेसीआर उनको अब महत्व दे रहा है। जेसीआर द्वारा भारत की संप्रभु रेटिंग को बेहतर करने से विश्व में यह संकेत गया है कि भारत की आर्थिक बुनियाद अब काफी मजबूत है। बेहतर रेटिंग से संप्रभु जोखिम कम माना जाता है और इससे सरकार, बैंकों और भारतीय कंपनियों को अंतरराष्ट्रीय बाजारों में कर्ज कम लागत पर मिलने लगता है। इससे पोर्टफोलियो निवेश ही नहीं बल्कि दीर्घकालीन निवेश भी आसानी से प्राप्त हो सकता है। विदेशी निवेशकों का भारत में भरोसा बढ़ सकता है। इस अपग्रेड से भारत की अंतरराष्ट्रीय वित्तीय विश्वसनीयता भी बेहतर होती है और इससे दूसरी रेटिंग एजेंसियां भी भारत की रेटिंग बेहतर करने की ओर अग्रसर हो सकती हैं। अब भारत को टिकाऊ आर्थिक विकास का लाभ मिल सकता है।

डा. अश्वनी महाजन

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